वह सुबह ठंडी थी, पहाड़ियों की चोटियों पर हल्का सा धुंधला पन छाया हुआ था। बूढ़ा एलिय्याह अपनी झोंपड़ी के सामने बैठा, एक टूटी हुई चटाई पर, और उसकी आँखें उस विस्तृत घाटी को निहार रही थीं जो उसके सामने फैली थी। दूर, ज़ेरेद नदी का पतला-सा रेशमी फीता सूरज की किरणों में चमक रहा था। हवा में खेतों की ताज़ा महक, जंगली जैतून के पेड़ों की सुगंध और धरती की उस गीली सोंधी गंध का मिश्रण था, जो रातभर की ओस के बाद उठती है।
उसका पोता, याकूब, अंदर से दौड़ता हुआ आया, उसके हाथ में कुछ ताज़े अंजीर थे। “दादा, आज शहर में बड़ा सभा-भवन बनकर तैयार हुआ है। लोग कह रहे हैं कि राजा स्वयं वहाँ भजन गाने आएँगे। चलो न?”
एलिय्याह ने एक गहरी साँस ली। उसकी हड्डियाँ चटखती थीं, सुबह की यह ठंडक उनमें समा जाती थी। पर आज, उसके मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी। वह सभा-भवन, वह सोने-चाँदी से जड़ा हुआ, वह ऊँचा गुम्बद… वह सब कुछ अच्छा था। पर कहीं न कहीं, उसे लगता था जैसे कुछ छूट रहा है। भजन की वह सच्ची, उमड़ती हुई धुन, जो दिल की गहराई से निकलती है, कहीं दबाव में, दिखावे में खोती जा रही थी।
“बैठ, याकूब,” उसने कहा, अपने पास जगह बनाते हुए। “सभा-भवन तो चलेंगे, पर पहले, तुझे एक पुरानी बात सुनाता हूँ। वह भजन जो आज गाया जाएगा, उसकी जड़ें इसी धरती में, इन्हीं पहाड़ियों में हैं।”
याकूब उत्सुकता से बैठ गया। दादा की कहानियाँ उसे बहुत पसंद थीं।
“सुन,” एलिय्याह ने शुरुआत की, उसकी आवाज़ में एक गूँज थी, जैसे दूर के पहाड़ों से आ रही हो। “हमारा परमेश्वर बड़ा है। वह सभी देवताओं से ऊपर है। उसकी महिमा का वर्णन कोई नहीं कर सकता। देख, ये पहाड़ उसके हैं, समुद्र की गहराइयाँ उसी ने बनाईं, और यह सारी धरती… यह सब उसकी हथेली पर टिका है।”
उसने हाथ उठाकर उस विस्तृत परिदृश्य की ओर इशारा किया। सूरज अब पूरी तरह निकल आया था, और घाटी सोने और हरे रंग के एक अद्भुत खेल में नहा गई थी। “जब हम ‘आओ, हम परमेश्वर के सामने जयजयकार करें’ कहते हैं, तो यह कोई मनगढ़ंत बात नहीं। यह तो इस सृष्टि का स्वाभाविक स्वर है। ये चिड़ियाँ जो चहचहा रही हैं, यह हवा जो पत्तों को सरसराती है, यह नदी जो अविरल बह रही है… सब उसकी स्तुति में लगे हैं। पर सवाल है, क्या हमारा हृदय भी उसके सामने झुकने को तैयार है?”
याकूब ने गंभीर होकर सुना। दादा की बातें सीधे दिल में उतर रही थीं।
एलिय्याह की आँखें अचानक धुंधला गईं, जैसे वह किसी और ही समय में चला गया हो। “हमारे पूर्वज… उनकी कहानी भूलनी नहीं चाहिए। वह समय याद है न, जब परमेश्वर ने उन्हें मिस्र की दासता से छुड़ाया? उन्हें एक नई भूमि देने का वादा किया? वह चालीस वर्ष… जंगल में भटकते हुए। वहाँ भी उसकी कृपा उन पर बरसती रही। पानी चट्टान से निकला, आकाश से मन्ना बरसा। पर क्या हुआ?”
उसकी आवाज़ कड़वाहट से भर गई। “उनके हृदय कठोर हो गए। परीक्षा के दिन… मरीबा की वह घटना। उन्होंने संदेह किया। उन्होंने पूछा, ‘क्या परमेश्वर हमारे बीच है भी या नहीं?’ ऐसा प्रश्न… जिसने उनकी आस्था की जड़ें हिला दीं। उन्होंने अपनी आँखों से चमत्कार देखे, पर फिर भी विश्वास न कर सका। उनकी पीढ़ी… वह सब, जिनके हृदय भटक गए थे, वह सब, जो उसकी राहों को नहीं पहचान सके… वे उस विश्राम में, उस वादे की भूमि में प्रवेश नहीं कर पाए।”
एलिय्याह ने याकूब की ओर देखा, उसकी आँखों में एक गहरा दर्द और एक गहरी चेतावनी थी। “आज, जब हम उस सुंदर सभा-भवन में इकट्ठा होते हैं, जब हमारी आवाज़ें मिलकर भजन गाती हैं, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए। भजन केवल शब्द नहीं, स्वर नहीं। भजन हृदय की वह अवस्था है, जहाँ गर्व के लिए जगह नहीं, केवल आदर है। केवल समर्पण है। ‘आज, यदि तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने हृदय को कठोर मत करो।’ यही वह पुकार है।”
वह चुप हो गया। आसपास का शोर फिर से सुनाई देने लगा – पक्षियों का कलरव, दूर से आती हुई मज़दूरों की आवाज़ें। पर याकूब पर एक सन्नाटा-सा छा गया था।
“तो दादा,” याकूब ने धीरे से पूछा, “क्या हम… आज… उन पूर्वजों जैसे नहीं हैं? हमारे पास सब कुछ है, फिर भी…”
“फिर भी हमारी आराधना कई बार केवल होठों तक सीमित रह जाती है,” एलिय्याह ने कहा, एक दुखभरी मुस्कान के साथ। “इसीलिए आज, जब हम वहाँ जाएँगे, और भजन शुरू होगा – ‘आओ, हम परमेश्वर के सामने गाने गाएँ, उस उद्धार की चट्टान के लिए जयजयकार करें’ – तो तू केवल शब्द नहीं दोहराना। उस चट्टान को याद करना, जिससे जंगल में पानी फूटा था। उस चट्टान को याद करना, जो हर संकट में हमारा आश्रय है। और सबसे बढ़कर… अपने हृदय के द्वार उसके लिए खुले रखना। उसे कठोर मत होने देना।”
सूरज अब ऊँचा चढ़ आया था। शहर से दूर, सभा-भवन की ओर जाने वाली सड़क पर लोगों की आवाजाही शुरू हो गई थी। एलिय्याह धीरे से उठा, अपने लाठी का सहारा लेता हुआ। याकूब ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“चलो,” बूढ़े ने कहा। “अब चलते हैं। पर याद रख, भजन वहीं शुरू होता है, जहाँ हमारी आवाज़ बंद होती है, और हमारा हृदय बोलने लगता है। उसकी आवाज़ सुनने के लिए… पहले अपने हृदय की गर्जना को शांत करना पड़ता है।”
और दोनों, दादा और पोता, धीमे कदमों से उस रास्ते पर चल पड़े, जो शहर की ओर जाता था। पर एलिय्याह का हृदय अब भी उन पहाड़ियों में, उस सादगी में, और उस पुराने, सच्चे भजन में धड़क रहा था, जो कभी जंगल की आग की तरह उसके पूर्वजों के हृदयों में जलता था। आज का गायन केवल एक अनुष्ठान नहीं, एक चेतावनी भी थी – और एक निमंत्रण भी, उस विश्राम में प्रवेश करने का, जो केवल एक नरम हृदय के लिए सुरक्षित है।




