वह दिन ढलने को था, और आकाश में लालिमा फैली हुई थी, जैसे कोई घाव धीरे-धीरे सूख रहा हो। हवा में धूल के कण तैर रहे थे, और गाँव के किनारे बने उस छोटे से झोपड़े में अंधेरा पहले ही घर करने लगा था। एक आदमी, जिसके चेहरे पर जीवन की थकान और एक गहरा, अनकहा डर साफ झलक रहा था, मिट्टी के चबूतरे पर बैठा था। उसकी उंगलियाँ एक टूटे हुए मटके के किनारे पर बेसुध चल रही थीं।
उसके मन में शब्द उठ रहे थे, वे शब्द जो भजन संहिता के दसवें भजन में गूँजते हैं। “हे यहोवा, तू क्यों दूर खड़ा रहता है? संकट के समय क्यों अपने को छिपा लेता है?”
वह आदमी, जिसका नाम एलियाब था, इन प्रश्नों को सिर्फ पढ़ता नहीं था; वह उन्हें जी रहा था। उसकी छोटी सी जमीन, जो उसके पिता और उनके पिता की थी, अब धमकियों के घेरे में थी। शिमशोन नाम का एक व्यक्ति, जो अमीर था और जिसके पास नौकरों की एक छोटी सी सेना थी, उसकी जमीन हड़पना चाहता था। शिमशोन का चेहरा एलियाब की आँखों के सामने तैर गया – मोटा, चिकना, उसकी मुस्कान में एक ऐसी निर्दयता जो शब्दों से ज्यादा खतरनाक थी।
“दुष्ट, अपने मन के अहंकार में, लगातार पीछा करता है,” एलियाब ने धीरे से फुसफुसाया। उसने देखा था कैसे शिमशोन के लठैत गाँव के कमजोर लोगों को डराते थे। वे उनकी फसलों पर कब्जा कर लेते, उनकी भेड़-बकरियाँ हाँक ले जाते, और कोई कुछ बोल नहीं पाता। न्याय की आशा ऐसी लगती थी जैसे सूखे नाले की रेत, हाथों से फिसलती चली जाती है।
एक शाम, जब एलियाब अपनी थोड़ी सी जौ की फसल काट रहा था, तभी शिमशोन के तीन आदमी आ धमके। उन्होंने कोई बात नहीं की। उनकी आँखों में वही बर्फ़ीली चुप्पी थी। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उसकी मेहनत से बोई गई फसल के गट्ठर उठाने शुरू कर दिए। एलियाब की पत्नी, रूथ, दरवाजे पर खड़ी रो रही थी, लेकिन आवाज नहीं निकाल पा रही थी। एलियाब का गला सूख गया था। वह खड़ा रहा, उसकी मुट्ठियाँ भिंची हुईं, लेकिन शरीर में एक बेबस कँपकँपी दौड़ रही थी। दुष्ट यह सोचता है, “परमेश्वर भूल गया है, उसने अपना मुँह छुपा लिया है, उसने कभी देखा ही नहीं।”
अगले कुछ दिन एक सुन्न कर देने वाले दर्द की तरह बीते। भूख की चुभन बच्चों के रोने से और तेज हो जाती। एलियाब मंदिर की ओर देखता, परन्तु उसके मन में प्रार्थना के शब्द गूँगे हो चले थे। क्या परमेश्वर वाकई दूर था? क्या उसकी पुकार बादलों में ही खो जाती थी? वह उस भजन के अगले हिस्से को महसूस करता: “उसका मुँह अहंकार और दमन से भरा है, उसकी जीभ पर सदा कपट और अत्याचार रहता है।”
पर फिर, एक रात, जब हवा इतनी शांत थी कि उसे अपने दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी, कुछ हुआ। यह कोई दर्शन नहीं था, न ही आकाश से आवाज। यह उसके भीतर एक धीमी, गहरी समझ की तरह उभरा, जैसे जमीन के नीचे से पानी का सोता फूटता है। उसने सोचा, “परन्तु तूने दुख और शोक देखा है; तू उन्हें सँभालने को तैयार रहता है।” यह विश्वास नहीं था कि समस्या एक पल में हल हो जाएगी। बल्कि यह एक सत्य की अनुभूति थी – कि उसकी पीड़ा देखी जा रही है। उसका रोना, उसका डर, उसकी बेबसी – किसी की नज़रों से ओझल नहीं था।
अगली सुबह, एलियाब का चेहरा पहले जैसा नहीं था। डर अभी भी था, लेकिन उसमें एक अजीब सा दृढ़ संकल्प घुल गया था। उसने रूथ से कहा, “हम नगर के फाटक पर चलेंगे। वहीं बुजुर्ग बैठते हैं। हम अपनी बात कहेंगे।” रूथ की आँखों में एक क्षण के लिए भय चमका, फिर उसने धीरे से सिर हिला दिया।
नगर के फाटक पर, जहाँ न्याय होता था, शिमशोन भी मौजूद था। वह मुस्कुरा रहा था, अपने चारों ओर लोगों से बातें कर रहा था। एलियाब को देखते ही उसकी मुस्कान थोड़ी सख्त हो गई। एलियाब ने बुजुर्गों के सामने अपना सिर झुकाया, और अपनी आवाज में कंपकंपाहट के बावजूद, उसने सब कुछ कह डाला। उसकी फसल का अपहरण, धमकियाँ, उसके परिवार का डर। उसकी आवाज कभी धीमी हो जाती, कभी रुक जाती, जैसे एक अनाड़ी बयानबाजी।
एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर, अचानक, गाँव के अन्य लोग, जो सालों से चुप रहे थे, खड़े होने लगे। एक बूढ़ा चरवाहा बोला, “मेरी भेड़ें भी ले गए थे।” एक विधवा ने कहा, “मेरी बची-खुची जमीन पर उसने कब्जा कर लिया है।” आवाजें उठने लगीं, धीमी, काँपती हुई, लेकिन स्पष्ट।
शिमशोन का चेहरा लाल हो गया। उसकी शक्ति उसके अहंकार पर टिकी थी, और उस अहंकार में अब एक दरार पड़ गई थी। बुजुर्गों ने गंभीरता से सुना। कोई तात्कालिक चमत्कार नहीं हुआ। कोई आग आकाश से नहीं गिरी। लेकिन एक प्रक्रिया शुरू हो गई थी। न्याय की धीमी चक्की घूमने लगी थी।
उस रात, एलियाब फिर से अपने चबूतरे पर बैठा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। उसके हृदय में वह भारीपन कम हो गया था। वह उस भजन के अंतिम शब्दों को सोचता रहा: “हे यहोवा, तू सदैव राज्य करता है… तू दीन-दुखियों के ऊपर अधिकार जमाने वालों का नाश कर देता है।” उसे अब एहसास हुआ कि यह नाश केवल बाहरी नहीं होता। यह पहले हृदय के अंदर होता है – उस डर का नाश जो हमें गुलाम बनाता है, और उस झूठ का नाश कि परमेश्वर अनदेखा कर रहा है।
उसने अपनी आँखें बंद कीं। प्रार्थना के शब्द अब गूँगे नहीं थे। वह बस इतना कह पाया, “तू सुनता है।” और रात की हवा में, यही विश्वास एक मौन गवाह की तरह लिपटा रहा, जैसे किसी टूटे हुए मटके में भी पानी समा सकता है, बशर्ते उसे स्रोत याद रहे।




