पवित्र बाइबल

एन्दोर की टोन्हा और शाऊल

शाऊल ने अपने तम्बू के खम्भे से सहारा लेकर अपना भारी शरीर उठाया। गिलबोा की पहाड़ियों पर फिलिस्तीनियों की विशाल सेना के डेरे देखे जा सकते थे – असंख्य अलावों की लपटें जो उसकी आँखों में चुभती थीं, जैसे कोई दूसरा, विषैला तारागण। हवा में लोहे और पसीने की गंध थी। और एक और गंध – डर की। उसकी अपनी सेना के शिविर से फैलती वह सनसनी, जिसे वह छुपा नहीं पा रहा था।

उसके भीतर एक खालीपन था, एक सुनसान कुआँ। यहोवा ने उससे मुँह मोड़ लिया था। सपनों में कोई सन्देश नहीं आता था। उरिम के द्वारा कोई उत्तर नहीं मिलता था। नबी मौन थे। और शमूएल… शमूएल तो मर चुके थे। राजा के मन में उस पुराने नबी की याद कौंधी – उनकी कठोर आँखें, उनका स्पष्टवादी स्वर, जिसने एक दिन उसे राजा घोषित किया था और फिर… फिर उसकी अवज्ञा पर उसे त्याग दिया था। अब शमूएल की समाधि रामा में थी। एक ठंडी, चुप पत्थर की शिला।

“क्या कोई रास्ता नहीं है?” उसका स्वर फुसफुसाहट में डूब गया। उसके सेवक, जो उसे सालों से जानते थे, उनकी आँखों में भी वही प्रश्न था। एक सेवक ने साहस जुटाकर कहा, “सुनता है राजन, एन्दोर में एक स्त्री रहती है, जो… जो अवैध रीति से मरे हुओं की आत्माओं को बुला सकती है।”

शाऊल ने अपनी आँखें मूँद लीं। यहोवा की व्यवस्था स्पष्ट थी – ऐसे टोन्हों को देश में रहने का अधिकार नहीं। उसने स्वयं ही उनके विरुद्ध आज्ञा जारी की थी। पर अब? जब स्वर्ग स्वयं मौन हो, तो अग्नि के गड्ढे से ही सही, कुछ तो प्रकाश चाहिए। एक उत्तर। एक मार्गदर्शन। भले ही वह मार्गदर्शन किसी मृत व्यक्ति की छाया से ही क्यों न मिले।

“तैयार हो जाओ,” उसका स्वर भारी था। “हम रात में ही चलेंगे।”

अँधेरी, बिना चाँद वाली रात। शाऊल और उसके दो विश्वस्त सेवक साधारण वस्त्रों में, राजकीय चिन्हों से रहित, गिलबोा की पहाड़ियों से उतरे। एन्दोर का रास्ता कठिन था – संकरे पगडंडी, काँटों से भरे झाड़, और हर मोड़ पर डर कि फिलिस्तीनी गश्ती दल मिल जाएँ। उसकी साँसें फूल रही थीं, न केवल शारीरिक थकान से, बल्कि उस अपराधबोध से भी, जो उसके पेट में एक पत्थर की तरह दबा था। वह एक राजा था, और वह चोरी-छिपे, रात के अँधेरे में, एक टोन्हा के दरवाजे पर जा रहा था।

घर छोटा था, मिट्टी का बना, एक खिड़की से मंद रोशनी आ रही थी। दरवाजा खटखटाने की आवाज़ उस रात की निस्तब्धता में बहुत तेज़ लगी। अंदर से सावधान कदमों की आहट। दरवाजा एक झिर्री खुला। एक बुजुर्ग स्त्री की आँखें, चिंता से भरी, झाँक रही थीं।

“मेरे लिए किसी को बुलाओ,” शाऊल ने कहा, अपना स्वर दबाकर। “जिसे मैं तुम्हें नाम दूँ।”

स्त्री ने पीछे हटते हुए कहा, “तुम जानते हो कि शाऊल ने टोन्हों और भूत साधने वालों को देश से निकाल दिया है। तुम मेरी जान के दुश्मन क्यों बन रहे हो? मुझे मरवाना चाहते हो?”

शाऊल ने यहोवा की शपथ खाई – “यहोवा की जीवनता की शपथ, तुझे इस बात का कुछ दण्ड न होगा।”

थोड़ी देर की मौन लड़ाई के बाद, दरवाज़ा खुला। अंदर का कमरा मंद तेल के दीये से जगमगा रहा था। हवा में सूखी जड़ी-बूटियों और धूल की गंध थी। “किसे बुलाऊँ?” उसकी आवाज़ में थकान और अनुभव का भार था।

“शमूएल को बुलाओ।”

स्त्री के चेहरे पर एकाएक भय की लहर दौड़ गई। उसकी आँखें फैल गईं, उसने शाऊल को गौर से देखा, और चीख मारकर पीछे हट गई। “तुम! तुम शाऊल ही हो! तुमने मुझे धोखा दिया!”

“डरो मत,” शाऊल ने कहा, पर उसका स्वर हिल रहा था। “तूने क्या देखा?”

“मैंने… मैंने एक दिव्य पुरुष को भूमि में से उठते देखा। वृद्ध, एक लबादे में लिपटा हुआ।”

शाऊल का हृदय जोर से धड़का। वह जान गया। उसने दण्डवत की मुद्रा में भूमि को छू लिया।

और तब, वह प्रतिध्वनि सुनाई दी। वह आवाज़ नहीं थी, बल्कि एक स्मृति थी जो हवा में कंपन कर रही थी, उसके मस्तिष्क के भीतर गूँज रही थी। वही पुराना, अटल स्वर। शमूएल का स्वर।

“तूने मुझे क्यों व्याकुल किया है, मुझे यहाँ क्यों बुलवाया है?”

शाऊल, अपना मुँह जमीन से लगाए, हाँफता हुआ बोला, “मैं बहुत व्याकुल हूँ। फिलिस्तीनियों ने मुझ पर चढ़ाई की है, और परमेश्वर ने मुझ से अलग होकर मेरी सुनना बन्द कर दिया है। न तो भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा, न स्वप्न के द्वारा। इसलिए मैंने तुझे बुलवाया, कि तू मुझे बता दे कि मैं क्या करूँ।”

मौन। फिर वह कंपन फिर उठा, एक दुख और निर्णय से भरा हुआ।

“यदि यहोवा ने तुझ से अलग होकर तेरा साथ छोड़ दिया है, तो तू मुझ से क्यों पूछता है? यहोवा ने तेरे विषय में जो कहा था, वही उसने मेरे द्वारा पूरा किया है। उसने राज्य तेरे हाथ से छीनकर तेरे पड़ोसी दाऊद को दे दिया है। क्योंकि तू ने यहोवा की आज्ञा न मानी… इसलिए यहोवा ने भी तेरा यही हाल किया है। और कल ही इस्राएल की सेना के साथ तू भी फिलिस्तीनियों के हाथ में कर दिया जाएगा। और कल ही तू और तेरे पुत्र मेरे पास होंगे।”

ये शब्द नहीं, बल्कि हथौड़े की चोटें थीं। हर एक ने शाऊल के अस्तित्व को तोड़ डाला। वह अचानक बहुत बूढ़ा, बहुत थका हुआ लगने लगा। उसके शरीर में जान ही नहीं रही। वह जमीन पर ही पड़ा रहा, उसकी लम्बी देह बेजान सी। भूख-प्यास सब लुप्त हो गई थी। केवल एक चीज़ बची थी – उस भविष्यवाणी की निश्चितता, जो उसकी कब्र की मिट्टी जैसी ठंडी और भारी थी।

टोन्हा ने हिम्मत करके उसके पास आकर कहा, “सुन, मैंने तेरी आज्ञा मानी, मैंने अपनी जान हथेली पर रखकर तेरे कहे अनुसार किया। अब तू भी मेरी एक बात सुन। थोड़ा भोजन कर ले, ताकि तुझमें ताकत आए और तू अपना रास्ता जारी रख सके।”

धीरे-धीरे, सेवकों और उस स्त्री के समझाने पर, वह उठ बैठा। उस स्त्री ने, जिसे वह मरवाने आया था, उसके लिए एक पालतू बछड़ा जल्दी से हलाल किया, आटा गूँथा, और अखमीरी रोटियाँ सेंकी। यह उसकी आखिरी मुक्तिदायिनी कृपा थी। शाऊल ने थोड़ा खाया। स्वाद कुछ नहीं आ रहा था। फिर वह और उसके सेवक, उसी काली रात में, उसी डरावने रास्ते से वापस चले। पर अब, शाऊल के सामने केवल अँधेरा ही नहीं था। अब उस अँधेरे में, एक निश्चित, अपरिहार्य प्रातःकाल का अहसास था, जो धीरे-धीरे उगने वाला था। वह एक मृत व्यक्ति की तरह चल रहा था, जिसे अभी तक पता नहीं था कि वह मर चुका है।

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