पवित्र बाइबल

पवित्र मंदिर की कांस्य कलाकृतियाँ

येरुशलेम की पहाड़ियों पर दोपहर की धूप तेज थी, परंतु मंदिर का प्रांगण एक अद्भुत सजीवता से भरा हुआ था। हथौड़ों की ठक-ठक, पत्थर तराशने की सीख-सीख, और लकड़ी के बुरादे की गंध हवा में तैर रही थी। पर आज का केंद्र वह खुला मैदान था जहाँ हूराम, तूर के राजा का भेजा हुआ कारीगर, अपने सहायकों के बीच खड़ा एक विशाल ढांचे को निहार रहा था।

यह कोई साधारण कुंड नहीं था। इसे ‘काँसे का समुद्र’ कहा जा रहा था। हूराम ने अपनी आँखों से नापा – गोलाई में बीस हाथ, और ऊँचाई में दस हाथ। उसकी दीवारें मोटी और भारी थीं, जिन पर उकेरी जाने वाली कल्पना अभी धातु में ढलनी बाकी थी। “यह केवल पानी का हौद नहीं होगा,” हूराम ने अपने प्रमुख शिल्पी से कहा, उसकी आवाज़ में एक गहरी गंभीरता थी। “यह परमप्रभु के सामने खड़े होने से पहले याजकों के शुद्धिकरण का प्रतीक है। इसलिए इसकी हर रेखा पवित्रता कहेगी।”

कई सप्ताह बीत गए। अब वह विशाल कुंड तैयार था, और उसके किनारे के नीचे, उसकी परिधि के चारों ओर, काँसे की दो पंक्तियाँ उभरी हुई थीं। बैलों के सिरों की आकृतियाँ, एक के पीछे एक, मानो वह पवित्र भार उठाए हुए हों। हर बैल की मूर्ति अलग थी – किसी की गर्दन तनी हुई, किसी के सींग झुके हुए – जैसे हूराम ने जानबूझकर एकरूपता से परहेज किया हो। उन्हें ढालने में धातु की असमान धाराएँ दिखती थीं, जो मनुष्य के हाथ का स्पर्श बताती थीं। कुंड का तला मोटा और स्थिर था, उस पर हथौड़े के निशान अभी तक चमकाए नहीं गए थे, जैसे समय की थाप को संजोए हुए।

उस ‘समुद्र’ के अलावा, दस कुंडियाँ भी बनीं। वे छोटी थीं, पर उतनी ही सुडौल। हर एक चार हाथ लम्बी, चार हाथ चौड़ी, और तीन हाथ गहरी। उन्हें पहियों वाले ठोस ढाँचों पर रखा गया, ताकि याजक उन्हें आसानी से ले जा सकें। हूराम ने हर कुंडी के फलकों पर उभार कर कुछ न कुछ अंकित किया – कहीं सिंह थे, कहीं बैल, कहीं केवल फूलों की बेलें। उसका एक सहायक बोला, “गुरु, ये सब एक जैसी क्यों नहीं बनाईं? समय बचता।” हूराम ने मुस्कुराते हुए कहा, “परमप्रभु की रचना में क्या कुछ एक जैसा है? हर पत्ता अलग होता है। हमारा हर बर्तन भी एक प्रार्थना है, एक अलग स्वर।”

सबसे मनमोहक कार्य था सोने का। भीतरी भवन में, जहाँ की हवा में चंदन की खुशबू रह-रहकर आती थी, दस मेजें रखी गईं। उन पर भेंट की रोटी सजेगी। और दस दीवट – हर एक सात-सात शाखाओं वाला, जटिल नक्काशी से सजा। सोने को पीटकर, तानकर, मोड़कर उन आकृतियों में ढालना एक साधना थी। कारीगर कई बार चूक जाते, फिर से शुरू करते। एक दीवट की एक शाखा थोड़ी टेढ़ी रह गई थी, पर हूराम ने उसे ठीक नहीं करवाया। “इसी से पहचाना जाएगा कि मनुष्य के हाथों से बना है,” उसने कहा।

फूलदान, कलछियाँ, कटोरे – हर वस्तु का एक उद्देश्य था। बड़े कटोरे होलोकॉस्ट की भेंट के लिए, छोटे कटोरे फलाहार के लिए। काँसे के सारे बर्तनों को रोज धोया जाता, उन पर पानी के छींटों के निशान दिखाई देते। सोने के बर्तनों पर मुलम्मे की चमक नहीं थी, बल्कि गहरे पीलेपन की एक कोमल आभा थी, जो दीपक की लौ में और निखर उठती।

एक दिन, जब सब कुछ तैयार था, हूराम प्रांगण में खड़ा सबको देख रहा था। ‘काँसे का समुद्र’ पानी से लबालब भरा था, और सूरज की किरणें उसकी सतह से टकराकर दीवारों पर नाचती लहरों के समान प्रतिबिम्ब बना रही थीं। दस कुंडियाँ एक कतार में चमक रही थीं। भीतर से सोने के दीवटों की शांत ज्योति झिलमिला रही थी। उसने एक लंबी सांस ली। ये सब वस्तुएं मात्र उपकरण नहीं थीं। वे एक मौन वार्ता थीं, मनुष्य के परिश्रम और दिव्य आह्वान के बीच की एक कड़ी। हर टंकाई, हर उभार, हर असमान किनारा यह गवाही दे रहा था कि यह स्थान मनुष्यों के हाथों से तैयार हुआ है, परंतु उसकी योजना किसी और की है। हवा में फिर वही हथौड़ों की आवाज़ गूंज उठी, कहीं दूर, किसी और काम से। पर आज उस आवाज़ में एक संगीत था, एक पूर्णता का स्वर।

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