पवित्र बाइबल

शिप्रा-पुवा का साहस और इज़राइलियों का संघर्ष

यह वह दिन था जब नील का पानी सूरज की रोशनी में तांबे की तरह चमक रहा था। मिस्र की धरती पर हवा में रेत के महीन कण तैर रहे थे, और गीज़े के पिरामिड पुराने संस्मरणों की तरह खड़े थे। परन्तु उन पत्थरों के बीच एक और कहानी जीवित हो रही थी – याकूब के वंशज, जो यूसुफ के समय से यहाँ बस गए थे, अब कोख की आशीष के कारण एक समुदाय नहीं, एक जनसमूह बन चुके थे।

वे गोशेन प्रदेश में रहते थे, परन्तु उनकी आवाज़ें, उनके बच्चों के किलकारे, अब मिस्र के शहरों की सीमाओं को लाँघने लगे थे। एक नया राजा, जो यूसुफ को नहीं जानता था, सिंहासन पर बैठा। उसकी नज़रें नील के पूर्व के उन इलाकों पर पड़ीं जहाँ इब्री लोग बसते थे। उसके दरबार में चर्चा हुई – “देख, इज़राइली लोग हमसे अधिक और बलवंत हो गए हैं। यदि कभी युद्ध हुआ, तो कहीं ऐसा न हो कि वे शत्रु से मिल जाएं और इस देश से निकल जाएं।”

यह डर, एक छोटी सी चिंगारी की तरह, राजा के मन में जलने लगा। और डर ने योजना को जन्म दिया। फिरौन ने कठोर कराधान लागू किया, उन पर भारी माँगें रखीं। उनसे पथरीले खेतों को उपजाऊ बनाने, नए भंडारगृह खड़े करने, और शहरों की चारदीवारी मज़बूत करने का काम लिया गया। यह सब ‘राज्य की भलाई’ के नाम पर।

परन्तु एक आश्चर्यजनक बात हुई। जितना उन पर बोझ डाला गया, उतना ही वे फैले। जितनी मज़दूरी कठोर हुई, उतने ही उनके परिवारों में जन्म हुए। मिस्री अधिकारी हैरान रह जाते। वे सुबह जब नील के किनारे इब्री मज़दूरों की पंक्तियों को काम पर लगाते, तो उनकी आँखों में एक अदम्य चमक दिखती। वह चमक डर की नहीं, बल्कि किसी गहरी, अदृश्य प्रतिज्ञा की थी।

फिरौन की चिंता बढ़ती गई। उसने हिब्रू दाइयों को बुलवाया, जिनके नाम शिप्रा और पुवा थे। वे दोनों अनुभवी महिलाएं थीं, जिनके हाथों ने असंख्य जन्म संभाले थे। राजा का आदेश स्पष्ट और निर्मम था – “जब तुम हिब्रू स्त्रियों का प्रसव कराने जाओ, और देखो कि यदि लड़का है, तो उसे मार डालना; परन्तु यदि लड़की है, तो उसे जीवित रखना।”

शिप्रा और पुवा ने यह आदेश सुना। उनकी चुप्पी में एक तूफान था। वे दरबार से निकलकर गोशेन की ओर लौटीं। रास्ते में खजूर के पेड़ों की छाया ठंडी थी, पर उनके मन गरम थे। शिप्रा ने पुवा की ओर देखा, बिना कुछ कहे। पुवा ने एक लम्बी साँस ली। उन दोनों ने फैसला कर लिया था। वे ईश्वर से डरती थीं, एक ऐसे फिरौन से नहीं जिसका हृदय पत्थर का बना था।

इसलिए जब वे किसी स्त्री के प्रसव-पीड़ा की चीख सुनकर उसकी कुटिया में पहुँचतीं, तो वे जीवन बचाने आती थीं। उनकी कुशल हथेलियाँ नन्हे शिशुओं को सहजातीं, उन्हें गुनगुने पानी से साफ़ करतीं, और माँ की गोद में सौंप देतीं। लड़का हो या लड़की – हर सांस पवित्र थी। उन्होंने फिरौन को सूचना दी कि “हिब्रू स्त्रियाँ मिस्री स्त्रियों के समान नहीं हैं, वे तो बलवती हैं; दाई के पहुँचने से पहले ही उनका प्रसव हो जाता है।”

और इस तरह, इज़राइली और भी बढ़ते गए। फिरौन का क्रोध सीमा से बाहर हो गया। उसने पूरे देश में एक नया हुक्म जारी किया – “जो कोई हिब्रू का लड़का पैदा होते देखे, उसे नील नदी में फेंक देना होगा। केवल लड़कियों को जीवित रखा जा सकता है।”

यह आदेश मिस्र की हवा में जहर की तरह फैल गया। अब खतरा दाईयों तक सीमित नहीं था। अब हर मिस्री पड़ोसी एक संभावित मुखबिर था। गोशेन की बस्तियों में रातों की शांति डर में बदल गई। माओं की आँखें बच्चों के मुँह पर टिकी रहतीं, उनकी हर सिसकनी पर कान लगाए रहते। नील नदी, जो जीवनदायिनी थी, अब एक संभावित कब्रगाह बन गई।

परन्तु इन्हीं अंधेरी रातों में, कुछ माएँ अपने नवजात बेटों को छिपाने के लिए चतुराई भरे उपाय सोचतीं। कोई तो बच्चे को घर के फर्श के नीचे बने छुपने की जगह में रखती, तो कोई उसे कपड़ों की गठरी में लपेटकर रखती। उनकी प्रार्थनाएँ, मन ही मन, ईश्वर तक पहुँचतीं – वही ईश्वर जिसने उनके पूर्वज इब्राहीम से वादा किया था कि तेरा वंश आकाश के तारों की तरह अनगिनत होगा।

यह कहानी अत्याचार की है, पर उससे भी ज्यादा लचीलापन की। यह मनुष्य के डर की कहानी है, पर उससे भी बढ़कर दो दाइयों के साहस की। उस समय कोई नहीं जानता था कि इन्हीं में से एक बच्चा, जिसे नील की धाराओं में फेंक दिए जाने का खतरा था, एक दिन उसी नदी से निकलेगा और एक ऐसी मुक्ति की यात्रा शुरू करेगा, जिसका गीत सदियों तक गाया जाएगा। परन्तु वह अभी आने वाला कल था। आज तो केवल संघर्ष था, विश्वास था, और उस अग्नि-परीक्षा में टिमटिमाती आशा की एक लौ।

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