पवित्र बाइबल

अंधेरी कोठरी में जागा विश्वास

यिर्मयाह के पैरों के नीचे मन्दिर के पत्थर गर्म हो रहे थे। दोपहर की तेज धूप ने उस स्थान को एक भट्ठी बना दिया था, पर उसके भीतर की आग इससे भी ज्यादा धधक रही थी। वह अभी-अभी वहाँ से हटा था जहाँ उसने लोगों को सुनाया था – फिर से वही चेतावनी, फिर से वही विनाश का भयानक दृश्य। उसके गले में एक कर्कशपन था, जैसे कोई पत्थर घिस रहा हो। शब्द तो परमेश्वर के थे, पर उन्हें ढोने का बोझ उसकी हड्डियों पर था, एक ऐसा वजन जो उसे रोज धरती में धंसता हुआ महसूस कराता।

वह बाजार की ओर बढ़ा। आवाजें आ रही थीं – दुकानदारों की चिल्लाहट, खरीदारी करती औरतों की बतकही, बच्चों का शोर। सामान्य जीवन का कोलाहल। यिर्मयाह को हमेशा लगता था कि वह एक मोटे कांच के पीछे से इन सबको देख रहा है। उसकी बातें, उसकी चेतावनियाँ, इस सामान्यता को छू भी नहीं पाती थीं। लोग मुस्कुराते, झूठी शांति में जीते, और उसके शब्दों को एक पागल की बड़बड़ समझकर अनसुना कर देते।

तभी उसने देखा। पशहूर, जो मन्दिर का प्रधान अधिकारी था, कुछ लोगों के साथ तेजी से उसकी ओर आ रहा था। उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं, बल्कि एक तीखी, ठंडी नाराजगी थी, जो और भी खतरनाक लगती थी। भीड़ रुक गई। बातचीत का शोर मर गया।

“फिर तूने यह कह डाला,” पशहूर की आवाज बिल्कुल सपाट थी, “यह स्थान शीलो की तरह हो जाएगा? और राजा बाबुल के हाथ में पड़ जाएगा?”

यिर्मयाह ने कोई जवाब नहीं दिया। जो कहना था, वह तो वह पहले ही कह चुका था। अब शब्द बेकार थे।

पशहूर ने इशारा किया। दो मजबूत आदमियों ने यिर्मयाह के हाथ पकड़ लिए। उनकी पकड़ में कोई क्रोध नहीं था, बस कर्तव्य की कठोरता थी। यिर्मयाह ने प्रतिरोध नहीं किया। वह जानता था कि यह आना ही था। उन्होंने उसे मन्दिर परिसर में ही, बेन्यामीन के फाटक के पास बनी एक कोठरी की ओर धकेला। वह स्थान तहखाने जैसा था – नीचे उतरने पर सीढ़ियाँ, और फिर एक नम, अंधेरा कमरा जिसमें हवा का एक भी झोंका नहीं आता था। बदबू थी – पसीने, डर, और निराशा की।

दरवाजा बंद हुआ। ताला की आवाज काटती हुई सी लगी। अँधेरा इतना गहरा था कि उसे अपनी हथेली भी नहीं दिख रही थी। पहले तो सन्नाटा दबा रहा। फिर धीरे-धीरे आवाजें सुनाई देने लगीं – ऊपर लोगों के कदमों की आहट, दूर कहीं पानी टपकने की आवाज। समय की कोई समझ नहीं रही। क्या एक घंटा बीता, या एक पूरा दिन?

इसी अंधकार में, उसका अपना मन ही उसका सबसे बड़ा विरोधी बन गया। एक आवाज, उसकी अपनी ही आवाज, उसके भीतर कहने लगी – देख लिया न तूने? यही मिला था विश्वास करने का? तूने चुना था, जवानी में ही चुना था परमेश्वर की बात कहने का। और आज? एक गंदी कोठरी में सड़ रहा है। तेरे शब्दों को कोई नहीं सुनता। तेरी चेतावनियाँ लोगों के कानों से टकराकर नीचे गिर जाती हैं। सब कुछ व्यर्थ है।

वह पसीने से लथपथ था। नमी उसके कपड़ों से चिपक गई थी। भूख और प्यास ने उसकी आंतों को मरोड़ना शुरू कर दिया था। पर उससे भी ज्यादा तीखी एक यंत्रणा थी – त्यागे जाने का एहसास। क्या सचमुच परमेश्वर ने उसे छोड़ दिया था? क्या यह सब एक भ्रम था?

फिर, अचानक, उसके मन की उबलती हुई नदी फूट पड़ी। वह चीखा। उस अंधेरी कोठरी में, उसने अपना सर पत्थर की दीवार पर पटका नहीं, बल्कि अपने ही हृदय के सामने अपनी पीड़ा उड़ेल दी।

“तूने मुझे धोखा दिया, हे परमेश्वर! और मैं धोखा खा गया!” उसकी आवाज रुक-रुक कर, सिसकियों में घुली हुई निकली। “मैं तो बोलना भी नहीं चाहता था तेरा वचन। मैं चुप रहना चाहता था। पर फिर वह वचन मेरे भीतर एक जलती हुई आग बन गया। मेरी हड्डियों के भीतर धधकने लगा। मैं रोक नहीं पाया। मैं थक गया उसे सहन करते-करते।”

वह जमीन पर बैठ गया, सर हाथों में छिपाए। उसके आँसू निकलने लगे – गुस्से के, अपमान के, एक अथक पीड़ा के। “मैं हर दिन उपहास का पात्र बनता हूँ। लोग मुझ पर हँसते हैं। ‘कहाँ है तेरा परमेश्वर का वचन?’ वे पूछते हैं। और मैं क्या कहूँ? हर दिन मैं मरता हूँ, पर मौत आती नहीं। यह बोझ… यह बोझ मुझे चकनाचूर कर रहा है।”

एक लम्हे को लगा कि वह टूट जाएगा। कि वह इस कोठरी में ही सड़-गल कर मर जाएगा, और उसका नाम भी इतिहास की धूल में मिल जाएगा। यह सोचकर भी एक विचित्र शांति मिली – अंत की, समाप्ति की शांति।

पर फिर, उस अंधकार में ही, एक और आवाज उठी। धीमी, गहरी, बिल्कुल अलग। उसके अपने विलाप के बीच से, जैसे कोई दूसरी धारा बह निकली।

“पर यदि मैं कहूँ, ‘मैं उसका स्मरण नहीं करूंगा, और न उसके नाम से बातें करूंगा,’ तो वह मेरे हृदय में अंगारे की तरह जलने लगता है। मैं उसे दबाने की चेष्टा करता हूँ, पर थक जाता हूँ।”

यह सच था। यही सबसे बड़ी यंत्रणा थी। चुप रहना असंभव था। परमेश्वर का वचन उसमें एक जीवित सत्ता थी, जो उसकी इच्छा के विरुद्ध भी उससे बोलवाती थी। उसने स्वयं को अभिशप्त पाया – शापित इस सत्य से, जिसे वह न तो पूरी तरह से ग्रहण कर पा रहा था, न त्याग पा रहा था।

और तभी, उस अकेलेपन के बीच, एक विश्वास – नाजुक, किंतु अनजाने ही उग आया – ने उसे सहारा दिया। उसने कहा, अपने से ही, पर उस आवाज में अब विद्रोह नहीं, एक थकी हुई समर्पण थी, “पर यहोवा उन हिंसक लोगों के संग है, जो जीवन के लिए लड़ते हैं। उसने मुझ पीड़ित का पक्ष लिया है।”

ये शब्द बाहर से नहीं आए थे। वे उसकी अपनी स्मृति के कुएँ से निकले थे, उन्हीं वचनों में से जो उसने कभी लिखे थे या सुने थे। पर उस पल, वे सिर्फ शब्द नहीं रहे। वे एक आधार बन गए, एक ऐसा पत्थर जिस पर खड़ा होकर वह इस अंधेरी निराशा के सागर से बाहर निकल सके।

दरवाजा खुला। रोशनी इतनी तेज थी कि यिर्मयाह की आँखें चुंधिया गईं। पशहूर खड़ा था, उसका चेहरा अब भी गंभीर था। “एक दिन और एक रात,” उसने कहा, जैसे कोई रिपोर्ट पढ़ रहा हो। “अब जा।”

उसे बाहर धकेला गया। ताजी हवा के झोंके ने उसके चेहरे को छुआ, पर वह अब पहले वाला यिर्मयाह नहीं रहा। शारीरिक पीड़ा थी, भूख की कमजोरी थी, पर भीतर कुछ जम गया था। एक निश्चय।

वह सीधा पशहूर के पास गया। उसकी आँखों में अब डर नहीं था, न ही गुस्सा। एक साफ, स्पष्ट दृढ़ता थी। और उसने फिर से बोलना शुरू किया। शब्द वही थे – बाबुल, बंधुआई, विनाश। पर इस बार, उनमें एक नया स्वर था। वह सिर्फ पशहूर से नहीं कह रहा था। वह स्वयं से कह रहा था, उस अंधेरी कोठरी में बैठे हुए

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