पवित्र बाइबल

ऋणमुक्ति का सातवाँ वर्ष

वह सुबह ऐसी थी जैसे परमेश्वर ने आकाश को सफेद मलमल से पोंछ दिया हो। पहाड़ियों पर जैतून के पेड़ों के बीच से उतरती हवा में नमी और धूल का मिश्रण था। एलिय्याह अपनी झोंपड़ी के सामने बैठा एक पुरानी लकड़ी की पटिया पर जैतून दबा रहा था। उसकी मांसपेशियों में एक सुनहरा दर्द था, वह दर्द जो ईमानदार मेहनत के बाद आता है। सामने खेतों में गेहूं की बालियाँ सुनहरी होने लगी थीं, और हवा के झोंके से वे लहराती तो ऐसे लगतीं जैसे पहाड़ी स्वयं सोने का जामा पहने हिल रही हो।

उसी सुबह, शिमोन, गाँव के बुजुर्ग, ने सभा की घोषणा करवाई थी। सातवाँ वर्ष नजदीक था, और मूसा की व्यवस्था के अनुसार, इस वर्ष में ऋणों की माफी और कनान में बसे हर इब्रानी दास की स्वतंत्रता का प्रावधान था। एलिय्याह के मन में इस बात को लेकर एक उलझन सी थी। तीन वर्ष पहले, जब अकाल पड़ा था, तो उसने अपने पड़ोसी नादाब को पाँच चांदी के सिक्के उधार दिए थे। नादाब का खेत बरबाद हो गया था, उसकी पत्नी बीमार पड़ गई थी। एलिय्याह ने बिना ब्याज के, बस एक साधारण वचन पर, वह रकम दी थी। लेकिन अब तक नादाब में उसे लौटाने की सामर्थ्य नहीं आई थी। सातवें वर्ष की बात सुनकर एलिय्याह का मन एक अजीब द्वंद्व से भर गया। एक तरफ व्यवस्था का आदेश था – “जो कुछ तेरे भाई का तेरे हाथ में हो, उसे तू छोड़ दे।” दूसरी तरफ उसकी अपनी जरूरतें थीं। उसकी बेटी की शादी का खर्च, घर की मरम्मत… ये सब उस पैसे के बिना कैसे होते?

शिमोन ने सभा में कहा था, “भाइयो, यह कोई साधारण कानून नहीं है। यह हमारे परमेश्वर यहोवा की दृष्टि में हमारी परीक्षा है। क्या हमारा हृदय कंजूस होगा, या उदार? याद रखो, हम भी मिस्र में दास थे, और परमेश्वर ने हमें स्वतंत्र किया। उसकी दया हम पर बनी रहे, इसलिए हमें भी दयालु बनना होगा।”

एलिय्याह उन शब्दों को दोहराता रहा। वह नादाब के घर की तरफ देखता। वह झोंपड़ी, जिसकी छत सरकंडों से ढकी थी, हवा में हिलती लगती। नादाब का छोटा बेटा, रूबेन, एक बकरी के बच्चे के पीछे दौड़ रहा था। उसके पैरों में धूल के निशान थे, और उसकी हँसी पूरे मैदान में गूंज रही थी। एलिय्याह ने सोचा – क्या इस बच्चे के पिता को दास बनने देने का अर्थ यह नहीं कि यह बच्चा भी गरीबी के अँधेरे में खो जाएगा?

कुछ दिन बाद, जब एलिय्याह अपने खेत में काम कर रहा था, नादाब स्वयं उसके पास आया। उसके चेहरे पर शर्म और कृतज्ञता का एक मिला-जुला भाव था। “एलिय्याह,” उसने कहा, आवाज़ धीमी और थकी हुई, “तुम्हारा पैसा… मैं अभी तक नहीं लौटा पाया। जानता हूँ, सातवाँ वर्ष आ रहा है। तुम्हारा हक है कि तुम मेरी सेवा लो, मैं और मेरा परिवार तुम्हारे दास बन जाएँ।” उसकी आँखों में पानी था, पर उसने उसे बहने नहीं दिया।

एलिय्याह ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ हल रोक दिया। उसने नादाब की ओर देखा। उसके हाथों में छाले के निशान थे, उसकी पीठ झुकी हुई थी जैसे बोझ से दबी हो। वह सोचने लगा – व्यवस्था में यह भी तो लिखा है, “तू अपने भाई को कड़ी मनाई से न रोकना, न अपने हृदय में कंजूसी करना। तुझे अपने भाई को खुले हाथ से देना होगा।” क्या उसका कर्तव्य सिर्फ पैसा वापस लेना था, या अपने भाई को संकट से उबारना था?

उस शाम, एलिय्याह ने अपने परिवार को इकट्ठा किया। उसकी पत्नी मिरियम, बेटी एस्तेर और छोटा बेटा याकूब। उसने उन्हें सब कुछ समझाया। मिरियम चुप रही, फिर बोली, “परमेश्वर ने हमें आशीष दी है। हमारे खेत में फसल अच्छी हुई है। हमारी बकरियाँ स्वस्थ हैं। क्या हम उस आशीष को दूसरों तक नहीं पहुँचा सकते?” एस्तेर ने, जिसकी शादी की बात चल रही थी, कहा, “अब्बा, अगर नादाब चाचा दास बन जाएंगे, तो रूबेन की पढ़ाई कौन करवाएगा? वह तो होशियार लड़का है।”

अगली सुबह, एलिय्याह ने नादाब को फिर बुलाया। वह उसके साथ अपने खलिहान में गया, जहाँ गेहूं के ढेर सुगंधित हवा में लहरा रहे थे। “सुनो, नादाब,” एलिय्याह ने कहा, “तुम मेरे दास नहीं बनोगे। न तुम, न तुम्हारा परिवार। वह पाँच सिक्के… मैंने उन्हें छोड़ दिया है। सातवें वर्ष के नियम के अनुसार, वह ऋण माफ किया गया।” नादाब की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह कुछ बोल नहीं पा रहा था। एलिय्याह ने आगे कहा, “और सिर्फ इतना ही नहीं। मेरे खेत में काम करने वालों को जानवर चराने की जरूरत है। तुम्हारा बेटा रूबेन होशियार है। अगर तुम मानो, तो वह मेरी भेड़-बकरियाँ चराया करे, और बदले में मैं उसे पढ़ने-लिखने के लिए थोड़े सिक्के दिया करूंगा। तुम स्वयं मेरे साथ खेत के काम में हाथ बंटा सकते हो, जब तक तुम्हारी अपनी फसल न हो जाए।”

नादाब की आँखों से आँसूओं की धारा बह निकली। वह एलिय्याह के पैरों पर गिरना चाहता था, पर एलिय्याह ने उसे सम्भाल लिया। “नहीं, भाई,” एलिय्याह ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कंपन थी, “हम दोनों एक ही परमेश्वर की संतान हैं। मिस्र की गुलामी से जिसने हमें आजाद किया, उसकी यही इच्छा है कि हम एक-दूसरे के भार उठाएँ।”

उस सातवें वर्ष के अंत में, जब पतझड़ की हवा चलने लगी और अनार के पेड़ लाल मणियों से लद गए, गाँव में एक नया रिवाज शुरू हुआ। एलिय्याह और नादाब ने मिलकर, गाँव के कुछ और लोगों को साथ लेकर, एक छोटी सी पाठशाला शुरू की, जहाँ बच्चे व्यवस्था की शिक्षा के साथ-साथ लेखन-पठन भी सीख सकें। शिमोन ने एक दिन सभा में कहा, “देखो, भाइयो, यही है व्यवस्था का सच्चा अर्थ। यह कागज पर लिखे शब्द नहीं, बल्कि हृदय में उतरा हुआ प्रेम है। जब हम एक-दूसरे के लिए खुला हाथ रखते हैं, तो परमेश्वर की आशीष हमारे खेतों में, हमारे घरों में, और हमारे बच्चों के भविष्य में बरसती है।”

एलिय्याह उस दिन शाम को अपने दरवाजे पर खड़ा, दूर पहाड़ियों पर उगते तारों को देख रहा था। उसे लगा जैसे वह व्यवस्था का कोई शुष्क नियम नहीं, बल्कि एक जीवित वचन था, जो उसके और उसके पड़ोसी के बीच एक नया रिश्ता बुन रहा था। हवा में गेहूं की सुगंध थी, और कहीं दूर, एक बच्चे की हँसी गूंज रही थी। उसने महसूस किया कि स्वतंत्रता का वह सातवाँ वर्ष, सिर्फ ऋणों की माफी नहीं, बल्कि हृदयों से लोभ के बंधन तोड़ने का वर्ष था। और शायद, यही वह पवित्र भूमि थी, जिसका वादा परमेश्वर ने किया था – न सिर्फ धरती का टुकड़ा, बल्कि लोगों के बीच बसा हुआ करुणा

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