उस धूल भरे रास्ते पर, जहाँ जैतून के पेड़ों की छाया लगभग खत्म हो रही थी और खुले मैदान की गर्मी शुरू होती थी, दो आदमी चले जा रहे थे। पौलुस की चाल में एक तेजस्वी थकान थी, मानो उसका शरीर तो मीलों चलने से दुख रहा हो, पर आत्मा किसी अनदेखे ऊर्जा स्रोत से भरी हो। बरनबास उसके बगल में, चुपचाप, एक स्थिर चट्टान की तरह। दोनों के चोगों पर इकोनियम की यात्रा की धूल जमी थी।
इकोनियम की सभा में तो बात बनती दिखी थी। बहुत से यहूदी और यूनानी विश्वास करने लगे थे। पर फिर वही पुराना स्वर – कुछ अड़े रहने वाले यहूदियों ने, जिनके दिल पत्थर हो गए थे, गैर-यहूदियों को भड़काया और भाईयों के खिलाफ जहर भर दिया। एक दिन तो ऐसा लगा, शहर दो हिस्सों में बंट गया है – एक ओर प्रेरितों के समर्थक, दूसरी ओर उनके विरोधी। और फिर वह षड्यंत्र रचा गया, उन पर पथराव करने का। खबर किसी तरह कानों में पड़ी, तो रातों-रात निकलना पड़ा। भागना नहीं, बल्क� सत्य की गवाही को दूसरी जगह ले जाना।
अब लूस्त्रा की ओर थे। यह शहर अलग था। यहाँ न तो यहूदी आराधनालय की जानी-पहचानी संरचना थी, न ही शास्त्रों पर उतनी पकड़ रखने वाली जमात। यहाँ के लोग आकाश और भूमि के देवताओं में विश्वास रखते थे। पौलुस ने एक सभा में बोलना शुरू किया, एक खुले मैदान में, जहाँ लोग इकट्ठा हुए। वह उनकी अपनी भाषा में नहीं बोल पा रहा था, एक दुभाषिए के जरिए उसके शब्द सामने आ रहे थे। वह बात कर रहा था उस जीवंत परमेश्वर की, जिसने आकाश, पृथ्वी और समुद्र बनाया, जो अनंत काल से है, और जिसने मनुष्यों को अपनी छवि में रचा। लोग हैरानी से सुन रहे थे। यह धर्मशास्त्र नहीं था; यह एक गवाही थी, एक यात्री की कहानी जिसने स्वयं उस प्रेम को अनुभव किया था, जो क्रूस पर बहाया गया।
तभी भीड़ के पीछे हलचल हुई। एक व्यक्ति, जन्म से ही लंगड़ा, आगे की ओर धकेला जा रहा था। उसकी आँखों में एक अकथनीय आशा थी, एक ऐसी चिंगारी जो वर्षों की निराशा के बाद भी नहीं बुझी थी। वह पौलुस की ओर देख रहा था, और पौलुस की नजरें उससे मिलीं। यह कोई पल नहीं था जिसकी योजना बनाई गई हो। यह वह क्षण था जब स्वर्ग की दया ने मानवीय दुख को छुआ। पौलुस ने उसे गहराई से देखा, और एक आवाज, दृढ़ और करुणामय, उसके मुँह से निकली, “खड़ा हो, अपने पैरों पर सीधा खड़ा हो जा।”
और वह आदमी, जो जीवनभर नहीं चला था, उछल पड़ा। उसने अपने पैरों पर जोर डाला, और वह खड़ा हो गया। फिर एक कदम, दो कदम… और फिर वह उछलने-कूदने लगा, चीख-चीख कर परमेश्वर की महिमा बखान करते हुए। भीड़ में सन्नाटा छा गया, फिर एक जबर्दस्त कोलाहल भरा उफान आया। उन यूनानी लोगों के लिए, यह स्पष्ट था – देवता मनुष्य का रूप लेकर उनके बीच आए हैं। और क्योंकि बरनबास लम्बा-चौड़ा और गंभीर था, वे चिल्लाने लगे, “यह तो ज्यूस है!” और पौलुस, जो बोल रहा था, उसे वे हेर्मीस समझ बैठे।
हवा में उत्साह सा भर गया। शहर के बाहर, ज्यूस के मंदिर का पुजारी बैलों और फूलों की मालाएँ लेकर दौड़ा चला आ रहा था, भीड़ के साथ, यह बलिदान चढ़ाने के लिए। पौलुस और बरनबास ने जब यह समझा, तो उन्होंने अपने कपड़े फाड़ डाले। वे भीड़ में कूद पड़े, चिल्लाते हुए, “भाइयो, यह क्या करते हो? हम भी तो तुम्हारे ही समान मनुष्य हैं! हम तो तुम्हें इस व्यर्थ काम से परे, जीवते परमेश्वर की ओर मोड़ने के लिए सुसमाचार सुनाते हैं।”
पौलुस का स्वर हताशा से भरा था। वह आकाश की ओर इशारा करने लगा, “उसी ने अपनी उपस्थिति का प्रमाण दिया है – उसने तुम्हारे लिए आकाश से वर्षा होने दी, फलदायी ऋतुएँ दीं, और तुम्हारे हृदयों को भोजन और आनन्द से भर दिया।” वह बहुत कुछ कहना चाहता था, पर शब्द अटक रहे थे। भीड़ रुकी, हैरान। बलिदान का उत्साह ठंडा पड़ने लगा। कुछ लोग शर्म से सिर झुकाए हटने लगे।
पर यह शांति अधिक देर न टिक सकी। कुछ यहूदी अब इकोनियम से ही पीछा करते हुए लूस्त्रा में आ पहुँचे। उन्होंने भीड़ को फिर से भड़काया। इस बार प्रशंसा का स्वर क्रोध में बदल गया। वे लोग, जिन्होंने कुछ ही पल पहले पौलुस और बरनबास को देवता माना था, अब पत्थर उठा रहे थे। पौलुस पर हमला हुआ, पत्थरों की बौछार हुई। वह जमीन पर गिर पड़ा, रक्त से लथपथ। भीड़ ने समझा, वह मर गया है। उसके शिष्यों ने घेरा बनाया, और वे उस अचेत, टूटे हुए शरीर को शहर से बाहर खींचते हुए ले गए।
शाम ढल रही थी। शहर के फाटकों के बाहर, खुले मैदान में, वे इकट्ठा हुए। हवा में ठंडक थी। तभी, पौलुस की पलकें फड़कीं। उसने आँखें खोलीं। चारों ओर अपने शिष्यों के चेहरे देखे, जिनकी आँखें भय और राहत से भरी थीं। धीरे-धीरे, उनकी मदद से, वह उठ बैठा। उसके शरीर में हर जगह पीड़ा थी, पर उसकी आत्मा अदम्य थी। अगले ही दिन, सूरज निकलते ही, वह बरनबास के साथ फिर चल पड़ा – इस बार दर्बे की ओर। उसकी चाल धीमी थी, लड़खड़ाती थी, पर दिशा स्पष्ट थी।
दर्बे में उन्होंने फिर सुसमाचार सुनाया, बहुतों को शिष्य बनाया। और फिर, उसी रास्ते से लौटते हुए, वे उन्हीं शहरों में गए – लूस्त्रा, इकोनियम, अन्ताकिया – जहाँ उनके लिए पत्थर और षड्यंत्र इंतजार कर रहे थे। पर अब वे डर से नहीं, बल्कि एक दृढ़ता के साथ जा रहे थे। हर मण्डली में उन्होंने भाईयों को दृढ़ किया, यह कहते हुए कि “हमें बहुत क्लेशों के द्वारा परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना है।”
समुद्र की हवा में नमक और स्वतंत्रता की गंध थी जब वह जहाज पर चढ़े, अन्ताकिया लौटने के लिए। पौलुस ने पीछे मुड़कर देखा। वह धूप में चमकते तट को नहीं देख रहा था। वह उन चेहरों को देख रहा था – लूस्त्रा के उस चंगे हुए आदमी की आनन्दभरी आँखें, दर्बे के नए विश्वासियों की साधारण सभाएँ, इकोनियम के उन युवकों का दृढ़ संकल्प जिन्हें उन्होंने छोड़ा था। यात्रा समाप्त हुई, पर गवाही जारी थी। और जहाज की लकड़ी के फर्श पर खड़े, उसके चोगे पर अब भी लूस्त्रा की धूल और उसके अपने ही रक्त के धब्बे मौजूद थे – सुसमाचार के मूक गवाह।




