उस दिन की बात है जब हवा में एक अजीब-सी गंध थी। सर्दियों की वह सुबह, जब कोहरा यरूशलेम के पहाड़ों से लिपटा हुआ था, ऐसा लग रहा था मानो आकाश ने धरती को एक सफेद चादर से ढक दिया हो। एजेकिएल बूढ़ा हो चला था, उसकी आँखों में दूर तक देख पाने की वह तीक्ष्णता अब धुंधली पड़ने लगी थी। पर उस दिन, जब प्रभु का वचन उस पर आया, तो उसकी सारी थकान, सारी उम्र का बोझ जैसे क्षण भर में गिर गया।
वह अपनी कुटिया के बाहर, जैतून के पेड़ के नीचे बैठा था। हवा ने कोहरे को चीरते हुए एक ठंडी लहर चलाई, और उसके रोंगटे खड़े हो गए। यह कोई साधारण पवन नहीं थी। यह वह श्वास थी जो भविष्य की गर्जना को लेकर चली आ रही थी। उसे महसूस हुआ, जैसे पर्वत काँप उठे हों। दूर उत्तर के उन विस्तृत, बर्फीले मैदानों से, जिनके नाम भी यहूदियों की जुबान पर बमुश्किल आते थे, एक खलबली उठ रही थी।
प्रभु का शब्द उसके कानों में गूँजा, “हे मनुष्य के सन्तान, अपना मुँह मगोग के राजा गोग की ओर फेर, जो मेशेक और तूबल का प्रधान है। भविष्यद्वाणी कर उसके विरुद्ध।”
एजेकिएल ने आँखें बंद कर लीं। और तब उसने देखा—एक दर्शन, जो शब्दों से कहीं बड़ा था। वह अपने आप को एक ऊँची चट्टान पर खड़ा पाया, जहाँ से सारी धरती नज़र आती थी। उत्तर में, अंधकार की एक विशाल छाया इकट्ठा हो रही थी। यह केवल एक सेना नहीं थी, यह जातियों का एक उबलता हुआ कड़ाह था। गोग—उसका नाम सुनते ही मन में एक भयानक गूँज पैदा होती थी। वह दूर-दूर तक फैले हुए रोश के भूभाग का शासक था, जहाँ के लोग तलवार और ढाल के सिवा कुछ नहीं जानते थे। उसके साथ थे फारस के लोग, कुश के लोग, पूत के लोग। गोमेर की सारी टोलियाँ, और तोगर्मा के परिवार—उत्तर के अंतिम छोर के योद्धा, जिनके घोड़ों की टापों से बर्फ कुचली जाती थी।
वे सब इकट्ठा हो रहे थे। उनकी ढालों पर चमकती हुई कड़ी धूप, उनके भाले के फल जंग खाए हुए नहीं, बल्कि नए-नए घिसे हुए लग रहे थे। उनकी संख्या रेत के कणों के समान थी। और उन सबकी आँखें एक ओर थीं—दक्षिण की ओर। उस छोटे से टिड्डे के झुंड की तरह बसे हुए देश की ओर, जिसे वे ‘इस्राएल के पहाड़’ कहते थे।
दर्शन में, एजेकिएल ने गोग के मन के भीतर झाँका। वहाँ लालच की आग धधक रही थी। “मैं चलूँगा,” गोग विचार कर रहा था, “उस देश पर जो युद्ध के बाद फिर से बसा है, जहाँ के गाँव शान्ति से रहते हैं, बिना किसी दीवार, बिना किवाड़ और बिना अर्गल के। मैं लूट लूँगा उसकी सम्पदा, छीन लूँगा उसका धन।”
और फिर, एजेकिएल ने देखा कि कैसे वह विशाल सेना, घोड़ों, रथों और पैदल सैनिकों का एक अंतहीन साँप, दक्षिण की ओर रेंगने लगी। वे पहाड़ों को लाँघते, नदियों को पार करते। उनके आगमन से पृथ्वी काँप उठती। उनके पीछे, एक लम्बी, काली धूल की लकीर आकाश को धुंधला कर देती।
पर दर्शन में ही, एजेकिएल ने वह भी सुना जो गोग नहीं सुन पा रहा था। प्रभु का स्वर, गरजते बादलों की तरह, गूँज रहा था। “हे गोग, मैं तेरे विरुद्ध हूँ। मैं तुझे इस्राएल के पहाड़ों पर ले आऊँगा, और वहाँ तुझे अपना कोप दिखाऊँगा। मैं तुझ पर महामारी और रक्तपात भेजूँगा। तेरे और तेरी सारी सेना पर, और तेरे साथ की बहुत सी जातियों पर आकाश से वर्षा, और ओले, और आग, और गन्धक बरसाऊँगा।”
और तब दृश्य बदल गया। वह विशाल, अजेय सेना इजरायल के पहाड़ों की तलहटी में पहुँच चुकी थी। वे चिल्ला रहे थे, तलवारें भाँज रहे थे, विजय का उन्माद उनके चेहरों पर था। पर तभी आकाश काला पड़ गया। बादलों ने सूरज को निगल लिया। और फिर आवाज़ आई—कोई साधारण गड़गड़ाहट नहीं, बल्कि ऐसी गर्जना मानो स्वर्ग और पृथ्वी चीर दी गई हों। आग के गोले, धधकते हुए पत्थर, आकाश से गिरने लगे। ओले, इतने बड़े कि उनसे रथ चकनाचूर हो जाते, सेना पर टूट पड़े। भूकम्प ने धरती को इस तरह हिलाया जैसे कोई कम्बल झाड़ रहा हो। पहाड़ियों ने अपनी जगह छोड़ दी। गोग की सेना में भगदड़ मच गई। घोड़े बिदकने लगे, सैनिक एक-दूसरे को कुचलते हुए भागने लगे। पर भागने को जगह कहाँ थी? प्रभु का क्रोध हर ओर था।
वह विशाल लश्कर, जो कुछ ही पल पहले अजेय लग रहा था, अब एक दहशत-भरी, अस्त-व्यस्त भीड़ में तब्दील हो चुका था। वे एक-दूसरे की तलवारों से मरने लगे। भयंकर महामारी फैल गई। और फिर, एक ऐसी भयानक बारिश हुई जिसमें आग और गन्धक मिली हुई थी। उसकी गंध से ही प्राण निकल जाते थे।
एजेकिएल ने देखा, कैसे एक दिन में, वह सारी शक्ति धूल में मिल गई। मरे हुओं के शव इतने थे कि उनसे घाटियाँ भर गईं। इज़राइल के लोगों को सात महीने तक उन्हें दफनाने में लगना था। लोहे के हथियार, लकड़ी के रथ—सब ईंधन बन गए। और इस सबके पीछे एक ही उद्देश्य था। प्रभु ने कहा, “तब राष्ट्र जान लेंगे कि मैं यहोवा हूँ। मैं ही इस्राएल का पवित्र परमेश्वर हूँ।”
दर्शन समाप्त हुआ। एजेकिएल ने आँखें खोलीं। जैतून का पेड़ अभी भी वहीं खड़ा था। कोहरा कुछ छंट गया था। पर उसकी आत्मा अभी भी काँप रही थी। उसने अपनी काँपती हुई उँगलियों से पपीरे की पुड़िया उठाई और उन शब्दों को लिखना शुरू किया जो उसने देखे और सुने थे। हर शब्द में वह भय, वह विस्मय और वह निश्चय था कि प्रभु की योजना अटल है। गोग का आक्रमण अभी नहीं हुआ था। वह तो आने वाले समय की एक भयानक छाया थी, एक चेतावनी थी उन सभी के लिए जो सिय्योन के परमेश्वर के विरुद्ध षड्यंत्र रचेंगे। और एजेकिएल जानता था, इतिहास की गति कभी-कभी ऐसे ही भयानक स्वप्नों में अपना रास्ता बनाती है। उसने लिखना जारी रखा, जब तक कि शाम की लाली आकाश पर नहीं फैल गई, मानो आने वाले उस दिन की आग का हल्का-सा प्रतिबिम्ब हो।




