वह दिन कोरिंथ की गलियों में भीगी हुई धूप की तरह था, ऐसा लग रहा था मानो आसमान ने किसी बड़े दुःख को अपने नीलेपन में छुपा रखा हो। एलियास अपनी छोटी सी मिट्टी की दुकान के सामने बैठा, आँगन में फैले कुम्हार के चाक को देख रहा था, पर उसका मन वहाँ नहीं था। उसका मन तो उस पत्र में अटका था, जो कुछ हफ्ते पहले पौलुस ने भेजा था। शब्द अब भी उसके कानों में गूंजते थे, जैसे कोई नासूर बन गए हों।
पहले तो क्रोध आया था। इतना तीखा क्रोध कि उसने पत्र के वाहक तीतुस को भी दुत्कार दिया था। “हम पर अत्याचार का आरोप लगा रहा है पौलुस? जिसने हमें सत्य का मार्ग दिखाया, वही अब हमारी नीयत पर सवाल उठा रहा है?” उसकी आवाज़ गलियारों में गूंजी थी। पर तीतुस चला गया, और वह क्रोध भी, एक विचित्र शांत खालीपन में बदल गया। रातों की नींद उड़ गई। जब वह मिट्टी के बर्तनों को आकार देता, तो पौलुस के शब्द ही उसके हाथों में काँटे बन जाते – “तुम्हारे विषय में मेरी सारी बातें सच साबित हुई हैं।”
एक शाम, जब समुद्र से आने वाली हवा नमक और दूर के जहाज़ों की गंध लिए आ रही थी, एलियास अपने पुराने मित्र मार्कस की चर्मशाला में बैठा था। चमड़े की तीखी गंध हवा में थी। “मार्कस,” उसने आवाज़ में एक थकान लिए कहा, “क्या सच में हमने पौलुस का हृदय दुःखी किया है? वह पत्र… वह सिर्फ डाँट नहीं था। उसमें एक ऐसा दर्द था, जैसे पिता का, जिसका बेटा रास्ता भटक गया हो।”
मार्कस ने अपने हाथों पर लगे रंग को एक कपड़े से पोंछा। “मैंने भी वही सोचा। पहले लगा, वह हमें शर्मिंदा कर रहा है। पर फिर लगा… शायद यह शर्मिंदगी नहीं, एक तरह का… खेद है। जैसे परमेश्वर की ओर से आई कोई चेतावनी।”
वह शब्द – ‘खेद’ – हवा में लटक गया। एलियास ने देखा, उसके अपने हृदय में भी वही था। पौलुस के शब्दों ने एक आईना सामने रख दिया था। उसने याद किया, कैसे उन्होंने एक विवाद में, अपने ही विश्वासी भाई की पीठ पीछे निंदा की थी। कैसे दान के नाम पर इकट्ठा किए गए धन को लेकर छोटी-छोटी ईर्ष्या की अग्नि उनके बीच सुलगती रहती थी। यह सब ‘अविश्वास’ नहीं था, पर यह सब ‘पूर्ण समर्पण’ भी तो नहीं था। पौलुस का दुःख संदेह से नहीं, प्रेम से उपजा था। और इस प्रेममय दुःख ने, एलियास के भीतर एक ऐसा खेद जगाया जो मनुष्यों के कारण नहीं, बल्कि परमेश्वर के सामने अपनी कमी देखने के कारण पैदा हुआ था।
फिर तीतुस लौटा। उसके चेहरे पर वह कठोरता नहीं थी जो एलियास ने पहली मुलाकात में देखी थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “एलियास,” उसने कहा, “पौलुस ने तुम सबकी प्रतीक्षा की। वह त्रोआस में था, सुसमाचार के द्वार खुले थे, पर उसका मन तुम्हारे विषय में व्याकुल था। जब तक मैं तुमसे मिला नहीं, उसे चैन नहीं था।”
और फिर तीतुस ने जो कहा, वह एलियास के लिए एक बारिश के पहले बूंदों जैसा था। उसने बताया कि पौलुस का वह कठोर पत्र पढ़कर, कोरिंथ की मण्डली में हलचल मच गई। पर यह हलचल विद्रोह की नहीं थी। यह एक गहरी, सच्ची पीड़ा की थी। लोग एकत्र हुए। प्रार्थना हुई। आँसू बहे। उस भाई से, जिसकी निंदा की गई थी, माफ़ी माँगी गई। दान के लिए इकट्ठा किए गए धन को लेकर हुई ईर्ष्या को स्वीकार किया गया और उसे साफ़ किया गया। “तुम्हारा खेद,” तीतुस ने कहा, उसकी आवाज़ कोमल थी, “परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हुआ। उसने तुम्हें किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाई। बल्कि, देखो, उसने कितना कुछ जगा दिया – तुम्हारी तत्परता, तुम्हारा पश्चाताप, तुम्हारा भय, तुम्हारी लालसा, तुम्हारी चिंता… पौलुस के प्रति तुम्हारा निष्कपट प्रेम।”
एलियास की आँखें नम हो गईं। यह वह बात थी। पौलुस का डर नहीं था वह। न ही केवल अपने किए पर पछतावा। यह कुछ गहरा था। उस पत्र ने उसे परमेश्वर के सम्मुख नग्न कर दिया था, और उस नग्नता में, उसने अपनी सच्ची तस्वीर देखी थी। और जिसने यह दिखाया, उसके प्रति कृतज्ञता और प्रेम उमड़ आया। यह खेद जो मनुष्य के कारण आया, परमेश्वर की ओर से आया, और उसने एक ऐसी मनःस्थिति बनाई जिससे कोई नुकसान नहीं, बचाव ही हुआ।
उस रात, एलियास ने मण्डली के अन्य लोगों को बुलाया। तीतुस उनके बीच में खड़ा था। कोई भाषण नहीं हुआ। बस, एक दूसरे की आँखों में देखा। और फिर, एक सहज प्रार्थना शुरू हुई, जो धन्यवाद में बदल गई। उस कठोर पत्र के लिए धन्यवाद। उस प्रेममय डाँट के लिए धन्यवाद, जिसने उन्हें भटकने से बचा लिया। एलियास ने महसूस किया, एक बोझ उतर गया है। वह बोझ दोष का नहीं, उस दोष को छुपाने का था। अब सब कुछ प्रकाश में था, और प्रकाश में, उसे एक अद्भुत स्वतंत्रता मिली।
जब तीतुस वापस जाने लगा, तो एलियास ने उसके हाथ में एक छोटा सा मिट्टी का दीपक रख दिया, जिस पर उसने एक मछली का चिह्न उकेरा था। “पौलुस को देना,” उसने कहा। “कहना, उसका दुःख व्यर्थ नहीं गया। उसने हमें बचा लिया।”
और जब तीतुस चला गया, तो एलियास ने कोरिंथ के ऊपर छाए आसमान की ओर देखा। बादल छंट गए थे। वह धूप, जो पहले भीगी हुई लगती थी, अब स्पष्ट और गर्म थी। कभी-कभी, सच्चा सुधार, डाँट से नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रेम से आता है जो दुःख सहने को तैयार हो। एक ऐसा खेद, जो दुनिया के लिए मृत्यु है, पर परमेश्वर की दृष्टि में, जीवन का मार्ग।




