एक गर्म दोपहर थी जब एलिय्याह ने अपने जैतून के बाग की मिट्टी को उंगलियों के बीच रगड़ा। वह खुरदरी थी, थोड़ी सूखी। उसने आसपास के खेतों को देखा जहां गेहूं की बालियां सुनहरी होने लगी थीं, लेकिन उसका अपना बाग, वह जानता था, अगले वर्ष आराम करेगा। सब्त का वर्ष। यहोवा की आज्ञा। पर इसे मन में बसाना इतना आसान नहीं था।
उसकी पत्नी, रिवका, घर से निकली, हाथ में पानी का मटका संभाले। “फिर सोच रहे हो?” उसने पूछा, आवाज में वह कोमलता जो सालों के साथ पैनी हुई थी।
“हां। छह साल तो हम बोते हैं, काटते हैं। सातवां साल… भूमि के लिए विश्राम। वचन है न? ‘तू न बोना और न काटना।’ पर दिमाग यही सोचता है, अगर बीज न डालेंगे, तो अगले वर्ष क्या होगा? बच्चे क्या खाएंगे?”
रिवका ने मटका जमीन पर रखा और उसके पास बैठ गई। “पर वचन यह भी तो कहता है, छठे साल इतनी फसल देंगे कि तीन साल चले। याद है पिछले सब्त वर्ष? दादा यहां बैठे थे, उन्होंने कहा था – यहोवा की व्यवस्था में विश्वास रखो, तुम्हारे लिए ही है यह। जमीन को भी सांस लेनी चाहिए। हमें भी, बस काम ही काम नहीं, उस पर निर्भर रहना सीखना चाहिए।”
एलिय्याह ने एक लंबी सांस ली। हवा में खेतों की सोंधी गंध थी। उसे अपने पिता की बात याद आई, जो अब इस संसार में नहीं थे। वे युबली के वर्ष के बारे में बताया करते थे। पचासवां वर्ष। जब हर इंसान अपनी विरासत की भूमि पर लौट आएगा। ऋण माफ हो जाएंगे। दास, आजाद। एक पूर्ण शुरुआत। पर युबली तो अभी दूर थी। पहले तो इस सब्त वर्ष का सामना करना था।
समय बीता। छठे वर्ष की फसल अद्भुत रही। जैतून के पेड़ लद गए, इतने कि डालियां झुक गईं। अन्न के भंडार भर गए। एलिय्याह हैरान था। जैसे प्रकृति स्वयं जानती हो कि उसे आराम करना है, इसलिए पहले भरपूर दे रही है।
सातवें वर्ष का पहला दिन आया। एलिय्याह खेत की मेड़ पर खड़ा था। हल उसके पास पड़ा था, लेकिन उसकी ओर देखने की भी उसकी इच्छा नहीं हुई। एक अजीब सी शांति थी उसके भीतर। उसने बाग में चलना शुरू किया। जमीन पर गिरे पके जैतून पड़े थे। उसने उन्हें उठाया। वचन कहता था कि सब्त वर्ष में जो कुछ स्वयं उग आए, वह सबके लिए है – मालिक के लिए, दास के लिए, परदेशी के लिए, जानवरों के लिए। उसने अपने बेटे नूह को आवाज दी। “इन्हें इकट्ठा कर लो, लेकिन पेड़ों को हिलाना मत। जो जमीन ने अपने आप दिया है, बस वही लेना है।”
उस साल अलग ही लय बनी। खेती के काम नहीं थे, तो समय था। एलिय्याह ने अपने बच्चों को कानून की बारीकियां सिखाईं। “देखो, यहोवा कहता है, ‘तुम मेरे हो, परदेशी और बसनेवाले नहीं।’ यह भूमि उसकी है, हम उसके मेहमान हैं। इसलिए भूमि को भी उसकी आराधना का अधिकार है। यह विश्राम भी एक तरह की आराधना है।”
कभी-कभी डर भी लगता। भंडार धीरे-धीरे कम हो रहे थे। पर तभी कोई पड़ोसी आ जाता, अपने बगीचे की स्वयं-उगी सब्जियां लाता। या फिर कोई परदेशी, जो रास्ता भटक गया था, उनके दरवाजे पर आता और सब मिलकर खाते। एलिय्याह ने महसूस किया कि यह विश्राम केवल भूमि का नहीं, लोगों के रिश्तों का भी था। लेन-देन के चक्र से मुक्ति। केवल सहभागिता।
फिर एक वर्ष, संकट आया। एलिय्याह के छोटे भाई की बीमारी में सब कुछ बिक गया। कर्ज चढ़ गया। अंततः, उसे अपनी जमीन के एक टुकड़े को बेचना पड़ा, और स्वयं को एक धनी परिवार के यहां कर्ज चुकाने के लिए सेवक बनना पड़ा। उसकी आंखों में अपनी विरासत से दूर जाने का दर्द था। रिवका चुपचाप रोई। पर यहोवा की व्यवस्था ने उन्हें निराश नहीं होने दिया।
“याद रखो,” एलिय्याह ने अपने परिवार से कहा, जब वे छोटी सी कुटिया में रहने आए, “हम सदा के दास नहीं हैं। युबली आएगा। पचासवां वर्ष। तब सभी बिकी हुई भूमि अपने मूल मालिक को लौट आएगी। मैं लौटूंगा। यहोवा का वचन है।”
वे साल गुजरे। एलिय्याह ईमानदारी से सेवा करता रहा। उसका स्वामी कठोर नहीं था, पर एलिय्याह का मन हमेशा अपने जैतून के उन पेड़ों में लगा रहता, जो अब किसी और के थे। वह युबली का इंतजार करता। हर दिन, वह परमपिता से प्रार्थना करता – “मेरा विश्वास बनाए रख।”
और फिर, आखिरकार, वह वर्ष आ ही गया।
युबली के वर्ष की घोषणा सातवें महीने, प्रायश्चित के दिन, तुरहियों के बजने से हुई। पूरे देश में उस ध्वनि ने एक उमंग भर दी। एलिय्याह उस सुबह काम पर जा रहा था कि तुरही की आवाज सुनाई दी। उसका हृदय धक से रह गया। वह दौड़ता हुआ अपने स्वामी के घर पहुंचा।
स्वामी दरवाजे पर खड़ा था, एक मुस्कान उसके चेहरे पर थी। उसके हाथ में कागज का एक पुलिंदा था – वह दस्तावेज जिसमें भूमि की बिक्री दर्ज थी। “एलिय्याह,” उसने कहा, “आज का दिन आ गया है। तुम्हारी भूमि तुम्हें लौटती है। तुम स्वतंत्र हो। यहोवा की व्यवस्था पूरी होती है।”
आंखों में आंसू भरकर एलिय्याह ने उन कागजों को लिया। वह अपने परिवार के पास लौटा। रिवका, अब बूढ़ी हो चुकी थी, उसके हाथ पकड़कर फूट-फूटकर रो पड़ी। उनके बच्चे, जो अब बड़े हो गए थे, उन सबने मिलकर उस छोटी सी कुटिया से अपनी पुरानी भूमि की ओर प्रस्थान किया।
जब वह अपनी जमीन पर पहुंचे, तो सूरज ढल रहा था। जैतून के पेड़ अभी भी वहीं खड़े थे, मजबूत, उनकी शाखाएं आसमान की ओर फैली हुईं। एलिय्याह ने जमीन को छुआ। वही खुरदरी, सोंधी मिट्टी। उसने ऊपर देखा। “धन्य है यहोवा,” उसने फुसफुसाया, “जिसने केवल हमें भूमि नहीं, बल्कि मुक्ति का चक्र दिया। विश्राम दिया। और हर पचास साल बाद… एक नई शुरुआत।”
उस रात, उन्होंने खुले आसमान के नीचे भोजन किया। कोई भव्य नहीं, बस सादा। पर उसमें एक स्वाद था – स्वतंत्रता का। और एलिय्याह ने अपने पोते-पोतियों को समझाया, जो चमकती आंखों से उसकी बात सुन रहे थे, “यह केवल कानून नहीं है, बच्चों। यह दया है। यह याद दिलाना है कि कोई भी सदा के लिए गरीब नहीं रहे, कोई सदा का दास नहीं बने। हमारा परमेश्वर न्यायी है, और उसकी व्यवस्था… जीवन देने वाली है।”
और दूर, खेतों में, तुरही की गूंज अब भी हवा में तैर रही प्रतीत होती थी – मुक्ति के वर्ष की मधुर घोषणा।




