यरूशलेम की सुबह ठंडी और सूनी थी। हवा में अभी भी रात की नमी थी, और उजड़े हुए मकानों के खंडहरों पर ओस की बूँदें चमक रही थीं। नहेम्याह शहर की दीवार पर खड़ा था, उसकी नज़र उन चौड़ी, खाली गलियों पर टिकी थी जहाँ सिर्फ कंकड़ और उग आयी झाड़ियाँ दिखती थीं। दीवार तो बन गयी थी, दरवाजे लग गए थे, पर शहर की रगों में दौड़ने वाला जीवन-रक्त, यानी लोग, अभी भी बाहर ही थे। अधिकतर लोग यहूदा के गाँवों में बसे हुए थे, अपने-अपने खेतों और दाख की बारियों के पास। यरूशलेम का नाम सुनते ही उनके चेहरे पर एक अजीब सी दुविधा छा जाती – गर्व भी, और डर भी। गर्व इसलिए कि यह उनकी पवित्र नगरी थी; डर इसलिए कि यहाँ रहना खतरे से खाली न था। दुश्मनों की नज़र हमेशा इसी शहर पर रहती थी।
एक सभा बुलाई गयी। नहेम्याह ने सरदारों, लोगों और याजकों को इकट्ठा किया। बात सीधी थी। “हमने यहोवा की मदद से इस शहर की हिफाज़त के लिए दीवार खड़ी कर दी है,” उसकी आवाज़ में थकान नहीं, एक अटल निश्चय था। “पर एक शहर सिर्फ पत्थरों से नहीं बनता। उसे जीवित रखने के लिए लोगों का दिल चाहिए, उनकी साँसें चाहिए। हमें चिट्ठी डालनी होगी। हर दस में से एक व्यक्ति यरूशलेम में बसने के लिए चुना जाएगा। बाकी लोग अपने-अपने नगरों में रहेंगे।”
खलबली मच गयी। चिट्ठी डालना… यानी भाग्य का फैसला। किसकी जिंदगी पलट जाएगी? कौन अपनी जड़ें उखाड़कर इस उजड़े शहर में नई डालने को विवश होगा? लोग एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। कुछ के माथे पर बल पड़ गए, कुछ ने आँखें बंद कर लीं और होठों से प्रार्थना की शब्द फिसलने लगे।
पहला नाम आया – मत्तित्याह। वह एक याजक था, असल में पहरेदारी करने वालों का प्रधान। उसके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी, बल्कि एक शांत स्वीकृति थी, जैसे वह इसकी प्रतीक्षा ही कर रहा हो। उसने अपनी पत्नी और दो लड़कों की ओर देखा, जो घबराई निगाहों से उसकी ओर ताक रहे थे। उसने बस हलके से सिर हिलाया। उनका नया घर, या कहो उनका नया कर्तव्य-स्थल, दक्षिण की ओर के दरवाजे के पास होगा, जहाँ से खतरे की सबसे अधिक आशंका थी।
फिर एक-एक कर नाम पुकारे जाने लगे। यहूदा के गोत्र के लोग… बिन्यामीन के गोत्र के लोग… हर नाम के साथ कोई न कोई परिवार उठ खड़ा होता। कोई धीरे-धीरे, जैसे पैरों में जंजीरें हों। कोई जल्दी से, जैसे इस निर्णय से छुटकारा पाना चाहता हो। उनमें से एक था यहूदा बेन-हस्सनूव। वह एक किसान था, खेतीबाड़ी में उसके हाथ काफी कुशल थे। यरूशलेम की पथरीली जमीन देखकर उसका दिल सूख गया। “यहाँ अन्न कहाँ उगेगा?” उसने अपने पड़ोसी से फुसफुसाकर पूछा। “शहर में रहना सीखना होगा,” पड़ोसी ने जवाब दिया, “या फिर दरवाजे की रखवाली।”
लोग बसने लगे। यह कोई जुलूस या उत्सव नहीं था। यह एक कठिन, धूल-धूसरित काम था। गाड़ियों पर सामान लदा था – लकड़ी के सामान, बर्तन, कुछ बीज, कुछ मुर्गियाँ। बच्चे रो रहे थे क्योंकि उनके खिलौने और पालतू जानवर पीछे छूट गए थे। बूढ़े पीछे मुड़-मुड़कर अपने गाँवों को देख रहे थे, जहाँ उनके पुरखे दफन थे।
शिलोनी परिवार का एक झुंड, जो कीशोन के मैदान के पास रहता था, पूर्वी इलाके में जा बसा। उनकी बेटी, एक युवती जिसका नाम शलोमित था, एक टूटी हुई दीवार के सहारे बैठकर रोने लगी। उसकी माँ ने उसे गले लगा लिया। “यहाँ भी यहोवा है, बेटी,” माँ ने कहा, “और जहाँ यहोवा होता है, वहाँ घर होता है।” उनके पिता पहले से ही पड़ोस के मकान की छत ठीक करने में जुट गए थे, उनके हाथों में हथौड़े की आवाज़ गूँज रही थी।
दिन बीतते गए। यरूशलेम की गलियों में आवाज़ें गूँजने लगीं। हथौड़े की आवाज, बच्चों की किलकारी, औरतों के बर्तन साफ करने की आवाज। हाफसीदा के बेटे पलटीयाह ने, जो लोगों का प्रधान ठहराया गया था, उत्तर की ओर के गोत्रों के बसने का जिम्मा संभाला। वह एक दृढ़ इरादों वाला आदमी था, पर उसकी आँखों में नए आये परिवारों के प्रति करुणा झलकती थी। वह जानता था कि केवल घर बनाने से काम नहीं चलेगा, इन लोगों के दिलों में भी बस्ती बसानी होगी।
याजक और लेवीय भी आये। याजकों में से अमाश्सै का परिवार, जो परमेश्वर के भवन के काम के लिए अभिषिक्त था। लेवीयों में शमायाह, जो प्रार्थना और स्तुति का काम देखता था। उनके आने से शहर में एक अलग ही प्रकार की गूँज पैदा हुई – नमाजों की आवाज, तुरहियों की आवाज, और हर सुबह-शाम होने वाली बलि की सुगंध। यह सब यरूशलेम को सिर्फ एक बस्ती नहीं, बल्कि फिर से परमेश्वर का नगर बना रहा था।
पर सब कुछ आसान नहीं था। पेटूयाह बेन-मशेजाबेल, जो जेरह के वंश से था, अक्सर अपने नए आँगन में बैठकर सोचता रहता। उसके पास एक छोटा सा व्यापार था, जो यहाँ ठप्प पड़ गया था। बाजार अभी बनना बाकी था। दूर-दराज के गाँवों से आने वाली सुरक्षित कारवाँ अभी शुरू नहीं हुई थी। उसकी पत्नी ने कहा, “धीरज रखो। जब लोग होंगे, तो जरूरतें होंगी, और जहाँ जरूरतें होंगी, वहाँ व्यापार फलेगा-फूलेगा।”
और फिर द्वारपाल थे – अक्कूब और तल्मोन के वंशज। उनका काम सबसे कठिन था। उन्हें रात-दिन शहर के दरवाजों की चौकसी करनी थी। भोर की ठंडी हवा में, दोपहर की चिलचिलाती धूप में, और अँधेरी रातों में – वे हमेशा तैनात रहते। उनकी निगाहें दूर क्षितिज पर टिकी रहतीं, किसी संकट के आने का इंतज़ार करती हुई। पर उनके साथ एक अजीब सी शांति भी थी। वे जानते थे कि वे सिर्फ दरवाजे नहीं, बल्कि इस पूरे समुदाय की सांसें रक्षा कर रहे हैं।
एक शाम, जब सूरज पश्चिम की पहाड़ियों के पीछे डूब रहा था, यहूदा बेन-हस्सनूव, वही किसान, शहर के एक कोने में बैठा था। उसके सामने एक छोटी सी जगह थी, जहाँ उसने कुछ मिट्टी जमा कर रखी थी और उसमें दाख की एक बेल लगाई थी। यह उसका विश्वास था – एक जीवित, हरा-भरा विश्वास कि इस पत्थरीली जमीन में भी जीवन फूट सकता है। उसकी पत्नी ने उसे एक कटोरी पानी दिया। बिना कुछ कहे, उसने बेल के चारों ओर पानी डाल दिया।
धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे, यरूशलेम में जीवन की धड़कन वापस लौटने लगी। यह धड़कन महलों या भव्य इमारतों में नहीं, बल्कि साधारण लोगों के दैनिक संघर्षों में, उनकी छोटी-छोटी जीतों में, और उनकी साझी प्रार्थनाओं में सुनाई देती थी। नहेम्याह अब भी दीवार पर चला जाता, पर अब उसकी नज़र खाली गलियों पर नहीं, बल्कि धुएँ के उन छोटे-छोटे स्तंभों पर पड़ती, जो




