वह दिन भी याद आता है, जब बाबुल की नहर के किनारे बैठा मैं, एक बूढ़ा यहूदी, अपने हाथों में मिट्टी के ठंडे टुकड़े को मसल रहा था। हवा में खजूर के पत्तों की सरसराहट थी, और दूर से किसी व्यापारी के ऊँटों के घंटों की टनटनाहट आ रही थी। पर मेरा मन तो फिर भी उस पहाड़ी देश में था, जहाँ जैतून के पेड़ हवा से बातें करते थे और शीलोह की धारा कलकल बहती थी। तभी यिर्मयाह आकर मेरे पास बैठ गए। उनकी आँखें हमेशा की तरह गहरी, एक अदृश्य आग से भरी हुई थीं।
“सुनो,” उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ नहर के पानी की धार जैसी थी, “यहोवा ऐसा कहता है: ‘मैं इस्राएल के सब घरानों का परमेश्वर ठहरूंगा, और वे मेरी प्रजा ठहरेंगे।'”
मैंने मिट्टी का टुकड़ा नीचे गिरा दिया। “परमेश्वर? अब? इस निर्वासन में? हम तो रेत की तरह सूख गए हैं, यिर्मयाह। हमारी आवाज़ रोने में फट गई है। राहेल अपनी संतानों के लिए रो रही है, क्योंकि वे हैं ही नहीं।”
यिर्मयाह ने दूर आकाश की ओर देखा, मानो वहाँ कोई लिपि लिखी हो। “परमेश्वर कहता है: ‘तुम्हारा भाग्य सुनिश्चित नहीं है। तुम्हारा शोक स्थायी नहीं है। राहेल के लिए यह आश्वासन है—उसके बच्चे लौटेंगे। उसकी आँसुओं को सुखा दिया जाएगा।’ सुनो, क्या तुम दूर से उस आवाज़ को नहीं सुनते? ‘रामा में एक कराह, रोना पड़ रहा सुनाई देता है। राहेल अपने बालकों के लिए रो रही है…’ पर वही आवाज़ कहती है: ‘अपनी आँखों के आँसू पोंछ डाल, क्योंकि तेरा परिश्रम व्यर्थ नहीं जाएगा।'”
मैं चुप रहा। मेरे भीतर एक कड़वा सवाल उमड़ रहा था। “पर कैसे? एफ़्राइम मेरा प्यारा बेटा था, पर उसने अपनी गर्दन अड़ा ली। उसने अपने हाथों से अपनी नियति गढ़ ली। हमने तो अपनी जुताई की गलत क्यारियाँ बना डालीं। अब काटना तो पड़ेगा ही।”
यिर्मयाह का चेहरा कोमल हो गया। “तू सिर्फ़ न्याय की बात करता है। परमेश्वर दया की भी बात करता है। सुन, वह क्या गा रहा है: ‘क्या एफ़्राइम मेरा प्यारा बेटा नहीं? क्या वह मेरा लाड़ला शिशु नहीं? जब भी मैं उसकी चर्चा करता हूँ, मैं उसे याद करके अवश्य कराह उठता हूँ। मेरा मन उस पर लगा रहता है; मैं निश्चय ही उस पर दया करूंगा।'”
उनकी बातों में एक लय थी, एक संगीत। “वह हमें दूर से बुलाएगा। अंधियारी घाटियों से नहीं, बल्कि सीधे उसकी बाँहों में। हम रोते हुए लौटेंगे, और वह हमें शांति से चलाता हुआ, पानी की सीधी धाराओं के पास ले जाएगा, जहाँ हम ठोकर न खाएँ।”
मैंने एक लम्बी साँस ली। “यह सब बहुत सुन्दर लगता है, भविष्यद्वक्ता। पर यह शब्द ही तो हैं। हमारे पैरों में तो बाबुल की ज़ंजीरें हैं।”
“शब्द ही तो संसार की नींव हैं,” यिर्मयाह ने कहा। “परमेश्वर के शब्द तो और भी अधिक। देख, वह एक नई वाचा बाँधने वाला है। वह वाचा जो पत्थर की तख्तियों पर नहीं, बल्कि हृदय के माँस पर लिखी जाएगी। वह स्वयं हमारा परमेश्वर बनेगा, और हम उसकी प्रजा। उस समय एक दूसरे को ‘यहोवा को जानो’ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि छोटे-बड़े सब उसे जानेंगे। क्योंकि वह हमारे अधर्म को क्षमा करेगा, और हमारे पाप को फिर कभी स्मरण न करेगा।”
उस क्षण, नहर का पानी चमकीला लग रहा था। हवा के झोंके में कोई मधुर गंध आई, जैसे दूर कहीं बसंत आ गया हो। मैंने अपनी हथेली खोली, जिसमें मिट्टी के कण चिपके थे। वही मिट्टी, जिससे हम बने हैं। पर उस मिट्टी को गढ़ने वाला कुम्हार अभी भी काम पर है। वह तोड़ता नहीं केवल इसलिए कि बर्तन बिगड़ गया। वह उसे फिर से गूंथता है, नया आकार देता है।
यिर्मयाह उठ खड़े हुए। “शहर फिर से बसेगा। दाख की बारियाँ फिर लगेंगी। पहरेदार एफ़्राइम के पर्वत पर खड़े होंगे और पुकारेंगे: ‘उठो, हम सिय्योन को चलें, यहोवा अपने परमेश्वर के पास।’ और यह सब, एक निश्चित समय पर होगा। जैसे आकाश में तारों और समुद्र की लहरों का एक नियम है, वैसे ही इस्राएल का एक स्थायी राष्ट्र बनना परमेश्वर का नियम है।”
वह चले गए। मैं अकेला रह गया, पर अकेलापन वैसा नहीं था। मेरे कानों में वह गीत गूंज रहा था, वह गीत जो दुःख के ऊपर आनन्द का मुकुट धरता है। मैंने देखा, नहर के उस पार एक युवक अपने बेटे को कंधे पर बैठाए जा रहा था। बच्चा हँस रहा था। और मैं जान गया कि यिर्मयाह के शब्द केवल भविष्य की बात नहीं कर रहे थे। वे एक बीज थे, जो इसी क्षण, इसी सूखी हुई ज़मीन में, मेरे अपने हृदय में गिरा दिया गया था। और बीज को अंकुर फूटने में समय लगता है। उसे सर्दियाँ झेलनी पड़ती हैं। पर वह समय आएगा, जब यह मरा हुआ दिखने वाला वृक्ष फिर हरा होगा, और उसकी टहनियाँ दाखलताओं से लदी हुई होंगी।
मैंने धीरे से अपने चोगे की जेब से एक सूखा हुआ अंजीर का बीज निकाला, जो मैंने यरूशलेम से निकलते समय संभाल कर रखा था। उसे मैंने बाबुल की इस उपजाऊ, पर अपनी नहीं लगने वाली मिट्टी में दबा दिया। प्रतीक्षा करनी है। केवल प्रतीक्षा। क्योंकि उसका वचन टूटता नहीं। जैसे भोर अनिवार्य है, वैसे ही उसकी करुणा भी।




