वह दिन ऐसा था जैसे आकाश ने सीसे का रंग पहन लिया हो। धूप भी कुछ अजीब थी—न तो तेज़, न मंद, बल्कि एक स्थिर, भारी प्रकाश जो हर चीज़ पर चिपक रहा था। मैं नगर की उस टूटी हुई प्राचीर पर खड़ा था जहाँ से पहाड़ों की ओर देखा जा सकता था। वे पहाड़, जो दूर से शान्त और अटल लगते थे, आज मुझे ऐसे दिख रहे थे जैसे उनकी चुप्पी में कोई गहरा रोग भर गया हो।
हवा में धूल के कण तैर रहे थे, और उन्हीं के बीच से वह शब्द मेरे कानों में उतरा—ठीक वैसे ही जैसे पत्थर कुँए में गिरता है। यह कोई साधारण आवाज़ नहीं थी। यह वही स्वर था जो नदी के किनारे, कीकर की छाँव में मुझसे बोला करता था। मेरे भीतर कुछ काँप उठा।
“मनुष्य के सन्तान,” उसने कहा, “अपना मुँह इस्राएल के पहाड़ों की ओर फेर, और उनके विरुद्ध भविष्यद्वाणी कर।”
मैंने अपनी आँखें उन ऊँची भूमियों पर गड़ा दीं। वे पहाड़ सुन्दर थे, निश्चय ही। हरियाली से ढके, ऊपर बादलों की छाया। पर मुझे दिख रहा था कि कैसे हर उँची पहाड़ी पर, हर हरी घाटी में, हर गहरे खड्ड के किनारे, मनुष्यों के हाथों ने कुछ ऐसा खड़ा किया था जो उन्हें नहीं सौंपा गया था। उनकी आराधनास्थल—वे चबूतरे जहाँ धूप जलाई जाती थी, वे मूर्तियाँ जिन्हें वे ‘देव’ कहते थे। अशेरा के क्षीण खम्भे, सूर्य-देव के चिह्न, पत्थर के बने टीलों वाले स्थान। मैं उन सबको देख सकता था, जैसे वे पहाड़ों की त्वचा पर फोड़े बन गए हों।
मेरा गला सूख गया। पर शब्द आने लगे, भारी और निश्चित, जैसे लोहे के हथौड़े की चोट।
“हे इस्राएल के पहाड़ों, परमेश्वर यहोवा का वचन सुनो।” मेरी आवाज़ अजीब थी, मेरी अपनी नहीं लग रही थी। “वह तुमसे कहता है—देख, मैं तुम पर तलवार ले आया हूँ, और तुम्हारी उँची पूजास्थलों को नष्ट कर दूँगा।”
एक क्षण को सब कुछ थम सा गया। फिर मैंने देखा—नहीं, महसूस किया—वह विनाश जो अभी आने वाला था। मेरी आँखों के सामने वे चबूतरे टूटते दिखे। पत्थर की मूर्तियाँ, जिनकी आँखें कभी देख नहीं सकती थीं, अब धूल में लुढ़क गईं। उनका सोना और चाँदी, जिस पर लोग गर्व करते थे, अब मिट्टी में मिल गया। वे स्थान जहाँ लोग झुकते थे, जहाँ उनके पूर्वजों ने अनगिनत बलिदान चढ़ाए थे, अब केवल पत्थरों के ढेर थे—बिखरे हुए, बेकार, उजड़े हुए।
“तुम्हारे निवासी तलवार के सामने गिरेंगे,” मैं बोलता रहा, और हर शब्द मेरे हृदय पर चोट करता था। “तुम्हारे शव तुम्हारी घिनौनी मूर्तियों के चारों ओर पड़े रहेंगे। तुम्हारी हड्डियाँ तुम्हारी वेदियों के चारों ओर बिखरी पड़ी रहेंगी।”
एक भयानक दृश्य मेरे मन में उभरा। वे सुन्दर पहाड़, अब मृत्यु के शमशान। चीलें और गिद्ध उन शवों पर मँडरा रहे हैं जो कभी जीवन्त थे। हड्डियाँ—सफ़ेद, सूखी, गिनती से अधिक—हर चबूतरे के पास, हर पूजा-स्थल के नीचे। और वह दुर्गन्ध… वह सड़न जो सारे देश में भर जाएगी। क्यों? केवल इसलिए कि उन्होंने उसकी, जीवन्त परमेश्वर की, उपेक्षा की, और पत्थर और लकड़ी के पीछे भागे।
मेरी साँस रुक सी गयी। अब आवाज़ और भी गहरी हो गयी, जैसे कोई दु:ख जो क्रोध से भी गहरा है।
“तब जो बचे रहेंगे, वे तुम्हारे बीच बिखर जाएँगे। और वे उन देशों में, जहाँ वे बन्दी बनाकर ले जाए जाएँगे, अपने भ्रष्ट हृदयों को याद करेंगे जो मुझसे विमुख हो गए। वे उन घिनौनी वस्तुओं के लिए अपनी आँखें झुकाएँगे जिनसे वे मोहित थे। और वे जान जाएँगे कि मैं यहोवा हूँ।”
यही तो अन्तिम सत्य था। वह जानना। उसकी पहचान। सब कुछ इसी की ओर लौटता है। वह उन्हें तोड़ेगा, बिखेरेगा, शर्मसार करेगा—केवल इसलिए कि वे उस ‘मैं’ को जान लें जो सब कुछ है। उनकी हड्डियाँ भी गवाही देंगी। उनके खण्डहर भी चिल्ला-चिल्लाकर कहेंगे कि उन्होंने किसकी अवहेलना की।
फिर, अचानक, एक मोड़। आवाज़ में वह कठोरता कुछ कम हुई, जैसे बादलों के बीच से एक किरण निकल आयी हो।
“परन्तु मैं कुछ को बचा लूँगा। तलवार से बचे हुए लोग देश-देश में बिखर जाएँगे। और जब वे बन्दियों में होकर उन देशों में होंगे, तब वे मुझे याद करेंगे।”
यही आशा की किरण थी। वह याद। बिखराव भी उद्देश्यपूर्ण था। वह विश्वासघाती हृदय, जब टूटेगा, तब शायद सच्ची याद आएगी। और तब वे जानेंगे कि उनके सारे देव—वे पत्थर, वे चबूतरे, वे ऊँचे स्थान—कुछ नहीं थे। और वह, जिसे उन्होंने दूर धकेल दिया, सब कुछ है।
आवाज़ रुक गयी। वह भारी प्रकाश धीरे-धीरे सामान्य होने लगा। पहाड़ अब भी वहीं खड़े थे, शान्त, लेकिन अब मुझे उनकी शान्ति में एक गहरा दर्द दिखाई दे रहा था। मैं प्राचीर से उतरा। मेरे कपड़ों पर धूल के निशान थे, और हवा में अब भी वही अजीब-सी गर्मी थी। पर कुछ बदल गया था। नगर की सड़कों पर चलते लोग अपने काम में लगे हुए थे, व्यापारी चिल्ला रहे थे, बच्चे दौड़ रहे थे। क्या उनमें से कोई जानता था कि उनके पहाड़ों पर क्या निर्णय लिखा जा चुका है?
मैंने अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया। भविष्यद्वाणी करना केवल शब्द बोलना नहीं है। यह उस आग को अपने भीतर झेलना है जो दूसरों को जलाएगी। यह उस विनाश को पहले देख लेना है, और फिर भी उस आशा को थामे रखना है जो उसके पार है। वह याद… वह जानना… शायद यही एकमात्र मार्ग है जो ध्वस्त वेदियों और बिखरी हड्डियों के बीच से भी होकर गुज़रता है। और मैं, केवल एक आवाज़, उस मार्ग की ओर इशारा करते हुए, खड़ा रह गया।




