पवित्र बाइबल

सिय्योन पर प्रकट हुई अंतिम दृष्टि

वह सिय्योन की पहाड़ी पर खड़ा था, और हवा में एक अजीब सी गूंज थी, जैसे कोई दूर का सागर गरज रहा हो। उसकी आँखें आकाश की ओर टिकी थीं, जो शुद्ध नीलामणि की तरह चमक रहा था। फिर, ऐसा लगा जैसे स्वर्ग स्वयं हिल उठा। ध्वनि ने स्वर पकड़ा, और वह कोई स्वर नहीं था जिसे वह पहचानता। यह एक ऐसा गीत था, जो पृथ्वी के किसी भी वाद्य या गले से नहीं निकल सकता था – एक नई मधुर रचना। और फिर उसने उन्हें देखा।

वे एक श्वेत बादल पर खड़े थे, उनके सिर पर उज्ज्वल मुकुट थे, और उनके माथे पर एक नाम लिखा था जिसे पढ़ना उसकी समझ से परे था, फिर भी उसका अर्थ उसकी आत्मा में उतर गया : मेमने का नाम, और पिता का नाम। चौदह लाख चौवालीस हज़ार। उनके चेहरे ऐसे थे जैसे पीड़ा से गुजरकर शांति की एक ऐसी गहराई में पहुँच गए हों, जहाँ दुःख की कोई स्मृति भी दुःखद न रह जाए। उनके होंठों से वह नया गीत निकल रहा था, और केवल वे ही उसे गा सकते थे। वह गीत मुक्ति का था, एक ऐसी मुक्ति का जो केवल टूटकर, केवल अपना सब कुछ छोड़कर ही पाई जा सकती थी। उनकी आँखों में कोई कपट नहीं था; वे निर्मल थे, जैसे चट्टान से फूटता स्वच्छ जल। वह खड़ा देखता रहा, और उसके अपने हृदय में एक तड़प उठी – काश वह भी उस भीड़ में होता।

तभी आकाश के बीचों-बीच, एक और दृश्य उभरा। तीन आकृतियाँ, प्रकाश से घिरी हुई, पृथ्वी के सभी रहने वालों के ऊपर मँडराती हुई। पहला स्वर्गदूत अपने पंख फैलाए हुए था, और उसके मुँह से एक ऐसा शब्द निकला जो आकाश और पृथ्वी के बीच गूँज गया, “सर्वदेश के लोगों, और जातियों, और भाषाओं के लोगों को सनातन सुसमाचार सुनाओ। उस परमेश्वर का भय मानो, और उसकी महिमा करो, क्योंकि उसके न्याय करने का समय आ पहुँचा है। उस की उपासना करो जिसने आकाश, और पृथ्वी, और समुद्र, और जल के सोते बनाए।”

यह वही पुराना सुसमाचार था, पर इसमें एक नई, तीव्र तात्कालिकता थी। यह कोई कोमल निमंत्रण नहीं रह गया था; यह एक अंतिम घोषणा थी, जैसे किसी विशाल द्वार के बंद होने से पहले की आखिरी पुकार। वह नीचे धरती की ओर देखता है, जहाँ राज्यों और बाजारों में लोग व्यस्त थे, अपनी छोटी-छोटी दुनिया में मगन। क्या वे सुन पा रहे हैं यह गर्जना? या फिर उनके कानों ने इतनी हलचल और इतना शोर सुन-सुनकर सुनने की शक्ति ही खो दी थी?

पहले के बाद, दूसरा स्वर्गदूत आगे बढ़ा, और उसकी आवाज में एक विषाद की गूंज थी, “गिर पड़ी, वह बड़ी बाबेल गिर पड़ी, जिसने अपनी व्यभिचार की मदिरा सारी जातियों को पिलाई।” बाबेल – वह सब कुछ जो मनुष्य ने परमेश्वर के बिना, अपने बलबूते पर, अपनी शानो-शौकत के लिए बनाया था। उसकी चकाचौंध, उसका लालच, उसका घमंड। सब कुछ एक झूठा सहारा साबित होने वाला था। एक ऐसा महानगर जो सारे संसार को अपने जाल में फँसाए हुए था, अब उसकी नींव हिल रही थी। वह देख सकता था – धरती के तमाम राजप्रासाद, सोने-चाँदी के बाजार, विशाल मूर्तियाँ और ताकत के प्रतीक – सब कुछ धूल में मिलने को तैयार।

और फिर तीसरा। उसके चेहरे पर एक गंभीरता थी जो रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। उसकी आवाज किसी पिघलते हुए लोहे की तरह चरचरा रही थी, “यदि कोई उस जंगली पशु, और उसकी मूर्ति की पूजा करेगा, और अपने माथे या हाथ पर उसकी छाप लेगा, तो वह भी परमेश्वर के प्रकोप की मदिरा, जो उसके क्रोध के प्याले में खमीर रहित डाली गई है, पिएगा। और पवित्र स्वर्गदूतों और मेमने के सामने आग और गन्धक में यातना पाएगा। और उनकी यातना का धुआँ युगानुयुग उठता रहेगा, और जो उस जंगली पशु और उसकी मूर्ति की पूजा करते हैं, और जो कोई उसके नाम की छाप लेता है, उन्हें दिन और रात कभी चैन न मिलेगा।”

यह चेतावनी इतनी स्पष्ट, इतनी भयानक थी कि हवा भी जैसे जम गई। यह ‘छाप’ – एक निशानी जो बाहर से दिखाई नहीं देती, परंतु जिसे स्वयं व्यक्ति ने अपनी स्वतंत्र इच्छा से चुना होता। विश्वास की छाप, या अविश्वास की। आज्ञापालन की, या विद्रोह की। और उसका परिणाम – एक ऐसी यातना नहीं जो शरीर को नष्ट कर दे, बल्कि एक ऐसा सजग दुःख जो अनंत काल तक चले। यह सुनकर उसका सारा शरीर एक बार काँप उठा। यह परमेश्वर का न्याय था, शुद्ध और कठोर, जिसके आगे कोई बहाना, कोई छिपाव नहीं चल सकता था।

एक लंबी, दबी हुई खामोशी छा गई, जैसे पूरी सृष्टि साँस रोके इंतज़ार कर रही हो। फिर, उसने एक और आवाज सुनी। यह आवाज मेमने के समान थी, पर उसमें सिंह की गरज भी थी। “धीरज धरो,” वह आवाज कह रही थी, “जो पवित्र लोग हैं, जो परमेश्वर की आज्ञाओं को मानते और यीशु पर विश्वास रखते हैं, उनके लिए धीरज धरो।” यह शब्द उसके हृदय में उतर गए, ठीक वैसे ही जैसे प्यासे भूमि में जल। उन १४४,००० के चेहरे याद आए – उनकी शांति, उनकी पूर्णता। वह मार्ग कष्टदायी था, पर वही एकमात्र सच्चा मार्ग था।

अंतिम दृश्य उसकी आँखों के सामने खुला। देखो, एक श्वेत मेघ, और उस पर एक ऐसा व्यक्ति बैठा है जिसका चेहरा सूर्य के समान दैदीप्यमान है, और सिर पर स्वर्ण मुकुट। उसके हाथ में एक तीक्ष्ण दराँती है। और फिर स्वर्ग से एक और स्वर्गदूत निकलता है, जो जोर से पुकारता है, “अपनी दराँती चला और काट ले, क्योंकि काटने का समय आ पहुँचा है, और पृथ्वी की फसल पक चुकी है।”

बैठा हुआ व्यक्ति अपनी दराँती पृथ्वी पर चला देता है। और क्या विचित्र दृश्य है! पृथ्वी की फसल पक चुकी है। वह फसल मनुष्यों की है – उनकी आशाएँ, उनके कर्म, उनकी निष्ठाएँ, उनके विश्वास। सब कुछ परिपक्व हो चुका है, हर चीज ने अपना अंतिम रूप ले लिया है। अब छाँटने का समय है। दराँती चलती है, और पृथ्वी से एक भीड़ इकट्ठा की जाती है – वे जिन्होंने मेमने का अनुसरण किया, जो सच्चे हैं, जो निर्मल हैं। वे उस श्वेत बादल पर एकत्र होते हैं, उसी गीत को गाते हुए जो उसने पहाड़ी की चोटी पर सुना था।

फिर स्वर्ग का मंदिर खुलता है, और उसमें से एक और स्वर्गदूत निकलता है, जिसके हाथ में भी एक तीक्ष्ण दराँती है। और एक और स्वर्गदूत, वेदी से निकलकर आता है, और जोर से कहता है, “अपनी तीक्ष्ण दराँती चला, और पृथ्वी की दाखलताओं के गुच्छे काट ले, क्योंकि उसके अंगूर पक्के हो गए हैं।”

यह दूसरी कटाई है। यह दाखलता की कटाई है। और स्वर्गदूत ने अपनी दराँती पृथ्वी पर चलाई, और पृथ्वी की दाखलता काटी, और उसके पके हुए अंगूर परमेश्वर के कोप के महा कुण्ड में डाल दिए। और वह कुण्ड नगर से बाहर ले जाया गया, और उस कुण्ड से लहू निकला, और वह लहू घोड़ों की लगाम तक पहुँच गया। एक हज़ार छः सौ फर्लांग तक फैला हुआ।

यह प्रतिशोध की भयानक दृश्यावली थी। यह उन पके अंगूरों का रस था, जो मनुष्य के विद्रोह, हिंसा, छल और बाबेल के प्रेम में पककर तीखे और विषैले हो गए थे। यह वह शराब थी जिसे उन्होंने स्वयं चुना था, और अब उसे पीना ही था। यह न्याय का अपरिहार्य, भीषण पक्ष था।

धीरे-धीरे दृश्य धुँधलाने लगा। आकाश फिर से नीला और शांत हो गया। पहाड़ी पर खड़ा वह व्यक्ति एक गहरी, काँपती हुई साँस लेता है। उसके कपड़े पसीने से तर हैं, मानो उसने स्वयं एक भीषण संघर्ष किया हो। उसकी आँखों के सामने अभी भी वे दो फसलें तैर रही थीं – एक, जो मेमने के साथ बाद

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