शाम ढल रही थी। यरूशलेम की पहाड़ियों पर सुनहरी धूप फैली हुई थी, मानो स्वर्ग ने हल्के हाथों से सोने का चूरा बिखेर दिया हो। महल की छत पर खड़ा दाऊद, दूर तक फैले नगर को देख रहा था। उसके चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में एक अजीब सी चमक, एक गहरी शांति। बस कुछ ही दिन पहले वह युद्ध के मैदान से लौटा था। धूल और पसीने में सना हुआ, तलवार पर सूखे लहू के दाग लिए। पर आज? आज वह स्वच्छ वस्त्र पहने, मुकुट सिर पर लिए, अपने प्रभु के सामने खड़ा था।
हवा में ठंडक थी। उसने अपने ऊपर डाले हुए बढ़िया बैंगनी चोगे को कसकर लपेट लिया। मन में बार-बार वही पल घूम रहा था – जब शत्रु की सेना घाटी में उमड़ पड़ी थी, और उसके अपने सैनिकों की आँखों में डर साफ झलक रहा था। तब उसने आँखें बंद की थीं, और बस इतना कहा था, “हे प्रभु, तेरे बल पर ही हम विजय पाएँगे।” और फिर क्या हुआ, यह वह स्वयं भी पूरी तरह नहीं समझ पाता। एक अजीब सी दहल मच गई शत्रु की सेना में, मानो उनके हृदय ही बिजली के एक झटके से काँप उठे हों। उनकी योजनाएँ टूट गईं, उनकी तलवारें निरर्थक हो गईं। विजय… इतनी सहज, इतनी पूरी, मानो वह प्रभु की हथेली से सीधे उसकी ओर रख दी गई हो।
उसकी आँखें अचानक नम हो आईं। यह उसकी अपनी शक्ति नहीं थी। न ही उसकी सेना की संख्या या उसके हथियारों की तीक्ष्णता। यह तो वह प्रतिज्ञा थी, जो उस चरवाहे बालक से की गई थी, जो भेड़ों को चराते हुए भी गीत गुनगुनाया करता था। “मैं तेरा राज्य स्थिर करूँगा।” ये शब्द उसके कानों में गूँज रहे थे। और आज, वह राजा था। न सिर्फ नाम का, बल्कि एक ऐसा राजा जिसके शत्रु धूल चाट रहे थे।
उसने धीरे से एक लम्बी साँस ली। हवा में फूलों की सुगंध थी, शायद निचले बागों से उड़कर आ रही थी। उसने मन ही मन कहा, “प्रभु, तूने मेरे मन की इच्छा पूरी की। तूने मेरे ओठों की याचना से इनकार नहीं किया।” उस याचना का क्षण भी उसे याद आया – रात के अँधेरे में, मशाल की टिमटिमाती लौ में, जब उसने विनती की थी कि उसका हृदय दृढ़ रहे, उसका हाथ काँपे नहीं। और प्रभु ने सुना। उसने न सिर्फ विजय दी, बल्कि उसे “पवित्र मुकुट” से भी विभूषित किया – वह मुकुट जो केवल सोने का नहीं, बल्कि उस पर अंकित प्रभु की अनुकंपा का प्रतीक था।
तभी उसे लगा जैसे उसका हृदय और भी भारी हो गया है। कृतज्ञता का भार, जो सुखद था, पर उतना ही गंभीर भी। प्रभु ने उसे जीवन की लम्बाई दी थी, शत्रुओं पर विजय दी थी, महिमा और ऐश्वर्य दिया था। पर यह सब क्यों? केवल उसके लिए? नहीं। वह जानता था। यह सब इसलिए कि संसार जाने कि यहोवा ही प्रभु है। उसकी विजय, उसका राज्य, प्रभु की ही सामर्थ्य का प्रमाण था।
दूर, पहाड़ियों के पार, अँधेरा धीरे-धीरे फैल रहा था। पर दाऊद के मन में कोई भय नहीं था। वह जानता था, प्रभु का क्रोध उन पर भड़केगा जो उसकी अवज्ञा करते हैं। वह आग की लपटों की तरह उन्हें भस्म कर देगा। उसकी अपनी तलवार से नहीं, बल्कि स्वयं प्रभु के हाथ से। उसकी भूमिका तो बस विश्वास के साथ खड़े रहने की थी। प्रभु की योजना को पूरा होते देखने की।
उसने अपने हाथ जोड़े। आवाज़ थोड़ी काँप रही थी, भावनाओं से भरी हुई। “हे यहोवा, तू अपनी सामर्थ्य के कारण ही उन्नति करेगा। हम तेरे पराकमण के गीत गाएँगे।” ये शब्द उसके हृदय से निकले, एक नए गीत के बीज की तरह, जो कल शायद वह भजन के रूप में गुनगुनाएगा।
छत से उतरते हुए, उसके कदमों में एक नई दृढ़ता थी। राजमहल के लम्बे गलियारों से गुजरता हुआ वह अपने कक्ष की ओर बढ़ा। दीवारों पर टंगी मशालें उसके चेहरे पर खेलती रहीं। वह जानता था, चुनौतियाँ कभी खत्म नहीं होंगी। नए शत्रु उठेंगे, नई घेराबंदियाँ होंगी। पर आज का यह अनुभव, यह निश्चयता, उसके साथ रहेगी। प्रभु ने उसे अभी तक सँभाला था, और आगे भी सँभालेगा। यह विश्वास ही उसकी सच्ची शक्ति थी, उस सोने के मुकुट से भी कहीं अधिक मूल्यवान।
कमरे में प्रवेश करते ही उसकी दृष्टि एक कोने में रखे उस साधारण लकड़ी के सिंहासन पर पड़ी, जिस पर वह प्रार्थना करता था। यही उसकी वास्तविक गद्दी थी। उसने मुकुट उतार कर धीरे से रख दिया, और उस सिंहासन के सामने घुटने टेक दिए। अब शब्द नहीं थे। बस एक स्तब्ध, कृतज्ञ मौन, जो सारे गद्य और पद्य से ऊपर था। बाहर, तारे टिमटिमाने लगे थे, मानो स्वर्गदूत उसकी मौन प्रार्थना में ‘आमेन’ कह रहे हों।




