पवित्र बाइबल

दाऊद का मंदिर का सपना

यह उस समय की बात है जब दाऊद बूढ़ा हो चला था। वर्षों के युद्धों और भाग-दौड़ के बाद अब एक विचित्र सी शांति उसके राज्य में छाई हुई थी, मानो आकाश ने सांस ली हो। एक दिन, वह अपने महल की छत पर टहल रहा था। नीचे यरूशलेम शहर बस रहा था – पत्थरों पर हथौड़ों की आवाज़, बच्चों की किलकारियाँ, व्यापारियों का कोलाहल। पर दाऊद की नज़र इन सबसे परे, उस खाली पहाड़ी पर टिकी हुई थी जहाँ ओर्नान का खलिहान था। वही स्थान जहाँ एक बार स्वयं परमेश्वर के दूत ने विराम लिया था, और जहाँ दाऊद ने वेदी बनाकर यहोवा से प्रार्थना की थी।

एक ठंडी हवा का झोंका आया, और दाऊद ने अपने ऊपर लपेते हुए बड़े चोगे को कसकर समेट लिया। उसके मन में एक विचार कौंधा, जो अब तक केवल एक धुंधली इच्छा थी, वह अचानक स्पष्ट और दृढ़ हो उठा। “मेरे लिए तो यहोवा ने विश्राम दिया है,” उसने अपने मन में कहा, “अब समय आ गया है कि उसके नाम के लिए एक घर बने।”

उसने तुरंत हज़ारों कारीगरों, राजगीरों, और लकड़हारों को बुलवाया। देश के कोने-कोने से अनगिनत पत्थरों – सफ़ेद, भूरे, कुछ चमकीले – को काटकर लाया जाने लगा। लबानोन के देवदार के वनों से विशाल तने नावों और बैलगाड़ियों पर लदकर यरूशलेम पहुँचे। दाऊद स्वयं हर छोटे-बड़े काम में उत्साह से जुट गया। वह प्रतिदिन उस स्थान पर जाता, जहाँ भविष्य का मंदिर खड़ा होना था। उसने देखा कि कैसे पत्थर तराशे जा रहे हैं, कैसे लोहे के औज़ार तेज़ आवाज़ करते हुए धातु को आकार दे रहे हैं। हवा में लकड़ी के बुरादे और पत्थर की धूल की महक मिल जाती थी।

पर एक गहरी पीड़ा उसके उत्साह के नीचे दबी रहती। एक रात, जब चाँदनी खलिहान के खाली स्थान पर चांदी की चादर-सी बिछी हुई थी, दाऊद अकेला वहाँ बैठा रहा। उसकी आँखें नम थीं। उसने यहोवा की ओर मन ही मन कहा, “हे प्रभु, तूने मुझे इतना सब कुछ दिया। मैं एक चरवाहे से राजा बन गया। पर मेरे हाथ खून से सने रहे हैं। मैंने अनेक युद्ध लड़े। क्या मेरे हाथ… तेरे लिए एक शांति के स्थान का निर्माण कर सकते हैं?”

अगले दिन, उसने अपने पुत्र शलोमोन को बुलाया। शलोमोन अभी युवा था, पर उसकी आँखों में एक अद्भुत गंभीरता और बुद्धि झलकती थी। दाऊद ने उसके कंधे पर हाथ रखा और उसे उस पवित्र स्थान पर ले गया। “सुन, मेरे पुत्र,” दाऊद की आवाज़ भारी थी, भावनाओं से गद्गद, “मेरी इच्छा थी कि मैं स्वयं हमारे परमेश्वर यहोवा के नाम के लिए एक भवन बनाऊँ। पर उसका वचन मेरे पास आया। उसने कहा, ‘तूने बहुत रक्त बहाया है और बड़े-बड़े युद्ध किए हैं; इसलिए तू मेरे नाम का घर नहीं बना सकता। देख, तेरा एक पुत्र उत्पन्न होगा। वह शांति का व्यक्ति होगा, और उसके चारों ओर मैं शांति दूँगा। वही मेरे नाम का घर बनाएगा।'”

शलोमोन चुपचाप सुनता रहा, उसकी नज़र जमीन पर गड़ी हुई थी, मानो वह अपने भविष्य के भार को महसूस कर रहा हो।

“सुन, शलोमोन,” दाऊद ने आगे कहा, उसकी आवाज़ में अब एक दृढ़ता आ गई थी, “यहोवा तेरा साथ देगा। तू इस्राएल पर राज्य करेगा, और यहोवा की व्यवस्था और नियमों का पालन करने पर तेरा राज्य स्थिर रहेगा। साहस रख। हियाव बाँध। डर नहीं। देख, मैंने अपने सारे प्रयासों से इस यहोवा के भवन के लिए सोना-चाँदी, पीतल, लोहा, लकड़ी और रत्न जमा किए हैं। और भी बहुत कुछ है। अब तुझे और भी बढ़कर करना है। तैयार रहना। कारीगर तेरे साथ हैं। सब कुछ तैयार है। बस, एक बात याद रखना – यहोवा का भय मानते हुए, उसकी इच्छा के अनुसार यह कार्य पूरा करना।”

इसके बाद के दिनों में, दाऊद और भी सक्रिय हो गया। उसने इस्राएल के सभी प्रधानों, हज़ारों और सैकड़ों के अधिकारियों को एकत्र किया। जब वे सभी उपस्थित हुए, तो बूढ़े राजा ने, जिसके बाल सफ़ेद हो चले थे पर जिसकी आँखों में चिंगारी अभी भी बाकी थी, उन सबके सामने शलोमोन को नियुक्त किया। “यही मेरा पुत्र शलोमोन है,” उसने घोषणा की, “जिसे यहोवा ने चुना है। वह कोमल अवस्था का है, और यह कार्य विशाल है। पर यह भवन मनुष्यों के लिए नहीं, स्वयं सर्वशक्तिमान यहोवा के लिए है। इसलिए अब, हे इस्राएल के हाकिमों, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि तुम यहोवा अपने परमेश्वर की सहायता करो।”

और फिर, दाऊद ने अपनी सारी संपत्ति का, अपने निजी खज़ाने का, एक विस्तृत विवरण दिया। सोने के तोलों का, चाँदी की निधियों का, पीतल और लोहे के भंडारों का हिसाब दिया। उसने कहा, “मैंने अपने घर के सारे संसाधन इस पवित्र कार्य के लिए अर्पित कर दिए हैं। अब तुम्हारी बारी है। कौन है जो आज अपनी इच्छा से यहोवा के लिए अर्पण करेगा?”

यह सुनकर, प्रधानों और अधिकारियों के हृदय उमड़ पड़े। उन्होंने भी खुशी-खुशी सोना, चाँदी, पीतल और लोहा दिया। उस दिन एक अद्भुन उत्साह का वातावरण बन गया। लोगों ने देखा कि उनका बूढ़ा राजा, जिसने इतने वर्षों तक उनका नेतृत्व किया था, अब अपनी सारी आशा और विरासत एक युवा पुत्र के हाथों में सौंप रहा था, और वह भी परमेश्वर के एक महान स्वप्न के लिए।

कुछ दिनों बाद, दाऊद ने शलोमोन को फिर अपने पास बुलाया। अब उसके चेहरे पर एक गहरी शांति थी। “मेरा काम पूरा हुआ,” उसने कहा, “अब तेरा आरंभ होगा। यहोवा तेरे साथ रहे। उसकी आज्ञाओं पर चलते रहना। तब तू सफल होगा। जाओ, और यहोवा का भवन बनाओ।”

जब शलोमोन वहाँ से चला गया, तो दाऊद एक बार फिर अकेला रह गया। सूरज ढल रहा था, और खलिहान की पहाड़ी पर सुनहरी रोशनी बिखरी हुई थी। उसने आँखें बंद कीं। उसे लगा जैसे वह भविष्य के मंदिर की आवाज़ें सुन रहा है – भजनों की ध्वनि, प्रार्थनाओं की गूँज, और लोगों के आनंद के स्वर। उसके होठों पर एक मुस्कुराहट खेल गई। उसके हाथों ने युद्ध लड़े थे, पर उसके हृदय ने एक घर का सपना देखा था। और अब वह सपना, उसके पुत्र के हाथों में, साकार होने को था। हवा में शांति थी, और एक नए युग की प्रतीक्षा।

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