सुबह की धूप खिड़की से फिसलकर मिट्टी के फर्श पर एक सुनहरा चौखटा बना रही थी। रामलाल दादा अपनी चारपाई के किनारे बैठे, अपनी लकड़ी की छड़ी को हथेलियों के बीच धीरे-धीरे घुमा रहे थे। उनके पास बैठा उनका पोता, आनंद, एक टूटी किताब के पन्ने पलट रहा था। गाँव से बाहर मुख्य सड़क पर एक ट्रक के हॉर्न की आवाज आई, फिर फिर सन्नाटा छा गया।
“दादा,” आनंद ने सवाल किया, “कल पंडित जी ने कहा था कि शराब झगड़े की जड़ है। पर सोहन चाचा तो हफ्ते में तीन दारू पीकर भी शांत रहते हैं।”
रामलाल ने अपनी छड़ी रोकी, उनकी आँखों में गहरी झुर्रियाँ और भी गहरी हो गईं। “बेटा, दारू मनुष्य को बहकावे में डालती है, जैसे साँप फुसफुसाता है। देखना, आज शाम तक सोहन के घर से चिल्लाने की आवाज आएगी। पैसे की कमी का रोना होगा। शराब पीकर आदमी अपनी बुद्धि गिरवी रख देता है। वह जो कुछ भी है, उसे खोकर एक झूठी ताकत महसूस करता है।”
दोपहर बिती। आनंद ने देखा कि सोहन चाचा का बेटा, मोहन, दुकान से आटे का एक छोटा बोरा लेकर लौट रहा था। उसके चेहरे पर उदासी साफ थी। शाम को, जैसा दादा ने कहा था, सोहन के घर से आवाजें उठनी शुरू हुईं – पहले गुस्सैल, फिर रोने के स्वर मिले। आनंद ने दादा की तरफ देखा। रामलाल ने आँखें बंद कर ली थीं, जैसे कोई पुराना दर्द फिर से ताजा हो गया हो।
अगले दिन, बाजार का दिन था। रामलाल आनंद को लेकर सब्जी खरीदने निकले। एक तरफ किशनलाल सब्जीवाला था, जो अपनी दुकान पर पहले से ही चहक रहा था। दूसरी तरफ गोविंद, जो धीरे-धीरे अपनी बोरियाँ सजा रहा था, आँखें मलता हुआ। “देख,” रामलाल ने कान में कहा, “किशन सुबह जल्दी उठकर ताजा सब्जी ले आया। गोविंद आलस के मारे देर से पहुँचा। अब गोविंद की सब्जी मुरझाई पड़ी है, और लोग किशन के यहाँ भीड़ लगा रहे हैं। आलस्य मनुष्य को भूखा रख देता है, बेटा। हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वाले की गरीबी, उस पर छाया की तरह चिपक जाती है।”
आनंद ने गोविंद की ओर देखा। वह अब ग्राहकों को आवाज दे रहा था, पर उसकी आवाज में वह जोश नहीं था। दादा ने किशन से भिंडी ली और पूरे पैसे गिनकर दिए। “तोल तो ठीक है न भाई?” रामलाल ने पूछा। किशन ने मुस्कुराकर सिर हिलाया, “दादा, आपके सामने कौन बेईमानी करेगा?”
पर आगे चलकर एक अनाज की दुकान पर दृश्य अलग था। दुकानदार जल्दी-जल्दी तौल रहा था, और उसके पत्थर के बाट थोड़े संदिग्ध लग रहे थे। एक बुजुर्ग महिला ने एतराज किया, “भैया, यह तोल कम लग रहा है।” दुकानदार चिढ़ गया, “चलो भी, इतने साल से दुकान चला रहा हूँ, किसने शिकायत की?” रामलाल वहीं खड़े हो गए। उनकी चुप्पी में एक भारीपन था। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस देखते रहे। धीरे-धीरे दुकानदार का चेहरा बदलने लगा। उसने महिला को अनाज दोबारा तौलकर दिया, अतिरिक्त एक मुट्ठी डालते हुए। बाद में रास्ते में दादा बोले, “झूठे बाट और छल के पैमाने, प्रभु को घृणित हैं। मनुष्य बाहर से ईमानदारी का नाटक कर सकता है, पर उसके मन की गहराई कौन जान सकता है? बस, परमेश्वर की दृष्टि सब पर है।”
एक शाम, आनंद के पिता ने घर में पैसे गिनते हुए किसी से की गई एक सौदेबाजी का जिक्र किया, जहाँ उन्होंने दूसरे पक्ष को चतुराई से कमजोर समझकर फायदा उठाया था। उनकी आवाज़ में संतुष्टि थी। रामलाल ने चुपचाप अपनी हुक्के की कश भरी। फिर धीरे से बोले, “बेटे, जो दौलत रातोंरात मिल जाए, वह अक्सर बाँझ होती है। धीरे-धीरे, मेहनत से, ईमानदारी से जमा की गई चीज ही टिकती है। और जो दूसरे की संपत्ति पर नज़र गड़ाए बैठा है, उसकी आत्मा कभी तृप्त नहीं होती।”
कुछ दिन बाद, गाँव के सरपंच के यहाँ एक विवाद हुआ। दो परिवार जमीन को लेकर लड़ रहे थे। एक ने रिश्वत देकर गवाह तैयार कर लिए थे। सरपंच ने फैसला देने से पहले रामलाल की राय पूछी। दादा ने कहा, “न्याय करने वाला सिर्फ इंसान ही नहीं देखता। ऊपर वाला भी देख रहा है। सच्चाई को दबाने के लिए बनाए गए झूठ, अंत में उसी के सिर पर पहाड़ बनकर गिरते हैं।” उनकी बात इतनी सादी थी, पर उसमें इतना वजन था कि सरपंच ने मामले की फिर से छानबीन की। आखिरकार सच सामने आ गया।
एक बार आनंद ने गुस्से में कहा कि जिस लड़के ने उसकी किताब फाड़ी थी, उसे वह सबक सिखाएगा। रामलाल ने उसे अपने पास बैठाया। “तू उसका बुरा चाहेगा, पर बदला लेने का विचार छोड़ दे। वह तेरे हाथ में नहीं, ऊपर वाले के हाथ में है। जलते कोयले अपने सिर पर जो इकट्ठा करता है, वह खुद ही जल जाता है।”
समय बीतता गया। आनंद ने देखा कि दादा हमेशा सीधी और स्पष्ट बात करते थे। उनकी ‘हाँ’ में ‘हाँ’ और ‘न’ में ‘न’ होता था। उन्होंने कभी दिखावे की जिंदगी नहीं जी। एक दिन आनंद ने पूछ ही लिया, “दादा, आप इतने सीधे कैसे रह पाते हैं? कभी-कभी तो चालाकी फायदेमंद लगती है।”
रामलाल ने उसकी ओर देखा, उनकी आँखों में एक कोमल चमक थी। “बेटा, हर आदमी के काम स्वच्छ लग सकते हैं, पर उसकी मंशा क्या है, यह तो प्रभु ही जाँचता है। मनुष्य की आत्मा प्रभु का दीपक है, जो उसके भीतर के सब कोनों को झाँककर देखती है। हम खुद को धोखा दे सकते हैं, पर उस दीपक के सामने कुछ छिपा नहीं रहता। और याद रख,




