शेखेम की उस घाटी में हवा गर्म और भारी थी, जैसे इतिहास स्वयं साँस ले रहा हो। आकाश नीला और निष्कलंक था, परन्तु वहाँ एकत्रित हुए लोगों के मनों पर एक गहरी, गंभीर छाया मँडरा रही थी। यहोशू अब बूढ़ा हो चला था। उसकी पीठ थोड़ी झुकी थी, किन्तु आँखों में वही पुरानी चिंगारी थी, वही स्टील जैसा दृढ़ संकल्प जिसने यरीहो की दीवारों को धराशायी किया था। वह एक बड़े पत्थर के सामने खड़ा था, जो शायद उस स्थान पर सदियों से पड़ा था, मूक गवाह की भाँति।
उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई। सभी गोत्र इकट्ठा थे – युवा योद्धा जिनके हाथों में तलवारों के घाव के निशान थे, वृद्ध जिनकी आँखों में मिस्र की गुलामी का दर्द अभी तक तैर रहा था, माताएँ अपने बच्चों को कसकर पकड़े हुए, सबके सब। एक सन्नाटा फैल गया, जिसमें केवल ऊँटों के पैरों की खड़खड़ाहट और दूर पहाड़ियों से आती हवा की सिसकारी सुनाई देती थी।
यहोशू की आवाज़, खुरदुरी पर दृढ़, उस सन्नाटे को चीरती हुई फैल गई। “यहोवा, इस्राएल का परमेश्वर, यह कहता है।”
उसने कोई प्रारंभिक औपचारिकता नहीं की। सीधे इतिहास के गर्भ में उतर गया। “तुम्हारे पूर्वज, तेरह का पिता अब्राहम, महानद के पार रहते थे। वहाँ वे अन्य देवताओं की पूजा करते थे, पत्थर और लकड़ी की मूर्तियों के सामने झुकते थे। परन्तु परमेश्वर ने उसे उस अंधकार से निकाला, उसे इस देश में लाया, और उसके वंश को बढ़ाया।”
यहोशू ने इशाक और याकूब का ज़िक्र किया, फिर मिस्र की ओर रुख किया। उसकी आवाज़ में एक कर्कशपन आ गया। “और तुम जानते हो कि मिस्र में क्या हुआ। तुम्हारे पूर्वज गुलाम बनाए गए। चिल्लाहटें, मिट्टी के ईंट, कोड़ों की चोट… यह सब तुम्हारी सामूहिक स्मृति का हिस्सा है, तुम्हारे रक्त में मिला हुआ है।”
तभी उसने मूसा और हारून का नाम लिया। और जैसे ही उसने दस आग्नेय आलोक की बात की, भीड़ में एक सहमति की लहर दौड़ गई। बुजुर्गों ने सिर हिलाया, मानो उन्होंने स्वयं लाल सागर को फटते देखा हो। यहोशू ने उन चालीस वर्षों का वर्णन किया, जो जंगल में बीते – भूख, प्यास, और फिर स्वर्ग से मन्ना, चट्टान से पानी। उसकी भाषा सरल थी, किन्तु प्रत्येक शब्द में एक दृश्य था। वह उन पुराने डेरों की धूल, आग के गड्ढों की गंध, और रात में प्रकाशस्तंभ की झिलमिलाहट को जीवंत कर रहा था।
“फिर तुम जंगल पार करके यहाँ आए,” यहोशू ने कहा, अपना हाथ घाटी और दूर की हरित पहाड़ियों की ओर फैलाते हुए। “सिहोन और ओग जैसे शक्तिशाली राजाओं को परास्त किया। यह तुम्हारी तलवारों से नहीं हुआ, न तुम्हारी चालाकी से। यह उसकी प्रबल भुजा से हुआ। उसने तुम्हें ऐसे नगर और ऐसे बाग दिए हैं, जिनके लिए तुमने परिश्रम नहीं किया। ऐसी दाखलताएँ और जैतून के बाग दिए हैं, जिन्हें तुमने नहीं रोपा।”
उसका स्वर अचानक बदल गया। नरम नहीं, बल्कि और भी कठोर, एक पत्थर की शिला जैसा। “अतः अब,” उसने कहा, “यहोवा का भय मानकर उसकी उपासना खरे मन से और सच्चाई से करो। और यदि बुरा लगे कि यहोवा की उपासना करो, तो आज ही चुन लो कि किसकी उपासना करोगे – चाहे उन देवताओं की जिनकी पूजा तुम्हारे पूर्वज महानद के पार करते थे, या फिर उन अमोरी देवताओं की जिनकी पूजा इस देश के निवासी करते हैं।”
वह रुका। उसकी पैनी नज़र एक-एक चेहरे पर घूम रही थी, मानो हर एक के हृदय की गहराई तक झाँक रही हो। “परन्तु मैं और मेरा घराना, हम यहोवा की ही उपासना करेंगे।”
यह एक चुनौती थी। एक सीमा रेखा खींच दी गई थी। भीड़ में एक हलचल मच गई। एक युवक ने अपनी माँ की ओर देखा। एक सिपाही ने अपनी तलवार की मूठ को जोर से पकड़ लिया। फिर, जैसे कोई एक स्वर उठता है, वैसे ही सबने उत्तर दिया। उनकी आवाज़ें शुरू में अलग-अलग थीं, फिर एक विशाल, गूँजती हुई लहर बन गईं। “हम यहोवा को छोड़कर और देवताओं की उपासना करने को तो कभी नहीं छोड़ेंगे! क्योंकि वही हमारा परमेश्वर है, वही है जिसने हमारे और हमारे पूर्वजों को मिस्र देश से, उस दासत्व के घर से निकाल लाया।”
परन्तु यहोशू की भृकुटियाँ तन गईं। उसने उनके उत्साह में एक छिपी हुई हल्की सी ढिलाई देखी, एक भविष्य की संभावना जहाँ यह प्रतिज्ञा टूट सकती थी। उसकी आवाज़ गर्जन की तरह गूँजी, “तुम यहोवा की उपासना न कर सकोगे! वह पवित्र परमेश्वर है; वह ईर्ष्या रखने वाला परमेश्वर है। यदि तुम उसकी उपासना करके भी दूसरे देवताओं की ओर फिरोगे, तो वह तुम्हारा अहित करेगा और तुम्हें सत्यानाश कर देगा।”
भीज़ एकबार फिर शांत हो गई। डर की एक ठंडी हवा चलने लगी। उनकी प्रतिज्ञा अब एक हल्की बात नहीं रह गई थी; यह एक जोखिम भरा, प्राणघातक समझौता था। फिर भी, उन्होंने दृढ़ता से उत्तर दिया, “नहीं! हम यहोवा की ही उपासना करेंगे।”
“तो फिर,” यहोशू ने कहा, और उसकी आँखें चमक उठीं, “तुम अपने विरुद्ध स्वयं साक्षी हो। तुमने स्वयं चुना है कि यहोवा ही तुम्हारा परमेश्वर है।”
“हाँ, हम साक्षी हैं!” उन्होंने कहा।
तब यहोशू ने वह कार्य किया जो उसकी समझदारी को दर्शाता था। “अच्छा है,” उसने कहा, “अब अपने बीच से सब देवताओं को दूर करो। अपने हृदयों को केवल यहोवा के लिए निश्छल बनाओ।”
और फिर उसने उस बड़े पत्थर की ओर इशारा किया, जिसके पास वह खड़ा था। “देखो, यह पत्थर हमारी बातों का साक्षी रहेगा। क्योंकि इसने यहोवा की सब बातें सुन ली हैं, जो उसने हमसे कही हैं। यह तुम्हारे विरुद्ध साक्षी रहेगा, कहीं ऐसा न हो कि तुम अपने परमेश्वर से झूठ बोलो।”
उसने पत्थर को खड़ा किया। वह एक साधारण पत्थर था, धूल से सना हुआ, गर्म सूर्य के नीचे चमकता हुआ। किन्तु उस क्षण वह एक स्मारक बन गया – न केवल एक दिन की प्रतिज्ञा का, बल्कि एक संपूर्ण जाति की नियति का, उनके चुनाव और उसके भारी दायित्व का।
लोग धीरे-धीरे बिखरने लगे, अपने डेरों को लौटने लगे। परन्तु उस पत्थर की छवि उनके मन से नहीं उतर रही थी। यहोशू वहीं खड़ा रहा, उस घाटी को देखता रहा जिसे परमेश्वर ने दिया था, और उस शिला को देखता रहा जो मूक साक्षी थी। सूर्य अस्त हो रहा था, और लंबी-लंबी छायाएँ पड़ रही थीं। एक वाचा समाप्त हो चुकी थी। एक और, निजी और गहरी, आरंभ हो चुकी थी – हर एक हृदय के भीतर, उस पत्थर के सामने।




