वह कमरा शाम की लंबी छायाओं में डूबा हुआ था। एक पुरानी मेज़ पर बिखरे हीरे, पांडुलिपियों के पन्ने और एक टिमटिमाते हुए दीये की रोशनी में उभरते अक्षर। प्रकाश ने ‘रोमियों’ शब्द पर ज़ोर दिया था, फिर ‘अध्याय सात’। अनिल ने आँखें मूंद लीं, लेकिन शब्द उसकी पलकों के पीछे से भी जलते रहे—‘मैं शरीरिक हूं, पाप पर बेचा गया हूं।’
बाहर बारिश की बूंदों की आवाज़ थी, एक अनियमित ताल, जो उसके विचारों से टकराती। वह केवल छात्र नहीं था, एक खोजी था। परन्तु आज की खोज उसके भीतर के जंगलों में भटक रही थी। पौलुस के ये शब्द कोई सिद्धांत नहीं, कोई दूर का पत्र नहीं लग रहे थे। ये उसकी अपनी साँस की सरसराहट थी।
उसे याद आया बचपन का वह दिन, जब उसने पहली बार चोरी की थी—बाज़ार से चमकता हुआ एक काँच का मार्बल। उसकी माँ ने पूछा भी नहीं, पर उस रात उसकी नींद में एक पत्थर दबा रहा, उसकी छाती पर। वह जानता था कि गलत है, फिर भी उसने उस हरे रंग के टुकड़े को अपनी मुट्ठी में भींचा रखा। क्या यही वह ‘दूसरा नियम’ था, जिसकी बात पौलुस कर रहा था? वह नियम जो मन को पवित्र बताता है, पर शरीर एक और ही गीत गाता है।
कॉलेज के दिन… वह प्रार्थनाएँ, वह प्रतिज्ञाएँ। ‘आज से मैं धैर्यवान बनूँगा।’ और फिर उसी शाम, एक तुच्छ बात पर छोटे भाई पर चिल्ला देना। क्रोध की उस लहर के बाद का सन्नाटा, जब वह अकेले में बैठकर अपने हाथों को देखता—ये वही हाथ हैं जो सुबह परमेश्वर के लिए उठे थे? एक तरफ वह आत्मा थी, जो परमेश्वर के नियम से प्रसन्न होती, जो भलाई चाहती। दूसरी तरफ यह शरीर, यह मन, जो एक भिन्न धुन पर नाचता। जैसे कोई दो व्यक्ति एक ही देह में रह रहे हों, और लगातार झगड़ रहे हों।
वह उठकर खिड़की के पास गया। बारिश थम चुकी थी, पेड़ों से पानी टपक रहा था। एक गहरी थकान उसे छू गई। यह संघर्ष कितना थकाऊ था। अच्छा करना चाहता हूँ, पर कर नहीं पाता। बुरा करना नहीं चाहता, फिर भी वहीं जा पहुँचता हूँ। पौलुस ने ठीक कहा था—‘मुझ में, अर्थात मेरे शरीर में, कोई भलाई बसी नहीं।’ यह अपने भीतर झाँकना काँटों से भरे कुएँ में उतरने जैसा था।
तभी उसकी नज़र पांडुलिपि के अंतिम हिस्से पर पड़ी। वह वाक्य जो पहले कई बार पढ़कर भी उतरा नहीं था। ‘मैं अपने आप से क्या कहूं? यह कि मेरी दशा के लिये परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा है।’ अनिल ने पल भर रुककर सांस ली। यह कैसा मोड़ था? इतनी हार, इतनी लड़ाई के बीच धन्यवाद?
उसे समझ आया। पौलुस अपनी शक्ति की बात नहीं कर रहा था। वह उस नियम की बात कर रहा था, जो उसे पाप का बोध कराता था, उसे दिखाता था कि वह अपने बल से कुछ नहीं कर सकता। यह पहचान, यह टूटना… यही तो पहला कदम था मुक्ति की ओर। जब तक वह अपने भीतर के ‘अच्छे व्यक्ति’ पर भरोसा करता, वह केवल निराश होता। पर जब वह अपनी पूर्ण असहायता स्वीकार करता, तब ही वह उस सहारे की ओर देख पाता जो उससे बाहर था—मसीह।
उसने दीया बुझाया नहीं। अंधेरे में खिड़की से बाहर देखता रहा। बादल छंट रहे थे, और एक तारा टिमटिमा रहा था। उसके भीतर का युद्ध खत्म नहीं हुआ था। कल फिर वही लालसाएँ, वही कमज़ोरियाँ उठ खड़ी होंगी। पर अब एक भिन्न दृष्टि मिली थी। यह संघर्ष उसे निराश नहीं, वरन एक सत्य की ओर ले जाता था—वह स्वयं नहीं, कोई और ही उसकी आशा है। जैसे किसी ने उस हरे मार्बल को, जो अब तक उसकी मुट्ठी में दबा था, उसकी हथेली पर रख दिया हो। अब वह उसे पकड़ भी सकता था, और छोड़ भी सकता था। यह चुनाव अब पूरी तरह उस पर नहीं, उस आत्मा पर था जो अब उसमें वास करने लगी थी।
बारिश की ताज़गी हवा में तैर रही थी। अनिल ने पन्ने समेटे। आज रात का पाठ पूरा हुआ। नहीं, शायद अभी शुरू हुआ था।




