यह वह समय था जब सुलैमान का राज्य दाऊद के दिनों की उस अशांति से बहुत दूर, एक गहरी शांति में डूबा हुआ था। चारों ओर विश्राम था। दिन बीतते थे और कोई युद्ध का डंका नहीं बजता था, न ही किसी पड़ोसी राज्य से कोई खतरा मँडरा रहा था। यह शांति महज एक राजनीतिक स्थिति नहीं थी; यह वह प्रतिज्ञा थी जो यहोवा ने की थी, और अब वह सुलैमान के आसपास एक मूर्त रूप ले चुकी थी।
एक दिन, जब यरूशलेम में वसंत की हवा जैतून के बागों से होकर महक रही थी, सुलैमान महल की छत पर टहल रहा था। उसकी नज़र उत्तर की ओर, लबानोन के those ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों पर पड़ी, जो दूर से नीले और हरे रंग के मिश्रण जैसे दिखाई दे रहे थे। और फिर उसकी यादों में वह दृश्य तैरने लगा – उसका पिता दाऊद, बूढ़ा और थका हुआ, उससे कह रहा था, “सुन, मेरे पुत्र। मेरे मन में था कि मैं हमारे परमेश्वर यहोवा के नाम के लिये एक भवन बनाऊँ। परन्तु यहोवा का वचन मेरे पास यह कहता हुआ आया कि तू बहुत लहू बहाया है और बड़े-बड़े युद्ध किए हैं… वह भवन तेरा पुत्र बनाएगा।”
यह बात, जैसे कोई बीज हृदय में गिर जाता है, सुलैमान के भीतर पल रही थी। अब शांति थी। अब समय आ गया था। परमेश्वर के नाम को एक स्थायी निवास देने का, वह प्रतिज्ञा पूरी करने का।
सुलैमान ने फैसला किया। वह सोर के राजा हीराम के पास, जो उसके पिता दाऊद का हमेशा मित्र रहा था, संदेश भेजेगा। उसने अपने दरबार के एक विश्वासपात्र दूत को बुलाया, और उसके हाथ में एक पत्र दिया। शब्द सोच-समझकर चुने गए थे, सम्मान से भरे हुए, पर उनमें एक राजा का दृढ़ संकल्प भी झलकता था। “तू जानता है कि मेरे पिता दाऊद, चारों ओर के युद्धों के कारण, यहोवा के नाम के लिये कोई भवन नहीं बना सके। परन्तु अब यहोवा ने मुझे चारों ओर विश्राम दिया है; न कोई विरोधी है, न कोई दुर्भाग्य का कारण। इसलिए देख, मैं यहोवा अपने परमेश्वर के नाम के लिये एक भवन बनाने का विचार कर रहा हूँ।”
पत्र आगे बढ़ता गया। “अतः अब आज्ञा दे कि लबानोन के वनों में से मेरे लिये देवदार के काष्ठ काटे जाएँ। मेरे सेवक तेरे सेवकों के संग रहेंगे, और मैं तेरे सेवकों की मजदूरी तुझे जो तू ठहराए, उसके अनुसार दूँगा। क्योंकि तू जानता है कि हमारे बीच सीदोनियों की तरह लकड़ी काटनेवाला कोई नहीं है।”
दूत सोर की ओर रवाना हुआ। रास्ता लंबा था, समुद्र के किनारे-किनारे, फिर पहाड़ियों से होता हुआ। जब वह हीराम के महल में पहुँचा और पत्र उसके हाथों में सौंपा, तो हीराम ने उसे पढ़ा। और पढ़कर वह बहुत प्रसन्न हुआ। उसकी आँखों में चमक आ गई। दाऊद का पुत्र, जिसकी बुद्धि और महिमा की चर्चा दूर-दूर तक फैल चुकी थी, उसने स्वयं उससे सहायता माँगी थी। उसने तुरंत एक उत्तर तैयार करवाया।
“आज मुझे वह पत्र मिला है जो तूने भेजा है,” हीराम ने लिखा। “मैं यहोवा को धन्य कहता हूँ जिसने दाऊद को तुझ जैसा बुद्धिमान पुत्र दिया, जो इस बड़ी प्रजा पर राज्य करने के योग्य है।” शब्दों में मित्रता थी, और एक सहयोगी की स्वीकार्यता। “मैं तेरी सब इच्छा पूरी करूँगा। देवदार और सनोबर के काष्ठ तुझे दिए जाएँगे। मेरे सेवक उन्हें लबानोन से समुद्र के किनारे ले आएँगे, और मैं उन्हें बेड़ों पर चढ़ाकर, तू जहाँ कहे, वहाँ पहुँचा दूँगा। और तू मेरे घराने के लिये भोजन की व्यवस्था करना।”
यह प्रतिक्रिया सुलैमान के लिए एक बड़ी स्वीकृति थी। अब काम शुरू हो सकता था। और यह कैसा विशाल काम था! सुलैमान ने पूरे इस्राएल से तीस हज़ार मजदूर चुनने का आदेश दिया। उन्हें बारी-बारी से काम पर लगाया जाना था – एक महीना लबानोन में, और दो महीने अपने घरों में। यह व्यवस्था कठोर नहीं, बल्कि व्यवहारिक थी, ताकि प्रजा पर बोझ न पड़े।
उसने अदोनीराम को, जो बेगार के कामों का अधिकारी था, इस कार्य पर नियुक्त किया। और फिर लबानोन के those घने, ऊँचे वनों में जीवन बदल गया। इस्राएल के मजदूर पहुँचे, और सीदोनियों के काटनेवालों के साथ मिलकर काम करने लगे। जंगल की हवा कुल्हाड़ियों की ठक-ठक से गूँजने लगी। विशाल देवदार के पेड़, जो सदियों से खड़े थे, एक के बाद एक धरती पर गिरने लगे। उनकी सुगंध इतनी तेज़ थी कि हवा में मिश्रित हो जाती थी। फिर उन्हें छीला जाता, आकार दिया जाता, और फिर उन भारी तनों को मजदूरों के समूह पहाड़ों से नीचे, समुद्र के किनारे तक खींचकर ले जाते। वह दृश्य अपने आप में विराट था – पसीने से तर मानव शरीर, रस्सियों के खिंचाव की आवाज़, और पेड़ों के धराशायी होने का गर्जन।
समुद्र के किनारे, एक और दल इन काष्ठों को बेड़ों में बाँधने में जुटा हुआ था। फ़ीनिकिया के अनुभवी नाविक इन बेड़ों को चलाते, और उन्हें इस्राएल के तट पर, याफा के बंदरगाह तक ले आते। वहाँ से फिर वही क्रम शुरू होता – इन विशाल लट्ठों को गाड़ियों पर लादकर, बैलों की जोड़ियों के सामने जोतकर, यरूशलेम की ऊँची पहाड़ी तक की कठिन चढ़ाई चढ़ाना। रास्ते में धूल उड़ती, पहिये चरमराते, और ड्राइवरों की आवाज़ें गूँजतीं।
पर केवल लकड़ी ही नहीं चाहिए थी। मंदिर की नींव और दीवारें तो विशाल पत्थरों की बननी थीं। इसलिए सुलैमान ने इस्राएल में ही अस्सी हज़ार खनिक और सत्तर हज़ार बोझ ढोनेवाले मजदूर तैयार किए। ये लोग यरूशलेम के आसपास की पहाड़ियों में, शहर से ही पत्थर काटने लगे। पहाड़ों के गर्भ से निकलते हुए सफेद, चिकने संगमरमर के विशाल पत्थर। कारीगर उन्हें ठीक नाप-तौल कर काटते, तराशते, ताकि वे बिना किसी हथौड़े या लोहे के औजार की आवाज़ किए, चुपचाप एक-दूसरे पर फिट हो सकें। यह आदेश था – पवित्र स्थल की नींव में कोई शोर नहीं होना चाहिए।
कभी-कभी सुलैमान स्वयं निर्माण स्थल पर आता। वह चुपचाप खड़ा रहता, उन हज़ारों हाथों को काम करते हुए देखता, जो उसकी एक इच्छा को साकार कर रहे थे। लकड़ी के ढेर बढ़ते जा रहे थे, पत्थरों की कतारें लंबी हो रही थीं। यह केवल एक भवन का निर्माण नहीं था; यह एक प्रतिज्ञा की पूर्ति थी। दाऊद के हृदय की अधूरी इच्छा अब अपने पुत्र के हाथों साकार हो रही थी। और सुलैमान जानता था कि यह उसकी अपनी सामर्थ्य से नहीं, बल्कि उस शांति के कारण संभव हुआ है जो यहोवा ने दी थी।
सूरज डूबता, और मजदूर थके हुए अपने शिविरों में लौटते। चारों ओर छाई धूल धीरे-धीरे बैठती, और रात की ठंडी हवा में लकड़ी की सुगंध तैरने लगती। यरूशलेम की पहाड़ी पर, जहाँ एक दिन स्वर्णिम कलश चमकेगा और यहोवा की महिमा विराजमान होगी, अभी केवल नींव के गड्ढे और पत्थरों के ढेर दिखाई देते थे। पर हर एक पत्थर, हर एक लट्ठा, एक प्रार्थना की तरह था – एक भविष्य की ओर इशारा करता हुआ, एक ऐसे स्थान का जो केवल पत्थर और लकड़ी का घर नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की आशा और विश्वास का केंद्र होगा। और सुलैमान, अपने महल की छत से उस ओर देखते हुए, समझता था कि यह सब कुछ, हीराम की मित्रता से लेकर मजदूरों के पसीने तक, एक ही दैवीय योजना के अंग थे। शांति ने इसका मार्ग प्रशस्त किया था, और अब कार्य अपनी गति से बढ़ रहा था।




