पवित्र बाइबल

समुद्र और करुणा की कहानी

यह कहानी उस समय की है जब व्यापारी योनातान समुद्र के रास्ते दूर-दूर तक जाने लगे थे। उनका जहाज़, ‘तेरेस’, लबानन के देवदार की लकड़ी का बना था, और उसके पाल मोटे सनी के थे। वह टायर के बंदरगाह से चला था, और अब वह समुद्र के उस पार, एक ऐसे भूभाग की ओर बढ़ रहा था जिसके बारे में उसने केवल किंवदंतियाँ सुन रखी थीं। योनातान नमकीन हवा में सांस लेता, आँखें सामने की ओर टिकाए, और मन ही मन उस छोटे से भजन को दोहरा रहा था जो उसके पिता ने बचपन में सिखाया था: “सब जातियों, यहोवा की स्तुति करो; सब देशों के लोगों, उसकी प्रशंसा करो।”

वह भजन उसे अजीब लगता था। सब जातियाँ? उसने तो केवल अपने लोगों को ही मंदिर में स्तुति गान गाते देखा था। उसने सीरिया के व्यापारियों को अपने देवताओं के नाम पर शपथ लेते सुना था, और मिस्र के सैनिकों को उनकी अजीबोगरीब मूर्तियों के आगे घुटने टेकते देखा था। परमेश्वर की स्तुति तो सिय्योन की ऊँचाइयों पर ही गूँजनी चाहिए, उसने सोचा। समुद्र के किनारे बसे इन नगरों में नहीं।

जहाज़ एक विदेशी बंदरगाह पर लगा। यहाँ की हवा में मसालों, गीले पत्थर और आवारा पशुओं की गंध मिली-जुली थी। योनातान का सौदा स्थानीय एक सरदार से था, जिसका नाम अर्शक था। अर्शक का चेहरा धूप से जला हुआ था, उसकी दाढ़ी घनी और काले तेल से चमकदार। उसकी आँखों में एक कठोर चमक थी, जो एक ऐसे आदमी की थी जिसने जीवन में बहुत कुछ देख लिया था। व्यापार की बातचीत के दौरान, अर्शक ने एक बार अपने होंठ सिकोड़े और कहा, “तुम्हारा ईश्वर… वह कैसा है? हमारे यहाँ तो समुद्र की देवी और आकाश के देवता हैं। तुम्हारा एक ही है, ऐसा सुनता हूँ।”

योनातान ने सावधानी से जवाब दिया, “वह दयालु है। उसकी करुणा महान है।”

“दयालु?” अर्शक ने एक ठंडी हँसी हँसी, “इस समुद्र में दया नहीं, केवल ताकत बचाती है। देखो मेरे बेटे को।” उसने एक युवक की ओर इशारा किया जो दूर खड़ा था। “पिछले महीने एक तूफान में वह लगभग मर गया था। उसकी नाव चूर-चूर हो गई थी। किसने उसे बचाया? दया ने नहीं, बल्कि उसकी अपनी बाहों की ताकत ने, और उस चट्टान का सहारा जो समुद्र से ऊपर निकली थी।”

योनातान चुप रहा। सौदा पूरा हुआ। जब वह लौटने लगा तो अर्शक ने अचानक कहा, “रुको।” वह अंदर गया और एक छोटी सी, पत्थर की नक्काशीदार मूर्ति लेकर आया। “यह हमारी समुद्री देवी की है। इसे ले जाओ। तुम्हारी यात्रा सुरक्षित रहेगी।”

योनातान ने इनकार किया, पर अर्शक ने ज़ोर देकर उसे वह मूर्ति थमा दी। “मेरा उपहार है। तुमने मेरे साथ ईमानदारी से व्यवहार किया। तुम्हारे चेहरे पर वह छल नहीं है जो अक्सर समुद्री यात्रियों के चेहरे पर देखने को मिलता है।”

वापसी की यात्रा में भीषण तूफान आया। आकाश काला पड़ गया, लहरें पहाड़ों जैसी ऊँची उठने लगीं। ‘तेरेस’ इस पीड़ा में कराहता रहा। नाविक डर से चिल्ला रहे थे, अपने-अपने देवताओं का नाम ले रहे थे। योनातान ने अर्शक द्वारा दी गई मूर्ति को देखा जो उसके सामान में पड़ी थी। वह व्यर्थ की लकड़ी और पत्थर लगी। उसकी आत्मा घबराई, और तब उसने वे शब्द निकाले, “क्योंकि हम पर उसकी करुणा प्रबल है।” वह चिल्ला नहीं रहा था। बस दोहरा रहा था, “उसकी करुणा प्रबल है।” उसने मूर्ति को समुद्र में फेंक दिया।

और फिर, धीरे-धीरे, तूफान थमा। बादल छंटने लगे। एक टूटी हुई नाव, जिस पर कोई नहीं था, उनके जहाज़ के पास से बहती निकली। योनातान ने देखा – उस नाव के मलबे में एक चट्टान फँसी हुई थी, जिसने उसे पूरी तरह से डूबने से बचा रखा था। उसकी आँखें खुल गईं। अर्शक के बेटे की कहानी याद आई। क्या वह चट्टान…?

कई महीने बाद, योनातान फिर उसी बंदरगाह पर पहुँचा। अर्शक उसे देखकर चकित रह गया। “तुम जीवित हो! हमने सोचा था वह तूफान सबको लील गया होगा।”

योनातान ने उस मूर्ति के बारे में बताया। फिर उसने कहा, “तेरा बेटा… उसे जिस चट्टान ने बचाया था, उस चट्टान ने ही मेरे जहाज़ को राह दिखाई। यह कोई संयोग नहीं है, अर्शक।”

अर्शक गंभीर हो गया। वह बहुत देर तक चुप रहा। फिर उसने अपने युवा बेटे को बुलाया। “बताओ इस व्यक्ति को, उस रात तूने क्या देखा था, जब तू उस चट्टान पर चढ़ा था?”

युवक ने कहा, “मैंने कोई देवता नहीं देखा, पिता। मैंने केवल अंधेरा और ठंड देखी। पर जब मैंने हार मान ली थी, तब मेरे मन में एक विचार आया – उत्तर की ओर रेंगो, क्योंकि वहाँ ज़मीन होगी। यह विचार कहाँ से आया? मैं नहीं जानता। यह मेरी अपनी समझ नहीं थी।”

योनातान का गला भर आया। उसने कहा, “मेरे पिता ने एक गीत सिखाया था। ‘क्योंकि हम पर उसकी करुणा प्रबल है।’ करुणा केवल एक भावना नहीं है, अर्शक। वह एक शक्ति है। वह चट्टान बन सकती है। वह मन में एक विचार बन सकती है। वह तूफान को शांत कर सकती है। और वह सभी के लिए है। केवल मेरे लोगों के लिए नहीं।”

अर्शक ने अपने बेटे की ओर देखा, फिर उस विशाल, नीले समुद्र की ओर देखा जो सबको जोड़ता है। उसकी आँखों में वह कठोर चमक धुंधली पड़ गई। “स्तुति करो,” उसने धीरे से कहा, जैसे स्वयं से बात कर रहा हो। “उसकी स्तुति करो।”

उस दिन, दो अलग-अलग धरती के लोग, दो अलग-अलग भाषाएँ बोलते हुए, एक ही सत्य के सामने नतमस्तक हुए। और योनातान ने अंततः समझा कि भजनकार ने जो कहा था, वह आज्ञा नहीं, एक घोषणा थी। “सब जातियों, यहोवा की स्तुति करो” – यह इसलिए नहीं क्योंकि हम चाहते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि उसकी करुणा हर दिशा में फैल चुकी है, हर किनारे को छू चुकी है, हर मन को छुआ है, चाहे वह उसे किसी भी नाम से पुकारे। और यहोवा की सच्चाई युगानुयुग बनी रहती है। समुद्र का ज्वार-भाटा भी उसकी निश्चितता का सामना नहीं कर सकता।

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