सूरज ढल चुका था, और सदोम की हवा में एक अजीब-सी गर्मजोशी और बेचैनी मिली-जुली थी। शहर के फाटक पर बैठे लूत ने दो पदचिन्ह धूल में उभरते देखे। यात्री थे, लंबे, गम्भीर चेहरे, साधारण यात्रियों जैसे वस्त्र, पर उनकी आँखों में एक असामान्य स्पष्टता थी, जैसे कोहरा छँट गया हो। लूत का दिल एक अजीब-सी घबराहट से धड़क उठा। उसने तुरंत उठकर उन्हें प्रणाम किया और आग्रह किया, “मेरे प्रभु, कृपया अपने दास के घर पधारें। रात बिताइए, पाँव धोइए, और भोर होने पर अपनी यात्रा पर निकल जाइए।”
उन्होंने मना करना चाहा, “नहीं, हम चौपाल में ही रात बिता लेंगे।” पर लूत का आग्रह इतना प्रबल था कि वे उसके साथ चल पड़े। घर पहुँचकर उसने बिना किसी शोर के अनाज की मीठी-गर्म रोटियाँ सेंकीं, और एक सादा भोजन परोसा। वे खा रहे थे कि तभी घर के चारों ओर एक सन्नाटा छा गया, और फिर वह सन्नाटा टूटा—धीरे-से सरसराहट से नहीं, बल्कि जानवरों के झुण्ड की-सी गर्जन और पदचाप से। पूरा शहर, बूढ़े-जवान, लगभग हर व्यक्ति, घर को घेरने आ गया था। आवाजें उठ रही थीं, “वे पुरुष कहाँ हैं, जो तेरे पास आए हैं? उन्हें बाहर ला, हम उन्हें जान लें।”
लूत का गला सूख गया। उसने दरवाजा बंद करके बाहर निकलने की कोशिश की, धीरे से। “भाइयो, ऐसी बुराई मत करो,” उसकी आवाज काँप रही थी। “देखो, मेरी दो बेटियाँ हैं, जिन्होंने अब तक पुरुष को नहीं जाना। मैं उन्हें तुम्हारे पास लाता हूँ, जैसा तुम चाहो वैसा उनके साथ करो। पर इन पुरुषों से कुछ मत करो, क्योंकि ये मेरी छत के आश्रय में आए हैं।”
पर भीड़ और भी उग्र हो उठी। “हट जा! तू परदेसी होकर हम पर हुकूमत करने आया है? अब तो तेरे साथ भी बुरा करेंगे।” वे दरवाजा तोड़ने के लिए आगे बढ़े। उसी क्षण, भीतर से दोनों यात्रियों ने हाथ बढ़ाकर लूत को भीतर खींच लिया और दरवाज़ा बंद कर दिया। और फिर, एक ऐसी चकाचौंध हुई, जैसे दरवाज़े की दरारों से बिजली कौंध गई हो। बाहर की भीड़ पर अचानक एक अँधा-सा आघात हुआ, छोटे-बड़े सभी पुरुष, दरवाज़ा टटोलते हुए, अपनी आँखों का रास्ता भूल गए। वे इधर-उधर भटकने लगे, दरवाज़ा ढूँढते हुए, पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
भीतर, हवा जम के बैठ गई। फिर उनमें से एक ने आवाज दी, “तेरा यहाँ और कौन है? दामाद, पुत्र, पुत्रियाँ, इस नगर में जो तेरा है, उसे निकाल ले। हम इस स्थान का नाश करने वाले हैं, क्योंकि इसके पाप की चिल्लाहट प्रभु के सामने बहुत बढ़ गई है।”
लूत की टाँगें काँपने लगीं। वह दौड़कर अपने आने वाले दामादों के पास गया, जो उसकी बेटियों से विवाह करने वाले थे। “उठो!” वह चिल्लाया, “यह नगर नाश होने वाला है!” पर उन्हें लगा मज़ाक कर रहा है। उसकी बातों में कोई सार नजर आया ही नहीं।
जब पौ फटने लगी, तो स्वर्गदूतों ने लूत से कहा, “उठ, अपनी पत्नी और इन दोनों पुत्रियों को लेकर निकल चल, नहीं तो इस नगर के दण्ड में तू भी नाश हो जाएगा।” लूत ठिठक गया। डर उसके रोम-रोम में बस गया था। स्वर्गदूतों ने उसका और उसके परिवार का हाथ पकड़ा, और प्रभु की दया से, शहर से बाहर निकाल लिया।
बाहर निकलकर, उनमें से एक ने कहा, “अपने प्राण बचा ले। पीछे मत देखना, और इस सारे मैदान में मत ठहरना। पहाड़ों की ओर भाग जा, वरना नाश हो जाएगा।”
लूत ने हाथ जोड़कर कहा, “हे प्रभु, नहीं। देख, तेरे इस दास पर तो तूने दया की है, पर पहाड़ों तक भागना… मैं नहीं भाग सकता। क्या वह छोटा-सा नगर नहीं है? वहाँ भाग जाऊँ, क्या वह छोटा नहीं है? और मेरा प्राण बच जाएगा।”
उसने उत्तर दिया, “सुन, इस बात में भी मैंने तेरी सुन ली है। उस नगर को मैं नाश नहीं करूँगा, जिसकी तू ने चर्चा की है। जल्दी कर, वहाँ भाग जा, क्योंकि जब तक तू वहाँ नहीं पहुँच जाता, मैं कुछ नहीं कर सकता।”
सूरज उग आया था, धरती पर सुनहरी रोशनी फैल रही थी, जब लूत छोटे से नगर, सोअर में पहुँचा। तभी प्रभु ने सदोम और अमोरा पर आग और गन्धक बरसाई। यह आग आकाश से नहीं, बल्कि धरती के गर्भ से, एक भयानक गर्जन के साथ फूट पड़ी, जैसे कोई विशाल भट्ठी अपनी ज्वाला उगल रही हो। पूरा मैदान, उन नगरों, और उस सारी भूमि के साथ-साथ जो कुछ भी उस मैदान में था, और नगरों में उगी हरियाली, सब कुछ भस्म हो गया।
लूत की पत्नी, जिसका नाम याद नहीं रखा गया, पीछे मुड़कर देखने के लिए ठिठक गई। शायद उस घर की याद आई, जहाँ उसने सारी जवानी गुज़ारी थी, या शायद वह धधकते आकाश को देखने को अधीर हो उठी। वह एक पल के लिए रुकी, और वही पल उसकी अन्तिम यात्रा का पल बन गया। वह नमक के एक स्तम्भ में परिवर्तित हो गई, एक मूक, ठहरी हुई मूर्ति, जो अब केवल पीछे देखने की चेतावनी भर बनकर रह गई।
लूत ने देखा होगा, या नहीं देखा होगा, पता नहीं। वह डर के मारे सोअर में रुका रहा, और उसकी बेटियों ने उसे एक गुफा में पनाह दी। आग की गर्जन थम गई, धुआँ छँट गया, और मैदान में एक भयानक शान्ति छा गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो। केवल नमक की वह कोमल, कड़वी चट्टानें बची रह गईं, जो आज भी एक कहानी कहती हैं—न्याय की, दया की, और पीछे मुड़कर देखने के खतरे की।




