बात उन दिनों की है, जब यहूदा का सूरज ढल रहा था, और बाबुल का साम्राज्य आकाश की तरह फैला हुआ था। यहेजकेल नबी, नदी के किनारे बसे निर्वासन के गाँव में, लोगों के बीच बैठे थे। हवा में धूल और उदासी का स्वाद था। लोगों की आँखों में एक सवाल था – क्या अब भी कोई आशा बची है?
तभी यहेजकेल ने अपनी आवाज़ उठाई, धीमी, पर गूँजती हुई। “सुनो,” उन्होंने कहा, “मैं एक कहानी सुनाता हूँ। एक बड़े बाज़ की कहानी, जिसके पंख लम्बे और रंग-बिरंगे थे, जो लबानोन के ऊँचे देवदार के पेड़ के पास आया।”
लोग चुप हो गए। कहानी शुरू हुई।
“उस बाज़ ने देवदार की सबसे ऊँची टहनी से, कोमल एक डाली तोड़ी। उसे वह एक व्यापारिक नगर में ले गया, एक ऐसी जगह जहाँ व्यापारी बहुत होते हैं, और उस डाली को दूसरी जगह लगा दिया। उसे उपजाऊ मिट्टी में रोप दिया, पानी दिया, ताकि वह एक छोटी सी बेल बन जाए। वह बेल फूटी, फैली, और पृथ्वी की ओर अपनी जड़ें फैलाती रही। पर उसकी शाखाएँ उसी बड़े बाज़ की ओर झुकती रहीं, जिसने उसे लगाया था। वह एक ऐसी फैलने वाली, नीची बेल बन गई, जिसकी शाखाएँ उसके पास रहने को तरसती थीं।”
लोग समझने लगे। वह बड़ा बाज़ बाबुल का राजा नबूकदनेस्सर था। लबानोन का देवदार यरूशलेम का राजवंश था। उसकी कोमल डाली – यहोयाकीन राजा, जिसे बाबुल ने बंदी बना लिया था। और व्यापारिक नगर? वह बाबुल ही था। नई लगाई गई बेल? सिदकिय्याह, वह राजा जिसे बाबुल ने यरूशलेम के सिंहासन पर बैठाया था। वह बाबुल की ओर झुकने वाली बेल बन गया, उसकी शपथ और वाचा का पालन करने को बाध्य।
यहेजकेल की आवाज़ में एक नया मोड़ आया। “फिर दूसरा बाज़ आया। विशाल पंखों और घने परों वाला। और देखो, उस बेल ने अपनी जड़ें उस दूसरे बाज़ की ओर फेर लीं। उसने अपनी शाखाएँ उसकी ओर बढ़ाईं, ताकि वह उसे पानी दे सके। क्या यह बेल फलती-फूलती? क्या वह महान बनती? नहीं। जिस बाज़ ने उसे लगाया था, क्या वह उसकी जड़ें न उखाड़ देगा? उसके फल न तोड़ देगा? वह बेल सूख जाएगी, हवा के एक झोंके से उखड़ जाएगी।”
दूसरा बाज़ मिस्र था। सिदकिय्याह ने बाबुल से किए अपने प्रतिज्ञा-बन्धन को तोड़ दिया, और मिस्र की ओर मदद के लिए हाथ फैलाया। यह विश्वासघात था। एक ऐसा पाप जो केवल मनुष्यों के बीच नहीं, बल्कि स्वर्ग के सिंहासन के सामने किया गया था।
यहेजकेल ने अब सीधे बात की। उनकी आँखें आग की तरह जल रही थीं। “प्रभु यहोवा की यह वाणी सुनो! क्या वह सफल होगा? क्या वह बच पाएगा, जो ऐसी प्रतिज्ञा तोड़ता है? मैं यहोवा कहता हूँ, मेरे जीवन की शपथ, वह उसी राजा के देश में मर जाएगा, जिसने उसे राजा बनाया था, जिसकी शपथ उसने तोड़ी, जिसकी वाचा को उसने तुच्छ जाना। बाबुल का राजा उसके साथ युद्ध करेगा, उसे पकड़ लेगा। और मिस्र का फ़िरौन, वह विशाल पंखों वाला बाज़, उसकी कोई सहायता नहीं करेगा। वह उसे बचाने के लिए न तो सेना भेजेगा, न ही युद्ध में उसकी सहायता करेगा।”
हवा सन्नाटे में डूब गई। कहानी का अर्थ अब स्पष्ट था – यहूदा का राजा, सिदकिय्याह, अपने विश्वासघात के कारण विनाश को आमंत्रित कर रहा था। बाबुल की शपथ को तोड़ना, यहोवा की वाचा को ठुकराने के समान था।
पर यहेजकेल की बात यहीं खत्म नहीं हुई। उनकी आवाज़ नरम पड़ी, पर उसमें एक अटल आशा का स्वर था, जैसे दूर बादलों में छिपा कोई बिजली का चमकता सिरा।
“फिर भी,” उन्होंने कहा, “प्रभु यहोवा यह भी कहता है। मैं स्वयं एक डाली लूँगा। ऊँचे देवदार के सबसे ऊपरी कोमल अंकुर में से। मैं उसे तोड़ूँगा, और उसे एक ऊँचे, विशाल पहाड़ पर लगाऊँगा। इस्राएल के पहाड़ पर। वह यहाँ शाखा फैलाएगा, फल लाएगा, और एक शानदार देवदार बनेगा। हर प्रकार के पक्षी उसकी छाया में आ बसेरा करेंगे, हर तरह के जीव-जन्तु। और सारे वृक्ष, जंगल के सारे पेड़ जान लेंगे कि मैं यहोवा हूँ। मैं ऊँचे पेड़ को नीचा कर देता हूँ, और नीचे पेड़ को ऊँचा कर देता हूँ। हरे पेड़ को सुखा देता हूँ, और सूखे पेड़ को हरा भरा कर देता हूँ। मैं यहोवा ने कहा, और करूँगा।”
यह एक वादा था। मनुष्यों के राज्य और उनकी शपथों के टूटने के बाद, परमेश्वर स्वयं हस्तक्षेप करेगा। वह डाली दाऊद के वंश का वह अंतिम अंकुर होगा, मसीहा। वह उसे एक ऊँचे पहाड़ – सिय्योन पर लगाएगा। उसकी छाया में सब जातियाँ शरण पाएँगी। यह मानवीय विफलता के धुंधले क्षितिज पर परमेश्वर की विजय की भोर का उजाला था।
यहेजकेल चुप हो गए। सूरज ढल रहा था, और नदी के पानी पर सुनहरी लकीरें पड़ रही थीं। लोगों के मन में उथल-पुथल थी। डर भी था, क्योंकि उनका राजा विफल होने वाला था। पर एक गहरी, अकथ्य समझ भी थी। यहोवा की नजरें मनुष्यों के छल-कपट से ऊपर थीं। उसकी योजनाएँ मनुष्यों की अवज्ञा से विचलित नहीं होतीं। वह टूटी हुई वाचाओं से भी अपनी वाचा को पूरा करने का मार्ग निकाल लेता है।
एक बूढ़े व्यक्ति ने, जिसकी आँखों में निर्वासन के सालों की थकान थी, धीरे से कहा, “तो… अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ।”
यहेजकेल ने मुस्कुराते हुए, बहुत हल्के से सिर हिलाया। बाज़ों का खेल चलता रहेगा, राज्य उठेंगे और गिरेंगे, राजा शपथें तोड़ेंगे। पर परमेश्वर की डाली – वह कोमल अंकुर – एक दिन ज़रूर लगेगा। और तब, सब कुछ बदल जाएगा।
रात के अँधेरे में, वह आशा एक दीपक की तरह टिमटिमाने लगी। कठोर, पर न्यायी परमेश्वर। दूर, पर न टलने वाला वादा। यही सच था। और इसी सच पर, एक और दिन जीने की ताकत मिलती थी।




