पवित्र बाइबल

कोढ़ से मुक्ति: एलियाब की वापसी

वर्षों से एलियाब ने अपनी छाया से ही बात की थी। उसकी त्वचा पर उभरे那些 सफेद धब्बे अब उसकी पहचान बन चुके थे। एक समय था जब वह शिलोह की गलियों में अपने परिवार के साथ चलता था, अब उसकी दुनिया खंडहर हो चुके एक पुराने ओलिव के पेड़ और एक चट्टानी गुफा के बीच सिमटकर रह गई थी। कोढ़। यह शब्द हवा से भी हल्का था, पर इसका वजन उसकी आत्मा को कुचल देता था। जब भी कोई राहगीर दूर से दिखता, वह नियम के अनुसार चिल्लाता, “अशुद्ध! अशुद्ध!” उसकी आवाज़ में वह अपनापन नहीं रहा था, बल्कि एक यंत्रवत् घोषणा थी, जैसे कोई पक्षी बार-बार एक ही स्वर लगा रहा हो।

एक सुबह, जब ओस की बूंदें जंगली तुलसी की पत्तियों पर मोतियों की तरह चमक रही थीं, एलियाब ने अपने हाथों को देखा। कुछ बदलाव था। वे घाव… सिकुड़ रहे थे? उसका दिल जोर से धड़कने लगा। क्या यह स्वप्न था? उसने कई दिन प्रतीक्षा की, हर सुबह सूरज की रोशनी में अपनी बांहों का निरीक्षण करता। सच था। चमड़ी साफ हो रही थी। एक आशा, तीव्र और डरावनी, उसके भीतर जागी। उसने याजकों के लिए संदेश भिजवाया।

याजक एलआजर, जिसकी दाढ़ी में पहले सफेद बाल झलकने लगे थे, दो युवा सहायकों के साथ शिविर से बाहर आया। उसकी आंखों में उदासीनता नहीं, बल्कि एक गंभीर जिम्मेदारी थी। उसने एलियाब को दूर से देखा, नियम के अनुसार। सात दिनों तक एलियाब अपनी गुफा के पास ही रहा, अब भी अलग, पर उसकी आंखों में एक नई चमक थी। सातवें दिन एलआजर फिर आया, और इस बार करीब आकर उसने उन स्थानों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण किया। चमड़ी स्वस्थ थी। याजक ने एक लम्बी सांस ली, और एक फैसला सुनाया: “शुद्धि के लिए तैयारी करो।”

फिर वह अनुष्ठान शुरू हुआ, जो इतना विचित्र और गहरा था कि एलियाब का मन उलझन से भर गया। एलआजर के एक सहायक ने एक मिट्टी के बरतन में ताजा पानी भरा। दूसरे ने जीवित पक्षियों का पिंजरा लाया – दो फुदकते हुए, निर्दोष गौरैया। इसोपोग की लकड़ी, लाल सूत और एजोव की पुल्पुली भी साथ लाई गई। एलियाब को खड़ा करके, याजक ने एक पक्षी को लेकर उस मिट्टी के बरतन के ऊपर, उस जीवनदायी पानी के ऊपर, वध कर दिया। लहू पानी में मिल गया। फिर उसने जीवित पक्षी को, इसोपोग की लकड़ी, लाल सूत और एजोव को उसी लहू-मिले पानी में डुबोया। एलियाब पर सात बार छिड़काव किया गया। हर बार पानी के छींटे उस पर पड़ते, वह एक कंपन महसूस करता, जैसे कोई पुराना ज़ंग लगा ताला टूट रहा हो। फिर वह जीवित पक्षी, अब अनुष्ठान का प्रतीक बनकर, खुली मैदानी भूमि की ओर उड़ा दिया गया। एलियाब की नज़र उसकी उड़ान पर टिकी रही, जब तक वह बिंदु आकाश में विलीन नहीं हो गया। उसकी आत्मा भी, लगता था, उसी स्वतंत्र पक्षी के साथ उड़ने लगी थी।

सात और दिनों का विराम। इस बार वह अपने तंबू में लौट आया, पर अभी भी पूरी तरह से नहीं। उसने अपने सिर के सारे बाल मुंडवा लिए, दाढ़ी कटवा ली, भौंहें तराश लीं। अपने वस्त्र धोए। यह बाहरी सफाई एक आंतरिक तैयारी थी। आठवें दिन, भोर में ही, वह पवित्र तंबू के द्वार पर खड़ा था। उसके हाथ में उसकी सामर्थ्य के अनुसार भेंट थी: दो नर-मेमने, एक मादा मेमनी, गेहूं का महीन आटा, और थोड़ा सा तेल। एलआजर ने पहले मेमने को पापबलि के रूप में चढ़ाया। उसने उसका कुछ लहू लेकर एलियाब के दाएं कान के लौये, अंगूठे के ऊपरी भाग और पांव के अंगूठे पर लगा दिया। लहू का स्पर्श ठंडा नहीं, एक अजीब सी गर्मी लिए हुए था, जैसे जीवन का सार उसके उन अंगों में प्रवेश कर रहा हो जो अब तक मृतप्राय थे। फिर तेल चढ़ाया गया। याजक ने अपनी हथेली में तेल लिया, और वही कृत्य दोहराया – कान, अंगूठा, पांव का अंगूठा। बाकी तेल उसने एलियाब के सिर पर उंडेल दिया। तेल की गंध, मीठी और पुष्ट, हवा में फैल गई। एलियाब की आंखों से आंसू बह निकले, चुपचाप, उसकी नई साफ हुई गालों पर रास्ता बनाते हुए।

शेष भेंट चढ़ाई गई। जब धुआं आकाश की ओर उठा, एलआजर ने एलियाब के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “तू शुद्ध है। अपने लोगों के बीच लौट जा।”

एलियाब मुड़ा। उसकी नज़र उस रास्ते पर पड़ी जो शिविर की ओर जाता था। उसकी पत्नी और बेटा दूर खड़े थे, उनके चेहरों पर अविश्वास और आशा का मिश्रण था। उसने एक कदम बढ़ाया, फिर दूसरा। हर कदम के साथ वह बोझ हल्का होता गया। वह अब वह आदमी नहीं था जो छाया से बात करता था। वह एलियाब था, जो अपने घर लौट रहा था। सूरज अब ठीक सिर के ऊपर था, और उसकी छाया, स्वस्थ और स्पष्ट, उसके पीछे चल रही थी, जैसे एक वफादार साथी।

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