पवित्र बाइबल

मीना की वापसी और न्याय

गाँव की सुबह धीरे-धीरे खुल रही थी। पूर्व दिशा में आकाश में हल्की लालिमा फैलने लगी थी, और ओस से भीगी हुई मिट्टी की सोंधी गंध हवा में तैर रही थी। शिला, जो गाँव के छोर पर एक कच्चे घर में अपने दो बच्चों के साथ रहती थी, आँगन में बैठकर गेहूँ के दाने चुन रही थी। उसका पति दो साल पहले बुखार से चल बसा था, और अब वह अपनी थोड़ी-सी जमीन और एक बकरी पर निर्भर थी। बकरी, जिसका नाम मीना था, न सिर्फ दूध देती थी, बल्कि शिला के बच्चों का एक साथी भी थी।

एक दिन, जब शिला अपने छोटे बेटे को लेकर पास के कुएँ पर पानी भरने गई, तब कुछ अनहोनी हो गई। घर लौटी तो आँगन का फाटक खुला पाया, और मीना गायब थी। उसका दिल धक् से रह गया। बकरी तो उसकी रोजी-रोटी थी, बच्चों के लिए दूध का एकमात्र सहारा। उसने इधर-उधर खोजा, पड़ोसियों से पूछा, लेकिन कहीं पता न चला। आखिरकार, उसकी नजर पड़ोस में रहने वाले रामसहाय के आँगन पर पड़ी। वहाँ, एक पेड़ से बँधी हुई, मीना चर रही थी।

रामसहाय गाँव का समझदार माना जाने वाला व्यक्ति था, लेकिन उसकी आदतें ठीक नहीं थीं। शिला ने हिम्मत बटोरी और उसके दरवाजे पर जाकर खड़ी हो गई। “रामसहाय भैया, यह बकरी तो मेरी है। कल रात मेरे आँगन से गायब हो गई थी।”

रामसहाय ने आँखें तरेरीं। “तुम्हारी बकरी? यह तो मेरी है। पिछले हफ्ते ही मैंने शहर से खरीदी थी।” उसकी आवाज में एक झूठी दृढ़ता थी।

शिला का गला भर आया। वह जानती थी कि अकेली विधवा के रूप में उसकी कोई सुनने वाला नहीं है। फिर भी, उसने गाँव के बुजुर्गों के पास जाने का फैसला किया। गाँव के चौपाल पर, पीपल के पेड़ के नीचे, तीन बुजुर्ग बैठे थे – नाथूराम, जो पूर्व मुखिया थे, विश्वनाथ, जो शास्त्रों के ज्ञाता थे, और यशोदा बाई, जो अपने न्याय के लिए जानी जाती थीं।

शिला ने सारा मामला रखा। आँखें नीची किए, कभी-कभी रुक-रुक कर। यशोदा बाई ने धीरे से कहा, “बेटी, तू घबरा न। हमारे यहाँ नियम हैं। परमेश्वर ने मूसा को जो दिए, उनमें साफ लिखा है – अगर कोई पड़ोसी की भेड़ या बैल चुराए, और वह उसके कब्जे में जीवित पाया जाए, तो उसे दोगुना लौटाना होगा।”

नाथूराम ने अपनी दाढ़ी सहलाते हुए कहा, “पर यहाँ तो बकरी है। और रामसहाय कह रहा है कि यह उसकी है। सबूत क्या है?”

विश्वनाथ जी, जो गहरे विचार में डूबे थे, बोले, “नियम यह भी कहता है कि चोरी का मामला न्याय के सामने आए। दोनों पक्षों की बात सुनी जाए। अगर चोर न पकड़ा जाए, तो घर के स्वामी को देवता के सामने लाया जाए, कि कहीं उसने ही अपने पड़ोसी का सामान न हड़प लिया हो।”

बातचीत होने लगी। कुछ लोग शिला पर दया खाते थे, तो कुछ रामसहाय की तरफदारी करते थे, क्योंकि वह कभी-कभार उन्हें छोटे-मोटे काम पर रख लेता था। फिर यशोदा बाई ने एक सुझाव दिया। “क्यों न हम बकरी को ही परखें? जानवर अपने मालिक को पहचानते हैं।”

सबने सहमति जताई। रामसहाय का चेहरा थोड़ा उतर गया। बकरी को चौपाल में लाया गया। शिला ने उसे पुकारा – “मीना!” बकरी ने कान खड़े किए, और फिर शिला की तरफ बढ़ने लगी। रामसहाय ने भी उसे आवाज दी, पर बकरी ने उसकी तरफ देखा तक नहीं। फिर शिला के बेटे, जो वहाँ खड़े थे, उनकी आवाज सुनते ही मीना दौड़कर उनके पास आ गई और उनके हाथ चाटने लगी।

चौपाल में सन्नाटा छा गया। सच सामने था। विश्वनाथ जी ने गंभीर स्वर में कहा, “नियम स्पष्ट है। चोरी करने वाले को दोगुना चुकाना होगा। रामसहाय, तुम्हें शिला को दो बकरियाँ देनी होंगी। एक उसकी मीना, और एक अपनी तरफ से हर्जाने के तौर पर।”

रामसहाय ने विरोध करना चाहा, पर गाँव की निगाहें उस पर टिकी थीं। उसने मन मारकर हाँ कर दी। पर शिला ने, जिसके चेहरे पर राहत के आँसू थे, धीरे से कहा, “मुझे बस मेरी मीना चाहिए। दूसरी बकरी आप रखें। पर कृपया, भविष्य में किसी गरीब का सहारा न छीने।”

उसकी यह बात सुनकर रामसहाय का सिर शर्म से झुक गया। विश्वनाथ जी मुस्कुराए। “तूने उस दयालुता का उदाहरण पेश किया है जो नियम के मूल में है। नियम सिर्फ दंड के लिए नहीं, बल्कि समाज में न्याय और करुणा का संतुलन बनाए रखने के लिए हैं।”

उस शाम, जब शिला मीना को वापस अपने आँगन में बाँध रही थी, तो उसका छोटा बेटा बोला, “माँ, आज मुझे लगा कि परमेश्वर हमारे साथ है।” शिला ने उसके सिर पर हाथ फेरा। “हाँ, बेटा। वह नियम के माध्यम से, और लोगों की अंतरात्मा के माध्यम से काम करता है। उसने हमें न्याय का रास्ता दिखाया है, ताकि छोटे-बड़े सभी सुरक्षित रह सकें।”

आकाश में तारे निकल आए थे, और गाँव में शांति थी। एक बकरी की चोरी का मामला छोटा लग सकता था, पर उस दिन, उस छोटे से गाँव में, निर्गमन के बाईसवें अध्याय के सिद्धांतों ने मूर्त रूप लिया था – पास के पड़ोसी की रक्षा करना, चोरी का दोगुना बदला देना, और ईमानदारी से न्याय की तलाश करना। और कहीं गहरे में, एक सबक यह भी था कि कानून का पालन, डर से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति सम्मान और परमेश्वर के प्रति आदर से होना चाहिए।

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