पवित्र बाइबल

धनी और लाजर की शिक्षाप्रद कथा

यह कहानी है एक धनी व्यक्ति की, जिसका नाम था एलियाह। वह यरूशलेम के एक विशाल भवन में रहता था, जिसके द्वार पर बैंगनी और महीन सनी के परदे लटकते थे। उसका जीवन उत्सव और विलासिता से भरा था। हर दिन उसके आँगन में भोज का आयोजन होता, जहाँ मेहमान बढ़िया पकवानों का आनंद लेते, और दाखरस के घूँटों के साथ हँसी-ठिठोली गूँजती। उसके वस्त्र इतने बारीक होते कि स्पर्श मात्र से ही कोमलता का अहसास होता।

उसी भवन के बाहर, एक गरीब आदमी था, लाजर नाम का। उसके शरीर पर फोड़े थे, और वह धूल में पड़ा रहता। वह केवल उन टुकड़ों की आशा में द्वार पर बैठा रहता, जो धनी के मेज से गिर जाते थे। कुत्ते आकर उसके घाव चाटते, और वह उन्हें हटाने का भी प्रयास नहीं कर पाता। उसकी आँखों में एक गहरी पीड़ा थी, परंतु एक अद्भुत शांति भी विद्यमान थी, मानो वह किसी अनदेखी सत्य को जानता हो।

समय बीतता गया। एक दिन लाजर की मृत्यु हो गई। स्वर्गदूतों ने आकर उसे उठाया और इब्राहीम की गोद में पहुँचा दिया। वहाँ उसे सुख और शांति मिली, जिसकी कल्पना भी संसार में नहीं की जा सकती थी।

कुछ दिनों बाद धनी एलियाह की भी मृत्यु हो गई। उसे दफनाया गया, सम्मान के साथ। परंतु जब उसकी आत्मा ने अपनी आँखें खोलीं, तो वह एक ऐसे स्थान पर था जहाँ अग्नि की लपटें चारों ओर थीं। वह अत्यधिक पीड़ा में था। जब उसने दूर देखा, तो इब्राहीम को पहचान लिया, और उनकी गोद में लाजर को विराजमान देखा।

उसने कराहते हुए पुकारा, “हे पिता इब्राहीम, मुझ पर दया करो! लाजर को भेजो कि वह अपनी उँगली का पानी भिगोकर मेरी जीभ को ठंडक पहुँचाए, क्योंकि मैं इस ज्वाला में बहुत त्रास पा रहा हूँ।”

इब्राहीम ने उत्तर दिया, “हे पुत्र, याद करो कि तूने अपने जीवन में अच्छी वस्तुएँ पाई थीं, और लाजर ने बुरी। अब वह यहाँ सांत्वना पा रहा है, और तू त्रास पा रहा है। और इसके अलावा, हमारे और तुम्हारे बीच एक बड़ी गहराई निश्चित की गई है, ताकि जो यहाँ से तुम्हारे पास जाना चाहें, वे न जा सकें, और न ही वहाँ से कोई हमारे पास आ सके।”

तब धनी ने विनती की, “तो हे पिता, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि लाजर को मेरे पिता के घर भेजो, क्योंकि मेरे पाँच भाई हैं। वह उन्हें चेतावनी दे सके, ताकि वे भी इस यातना के स्थान में न आएँ।”

इब्राहीम ने कहा, “उनके पास मूसा और भविष्यद्वक्ता हैं, उनकी सुनें।”

धनी ने कहा, “नहीं, हे पिता इब्राहीम, परंतु यदि मरे हुओं में से कोई उनके पास जाएगा, तो वे मन फिराएँगे।”

इब्राहीम ने अंतिम शब्द कहे, “यदि वे मूसा और भविष्यद्वक्ताओं की नहीं सुनते, तो यदि कोई मरे हुओं में से भी जी उठे, तौभी उनका विश्वास नहीं करेंगे।”

और यह कहानी यहीं समाप्त होती है, एक चेतावनी के साथ, एक गूँज के साथ, जो हृदय की गहराई में उतर जाती है। यह हमें याद दिलाती है कि इस पार की दुनिया में हमारे चुनाव, उस पार की नियति को तय करते हैं। और कभी-कभी, सबसे बड़ा अंधापन, वह होता है जो प्रकाश को देखने के बाद भी, उसे स्वीकार नहीं करता।

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