यह सब उसके बाद हुआ, जब गिदाल्याह का वध हो चुका था। मिस्पा का वह आंगन, जहाँ कभी नबूजरदनेजर के प्रतिनिधि ने शांति की छाया बिछाने की कोशिश की थी, अब एक सन्नाटे से भरा हुआ था, जो चीख़ से भी ज़्यादा डरावना लगता था। हवा में राख और डर की गंध थी। खंडहर हो चुके यरूशलेम से बचकर आए हुए लोग—सैनिक, किसान, औरतें, बच्चे—एक अनिश्चित भीड़ की तरह इकट्ठे थे। उनकी आँखों में एक ही सवाल था: अब क्या?
योहानान बिन करेह, जो उन दिनों एक मुखिया के रूप में उभरा था, ने सबको इकट्ठा किया। उसके चेहरे पर दृढ़ता थी, पर आँखों के कोनों में एक कंपकंपी भी थी। वह यजन्याह और कुछ और प्रधानों के साथ यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के पास गया। यिर्मयाह उसी उजड़े हुए नगर के किनारे एक टूटी-फूटी कोठरी में रह रहे थे। उनके चेहरे पर समय और दुख की गहरी लकीरें पड़ चुकी थीं, मानो पहाड़ों पर बारिश से बने खड्ड हों।
“हमारी विनती सुनिए,” योहानान ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सा मिलावटी लहजा था—आदर और जल्दबाजी दोनों। “चाहे जो कुछ भी परमेश्वर आपके द्वारा हमें कहे, हम उसे मानेंगे। चाहे अच्छा हो या बुरा। हम अपने परमेश्वर यहोवा की आवाज़ मानेंगे, ताकि हमारा भला हो।”
यिर्मयाह ने उनकी ओर देखा। वह इन शब्दों से परिचित थे। कितनी बार लोगों ने ऐसे ही वचन दिए थे, और कितनी बार उन्होंने उन वचनों को धूल में मिला दिया था। फिर भी, उन्होंने कोई उपदेश नहीं दिया, कोई पुरानी बातें याद नहीं दिलाईं। बस इतना कहा, “ठीक है। जैसा तुम कहते हो, वैसा ही मैं परमेश्वर से प्रार्थना करूँगा। और जो कुछ भी वह कहेगा, मैं तुमसे छिपाऊँगा नहीं।”
लोग इंतज़ार करने लगे। दिन गुज़रते गए। एक, दो, तीन… यिर्मयाह परमेश्वर की प्रतीक्षा करते रहे। भीड़ में बेचैनी फैलने लगी। कुछ लोग फुसफुसाने लगे कि शायद परमेश्वर ने उन्हें छोड़ दिया है। कुछ का डर बढ़ता जा रहा था कि बाबुल के लोग गिदाल्याह के हत्य का बदला लेने आएँगे। मिस्पा की हवा में अफ़वाहों के बीज उड़ रहे थे, और वे जल्दी ही अंकुरित होकर दहशत के पेड़ बन गए।
दस दिन बीत गए। फिर, एक सुबह, यिर्मयाह ने सबको बुलाया। वह सामान्य से अधिक गंभीर लग रहे थे, मानो उन पर कोई भारी बोझ हो। लोग चुपचाप इकट्ठा हुए। बच्चों की फुसफुसाहट भी बंद हो गई।
“इस्राएल का परमेश्वर, जिसकी तुमने सेवा करने की माँग की है, यह कहता है,” यिर्मयाह ने आवाज़ उठाई। उनकी आवाज़ में वह पुराना, अटूट सा अधिकार था, जो दीवारों के पार भी सुनाई देता। “यदि तुम इस देश में बने रहो, तो मैं तुम्हें बनाऊँगा, नाश नहीं करूँगा। मैं तुम्हें लगाऊँगा, नहीं उखाड़ूँगा। मैं उस विपत्ति से जिससे तुम डरते हो, तुम्हें बचा लूँगा। मैं तुम पर दया करूँगा, और तुम पर दया करके तुम्हें अपने स्थान पर बसा दूँगा।”
एक राहत की सांस भीड़ में फैली। पर यिर्मयाह अभी बोल रहे थे। उनकी आँखें अब और भी तीखी हो गईं।
“पर यदि तुम कहो, ‘नहीं, हम इस देश में नहीं रहेंगे,’ और मिस्र जाकर वहाँ बसने की जिद करो, जहाँ तुम युद्ध और अकाल से नहीं डरोगे… तो सुनो। जिस तलवार से तुम डरते हो, वह वहीं मिस्र में तुम्हें जा लगेगी। जिस अकाल से तुम घबराते हो, वह वहीं तुम्हारे पीछे-पीछे चला आएगा। और वहीं तुम मरोगे। मिस्र में तुम्हारी कब्रें होंगी।”
यिर्मयाह ने अपनी साँस रोकी, मानो अंतिम बात कहने के लिए अपने आप को तैयार कर रहे हों।
“तुम्हारे पैरों ने जब मिस्र की धूल छुई, तब समझ लो कि तुमने अपने परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया। और उसकी आराधना करने के लिए जिन मूर्तियों के सामने तुम हाथ फैलाओगे, वही तुम्हारे विनाश का कारण बनेंगी। तुमने जो वचन दिया था, ‘हम सब कुछ मानेंगे,’ उसे याद रखो। आज तुम्हारे सामने जीवन और मृत्यु, आशीष और श्राप रख दिया गया है। इस देश में रहो। डरो मत।”
वहाँ एक क्षण को पूरी तरह सन्नाटा छा गया। फिर योहानान ने आवाज़ उठाई। पर अब उसकी आवाज़ में वह नम्रता नहीं थी। उसमें एक चिढ़ थी, एक ठोस अविश्वास था।
“तुम झूठ बोल रहे हो!” उसने कहा, आवाज़ भारी और आरोप से भरी। “हमारे परमेश्वर यहोवा ने तुम्हें यह नहीं कहलाया। बरूक ने तुम्हें हमारे विरुद्ध खड़ा कर दिया है, ताकि हम बाबुलियों के हाथ मारे जाएँ!”
भीड़ में हलचल मच गई। लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे। भय ने, एक बार फिर, उनकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया। यिर्मयाह ने विरोध करने की कोशिश की, पर अब कोई सुनने को तैयार नहीं था। वह वचन, “हम सब कुछ मानेंगे,” हवा में घुल गया, मानो कभी बोला ही नहीं गया हो।
और फिर, एक दिन, उन्होंने बचे-खुचे सामान बाँधे। औरतों ने रोती-बिलखती अपने बच्चों को गोद में उठाया। मर्दों ने, डर और ग़ुस्से से सफेद चेहरों के साथ, दक्षिण की ओर कूच करने का फैसला किया। योहानान और उसके साथी सबको लेकर चल दिए। उन्होंने यिर्मयाह और बरूक को भी साथ ले लिया, शायद इस उम्मीद में कि उनकी उपस्थिति किसी तरह का आशीर्वाद ले आएगी।
यिर्मयाह चुपचाप चलते रहे। उनकी आँखों ने उस यहूदा की भूमि को देखा, जिसे वे पीछे छोड़ रहे थे—जलती हुई झाड़ियाँ, टूटे हुए खंभे, उजाड़ खेत। उन्होंने उस भीड़ को देखा, जो अपने निर्णय पर अडिग थी, मानो परमेश्वर की चेतावनी सिर्फ एक बुरा सपना था। और उन्हें वह दृश्य दिखाई दिया, जो अभी घटना नहीं था—मिस्र की धूल, उनके चेहरे पर जमती हुई, और एक लंबी, दूर तक फैली हुई निराशा, जो अब उनकी नियति बनने जा रही थी।
वे चले गए। और मिस्पा का आंगन एक बार फिर सुनसान हो गया, सिर्फ हवा का सीटी जैसा स्वर बचा रहा, जो उनके खाली वचनों और खोई हुई आशा की कहानी सुनाता रहा।




