वह सुबह धुंधली थी, ठीक वैसे ही जैसे यरूशलेम के दिल पर पिछले कई सालों से एक धुंध सी छाई हुई थी। एलीआसफ़, जो अब बूढ़ा हो चला था, मंदिर के उन खंडहरों के बीच खड़ा था जहाँ कभी उसकी दुनिया रहा करती थी। हवा में मिट्टी की महक थी, और उस महक में मिला हुआ था एक स्मृति-सा अहसास – उस समय की याद जब यह स्थान जीवन और गीतों से गूंजा करता था। अब सन्नाटा था, जिसे तोड़ती थीं सिर्फ दूर कहीं एक टूटी दीवार से गिरते पत्थरों की आवाज़, और उसके अपने, थके हुए साँसों की सिसकी।
उसकी उंगलियाँ एक जर्जर पत्थर को टटोल रही थीं, जिस पर शायद दाऊद के किसी गीत का अंश उकेरा गया था। उसके मन में शब्द उमड़ रहे थे, वे शब्द जो उसने बचपन से सुने थे, जो उसके पिता और उससे पहले उसके पिता के पिता गुनगुनाया करते थे। “हे यहोवा, तू ने अपनी भूमि पर अनुग्रह किया है।”
क्या किया था? एलीआसफ़ ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसकी स्मृति में ताज़ा थे वो दृश्य – लौटती हुई भीड़, उजड़े हुए लोग, जिनकी आँखों में बस एक ही प्रश्न था: क्या सच में? क्या सच में परमेश्वर ने हमारे कैद के दिन पूरे कर दिए? वे लौटे तो थे, पर लौटी थी सिर्फ देहें। आत्माएं अब भी उस रास्ते पर भटक रही थीं, जो बेबीलोन से यरूशलेम तक जाता था।
वह धीरे-धीरे उस टीले पर बैठ गया जहाँ से पूरा नगर दिखाई देता था। घरों की छतें अधिकतर ढह चुकी थीं। धुँधली धूप में कहीं से धुआँ उठ रहा था, शायद कोई भोजन पका रहा था, या शायद पुरानी लकड़ियाँ सड़ रही थीं। “तूने अपनी प्रजा का दोष दूर किया,” उसने फुसफुसाया। दोष। यह शब्द हवा में लटकता रह गया। क्या दोष सच में दूर हुआ था? क्या वह सब कुछ, उनकी अवज्ञा, उनका मूर्तिपूजा की ओर झुकाव, उनकी आपसी कटुता… क्या वह सब सिर्फ इतिहास की एक पंक्ति बनकर रह गया था? उसका अपना हृदय, जो अभी भी कभी-कभी कड़वाहट और शक से भर जाता था, क्या वह शुद्ध हो पाया था?
एक पक्षी, शायद एक छोटी सी चिड़िया, किसी झाड़ी में से उड़कर एक टूटे हुए खम्भे पर जा बैठी। उसने एक तीखी, एकाकी आवाज़ निकाली। एलीआसफ़ ने उसे देखा। उसकी आवाज़ में एक प्रश्न था, वही प्रश्न जो उसकी अपनी आत्मा में गूंज रहा था। “हे परमेश्वर हमारे उद्धारकर्ता, क्या तू हम पर से अपना रोष सदैव के लिए दूर करेगा?” रोष। उन सभी ने उसे देखा था – यरूशलेम की जलती हुई दीवारें, युवाओं के हाथों में बेड़ियाँ, बच्चों की चीखें जो रात के सन्नाटे में डूब गई थीं। क्या वह आग अब बुझ गई थी? या वह अभी भी कहीं दबी हुई थी, जैसे कोई सुलगता हुआ अंगार?
दोपहर ढलने लगी। हवा का रुख बदला और उसके साथ ही मिट्टी की गंध के स्थान पर दूर जैतून के बागों से आती हुई हरी पत्तियों की सोंधी खुशबू आने लगी। एलीआसफ़ ने सिर उठाया। उसने महसूस किया, जैसे उसके भीतर का संघर्ष धीरे-धीरे एक प्रार्थना बनने लगा है। यह प्रार्थना उसके होंठों पर नहीं, उसकी साँसों में थी, उसकी धड़कनों में। “क्या तू फिर हमें जिलाएगा? क्या तेरी प्रजा तुझ में मगन नहीं होगी?”
तभी उसकी नजर दूर पश्चिम की ओर गई, जहाँ सूरज डूब रहा था। बादलों के फहरों के बीच से सुनहरी किरणें फूट रही थीं, और वे किरणें उन खंडहरों पर पड़ रही थीं, उन टूटे फर्शों पर, उस उजाड़ चबूतरे पर। और कुछ पलों के लिए, वह सब कुछ जैसे सोने से जगमगा उठा। यह दृश्य एकदम स्थिर था, मानो समय ठहर गया हो। एलीआसफ़ के हृदय में एक कोमल, गर्म सी उमंग उठी। यह उम्मीद नहीं थी, न ही यह विश्वास का कोई जोरदार दावा। यह बस… एक आभास था। एक सुनिश्चितता की झलक, जैसे दूर क्षितिज पर किसी प्रियजन का आने का संकेत मिल जाए।
उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और प्रार्थना के वे शब्द, जो उसकी ज़बान पर नहीं चढ़ पा रहे थे, उसके भीतर ही गूंज उठे। “हे यहोवा, अपनी करूणा मुझ पर दिखा। मुझे अपना उद्धार देदे।” यह उसकी व्यक्तिगत याचना नहीं रह गई थी। यह उस पूरी घाटी, उन सभी टूटे हुए घरों, उन सभी थके हुए लोगों की पुकार बन गई, जो चाहते थे कि उनकी भूमि फिर से पवित्र हो, कि उनके और उनके परमेश्वर के बीच फिर से वह बातचीत शुरू हो जो कभी टूट गई थी।
अचानक, वह सन्नाटा जो उसे भारी लग रहा था, अब शांतिमय लगने लगा। यह उजाड़ नहीं था, यह एक प्रतीक्षा थी। एक ऐसी प्रतीक्षा जिसमें संगीत के सुर सोए हुए हैं, और वे जागने वाले हैं। उसे लगा, जैसे परमेश्वर का वचन – वह वचन जो सृष्टि के आरम्भ में था – इस धरती पर फिर से बोला जाएगा। और जब वह बोला जाएगा, तो वह सिर्फ शब्द नहीं होगा। वह शांति होगी। एक ऐसी शांति जो सिर्फ लड़ाई के खत्म होने का नाम नहीं है, बल्कि एक गहरी, स्थायी मेल-मिलाप है। न्याय और शांति का चुम्बन।
वह कल्पना करने लगा – न्याय, जो कठोर और स्पष्ट है, वह आकाश से उतर रहा है। और शांति, जो कोमल और सहनशील है, वह धरती से उठ रही है। और वे दोनों, एक दूसरे की ओर बढ़ते हुए, मिलते हैं। एक दुर्लभ, पवित्र मिलन। और उस मिलन से जो फल फूटेगा, वह सच्चाई होगी। वह ईमानदारी होगी जो लोगों के हृदयों से उगेगी, और न्याय की ओर से झुककर उसे सींचेगी।
शाम हो गई थी। पहला तारा टिमटिमा रहा था। एलीआसफ़ ने अपने घुटनों से उठकर खड़े होने में मदद ली। उसका शरीर दर्द कर रहा था, पर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। उसे अब उत्तर नहीं चाहिए थे। उसे अब एक वादा याद आ गया था, एक ऐसा वादा जो अभी पूरा नहीं हुआ था, पर जिसकी पहली बूंद उसने अपने भीतर महसूस कर ली थी। “यहोवा हमारे लिए भला करेगा,” उसने धीरे से कहा, “और हमारी भूमि अपनी उपज देगी।”
वह उस टीले से नीचे उतरने लगा, उस रास्ते पर जो शहर में जाता था। उसकी छाया लम्बी होकर उसके आगे-आगे चल रही थी, मानो उसे रास्ता दिखा रही हो। रात की ठंडी हवा चलने लगी, और उस हवा में अब सिर्फ मिट्टी की गंध नहीं, बल्कि आने वाले वर्षा के मौसम की ताज़गी का एक इशारा भी था।




