पवित्र बाइबल

खाली कब्र और जी उठा मसीह

भोर का अँधेरा धीरे-धीरे पतला हो रहा था। पूर्वी आकाश में एक फीका सा प्रकाश की रेखा दिखी, जैसे कोई चाक से हल्की सी लकीर खींच गया हो। हवा में नमी थी, और ठंडक हड्डियों तक चुभती थी। मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम, जो याकूब की माँ थी, चुपचाप उस संकरी पगडंडी पर चल रही थीं। उनके हाथों में महँगे सुगंधित मसाले थे, जो उस शनिवार को जल्दबाजी में तैयार नहीं किए जा सके थे। उनके पैरों के नीचे कंकड़ खिसकते, एक एकाध बार कोई दूर बैठा उल्लू बोल देता। शहर सो रहा था, पर उनकी आत्माओं में एक भारी, स्थिर दर्द जाग रहा था। वे उस कब्र की ओर बढ़ रही थीं, जहाँ उन्होंने अपनी सारी आशा दफन कर दी थी।

“पत्थर,” दूसरी मरियम ने अचानक फुसफुसाते हुए कहा, जैसे अभी याद आया हो। “वह बहुत भारी है। हम दोनों कैसे हटाएँगे?” मरियम मगदलीनी ने कोई जवाब नहीं दिया। उनके मन में भी यही प्रश्न काँटे की तरह चुभ रहा था। पर वे चलती रहीं। करना कुछ नहीं था, पर करते रहना ही शायद शोक का तरीका था।

जब वह बगीचा नज़दीक आया, तो पहला आश्चर्य हुआ। पहरेदार, जो रोम की शान होते थे और जिनके चेहरे पर हमेशा एक ठंडी, अलग-थलग सतर्कता रहती थी, वे कहीं दिख नहीं रहे थे। फिर, जैसे ही उन्होंने कब्रगाह का घेरा देखा, जमीन ने एक हल्का सा झटका दिया। यह कोई साधारण भूकंप नहीं था, बल्कि ऐसा लगा जैसे पृथ्वी की नींद में कोई विशाल प्राणी करवट बदल रहा हो। आकाश से एक तेज रोशनी उतरी, बिजली की तरह कौंधी पर बिना गर्जन के। और फिर, वहाँ, उस बड़े, गोल पत्थर पर, जिसे हटाने की चिंता में वे डूबी हुई थीं, एक व्यक्ति बैठा था।

‘व्यक्ति’ कहना भी उसके तेज के सामने अपर्याप्त था। उसके वस्त्र बर्फ जैसे उजले थे, पर नेत्रों को चुभते नहीं थे। उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति और प्राधिकार था जो राजाओं में भी नहीं होता। पत्थर, वह विशाल पत्थर जो कब्र के मुँह पर लुढ़काया गया था, एक तरफ खिसक चुका था, जैसे कोई बच्चा एक मनका हटा दे।

दोनों स्त्रियाँ जमीन पर गिर पड़ीं। डर से उनकी साँसें रुक सी गई थीं। यह मृत्यु का दूत था? परन्तु उसने जो कहा, उसकी आवाज़ में कोई डरावनी बात नहीं थी। वह आवाज़ गरजती नहीं, मधुर थी, पर उसमें एक ऐसा सामर्थ्य था जो हड्डियों तक को हिला दे।

“डरो मत,” उसने कहा। “मैं जानता हूँ कि तुम यीशु को ढूँढ़ रही हो, जो क्रूस पर चढ़ाया गया था। वह यहाँ नहीं है; जैसा कि उसने कहा था, वह जी उठा है। आओ, उस स्थान को देखो जहाँ प्रभु को लिटाया गया था।”

धीरे-धीरे, काँपते हुए घुटनों के बल, वे उठीं। कब्र की उस गुफा में झाँका तो सचमुच, वह लिहाफ, जिसमें उन्होंने उसका शव लपेटा था, साफ-सुथरा तह करके एक ओर रखा हुआ था। सिर के पट्टे को अलग लपेटकर रखा गया था। वहाँ कोई शव नहीं था। केवल एक खाली जगह थी, और एक सन्नाटा जो अब डरावना नहीं, बल्कि पवित्र लग रहा था।

“अब शीघ्र जाओ, और उसके चेलों से कहो कि वह मरे हुओं में से जी उठा है,” उस तेजवान व्यक्ति ने कहा, और उसकी आँखों में एक चमक थी। “देखो, वह तुमसे गलील में मिलने के लिए आगे जाता है। वहाँ तुम उसे देखोगे। मैंने तुमसे कह दिया है।”

वे पलटीं, और भागे। उनके पैरों में अब वह थकान नहीं थी, डर और एक अकथनीय आनन्द का मिश्रण उन्हें उड़ा लिए जा रहा था। हवा अब ठंडी नहीं लग रही थी; पक्षी चहचहा रहे थे, और सूरज की पहली किरणें पहाड़ियों की चोटी को सोने जैसा चमका रही थीं। जी उठा? क्या यह संभव था? पर उस खाली कब्र, और उस दूत के वचनों ने उनके हृदय में एक ऐसी आशा की लौ जला दी थी जो असंभव को भी सम्भव बना देती है।

तभी रास्ते में, अचानक, वह स्वयं खड़ा था।

“नमस्ते,” उसने कहा।

वह कोई भव्य, तेजोमय प्रकटन नहीं था। वह वही यीशु था, पर अब उसके चेहरे पर क्रूस का क्लेश नहीं, बल्कि एक गहरी, अटूट शान्ति थी। उन्होंने तुरंत उसे पहचान लिया। वे दौड़कर गईं और उसके चरणों पर गिर पड़ीं, उन्हें स्पर्श किया। वह वास्तविक था, ठोस। उसके पैरों पर मिट्टी लगी थी, उसकी चप्पल घिसी हुई थी।

“डरो मत,” उसने फिर कहा, और उसकी आवाज़ में वही परिचित करुणा थी। “जाओ, मेरे भाइयों के पास संदेश दो कि वे गलील चले जाएँ। वहाँ वे मुझे देखेंगे।”

यह कहकर वह मुस्कुराया, एक ऐसी मुस्कान जिसमें समस्त मृत्यु पर विजय का आनन्द समाया हुआ था, और फिर वह रास्ते के एक मोड़ पर ओझल हो गया।

उनकी दौड़ अब और तेज हो गई। शहर में, उन सब के पास, जो शोक में डूबे हुए थे, उन्होंने यह समाचार सुनाया। पहले तो विश्वास नहीं हुआ। पतरस और यूहन्ना ने स्वयं दौड़कर कब्र देखी। खाली लिहाफ। अलग रखा हुआ सिर का पट्टा। वे हैरान लौटे। पर धीरे-धीरे, जैसे सुबह का सूरज पूरे आकाश में फैलता है, वैसे ही यह सच्चाई उनके मन में उतरने लगी।

जब ग्यारह चेले निर्धारित पहाड़ी पर गलील में इकट्ठा हुए, तो उनके मन में अभी भी संदेह थे। कुछ विश्वास करते थे, कुछ सोचते थे कि यह कोई भ्रम है। परन्तु तभी, बिना किसी शोर-शराबे के, वह उनके बीच आ खड़ा हुआ। हवा नहीं लहराई, दरवाज़ा नहीं खुला। बस, वह वहाँ था।

“मेरे पास सारा अधिकार स्वर्ग और पृथ्वी पर दिया गया है,” उसकी आवाज़ गूँजी, न कोई चिल्लाहट, न ही घमण्ड। एक साधारण कथन, जैसे कोई स्पष्ट सत्य बता रहा हो। “इसलिए तुम जाकर सभी जातियों के लोगों को चेला बनाओ, उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो। और उन्हें वह सब कुछ मानना सिखाओ, जिसकी आज्ञा मैंने तुम्हें दी है। और देखो, मैं संसार के अन्त तक सदैव तुम्हारे साथ हूँ।”

ये शब्द, उस पहाड़ी की हवा में लटके रह गए। भय धीरे-धीरे विश्वास में बदला। संदेह आदर में परिवर्तित हो गया। उन्होंने देखा कि वह जो क्रूस पर मरा था, वही अब जीवित है, और उसका राज्य अब किसी भूमि तक सीमित नहीं, बल्कि सारे संसार, और समस्त सृष्टि तक फैलने वाला था।

और जब वे उतरे, तो उनके कदमों में एक नई दृढ़ता थी। अब वे केवल शोक करने वाले नहीं रहे। वे साक्षी थे। और वह वादा, “मैं तुम्हारे साथ हूँ,” उनके हृदय में एक ऐसी गर्माहट भर गया था जो किसी भी सुबह की ठंड को दूर कर सकती थी।

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