सुबह की हल्की धूप में, यारदन नदी के पास के खेतों में हवा ठंडी थी, पर हवा में एक अजीब सी गर्माहट भी थी, जैसे आने वाले दिनों की चेतावनी। एक खेतिवाल, एलियाकीम, अपनी जर्जर कुटिया के साहिल पर बैठा, अपनी खाली मुट्ठियों को देख रहा था। उसकी जमीन, जो कभी हरी-भरी हुआ करती थी, अब दरारों से भरी एक बंजर चादर लगती थी। बारिश ने तीन मौसमों से अपना मुंह फेर लिया था। यह कोई साधारण सूखा नहीं था; यह वह सूखा था जो हड्डियों तक को सुखा देता है, जो नदियों की राह तक भूल जाता है।
और फिर भी, शोमरोन के महलों से, दस मील दूर से भी, त्योहारों के गाने और भोज की सुगंध आती रहती थी। एलियाकीम ने सुना था कि वहां के धनी लोग, बाशान की मोटी गायों के मांस के साथ, अपने विशाल हॉलों में दावतें करते थे। उनके मंदिरों में, बेतेल और गिलगल में, याजक वैसी ही भेंट चढ़ाते रहते थे, वैसे ही गीत गाते रहते थे, मानो कुछ हुआ ही न हो। परमेश्वर का नाम लेते थे, पर उसकी व्यवस्था को, दीन-दुखियों के अधिकारों को, पैरों तले रौंद डाला था।
एक दिन, बाजार में, एक आवाज सुनाई दी। कोई यात्री भविष्यद्वक्ता, आमोस नाम का, एक तिकोना सा आदमी, जिसकी आंखों में चरवाहे की गहराई और किसान का कठोर सच था। उसने कोई पांडित्यपूर्ण उपदेश नहीं दिया। उसने सीधे कहा, जैसे कोई हल चला रहा हो कठोर जमीन पर। “सुनो, तुम गिलाद के बैलों की तरह मोटे हो गए हो,” उसने चिल्लाकर कहा, उन महलों की ओर इशारा करते हुए जो पहाड़ी पर चमक रहे थे। “तुम दीनों को कुचलते हो, कंगालों को दबाते हो, और कहते हो, ‘जल्दी लाओ, हम पीएं!'”
लोग इकट्ठा हुए, कुछ उत्सुकतावश, कुछ गुस्से में। आमोस ने उनकी ओर देखा, और उसकी आवाज एक शोकगीत जैसी हो गई। “परमेश्वर कहता है – मैंने तुम्हें दांतों के बीच सफाई छोड़ दी थी। तुम्हारे सारे नगरों में, कुछ घर बचे, जैसे जलती लकड़ी में से कोई चरवाहा एक जलती हुई लकड़ी बचा ले। क्या तुमने उसकी ओर ध्यान दिया? नहीं। तुमने मेरी ओर फिरना नहीं चाहा।”
एलियाकीम की सांस रुक गई। उसे याद आया पिछले वर्ष का वह टिड्डी दल, जो आकाश को काला करता हुआ आया था, और उसकी फसल का नामोनिशान मिटा गया था। बस कुछ ही झाड़ियां बची थीं, ‘दांतों के बीच सफाई’ की तरह। पर उस समय भी, महान याजकों ने कहा था कि यह प्रकृति का कोप है, पाप का फल नहीं।
फिर आमोस ने उन आपदाओं का हिसाब सुनाना शुरू किया, एक के बाद एक, जैसे कोई कड़वी गिनती गिन रहा हो। “मैंने तुम पर अन्न की कमी की। तुम्हारे नगरों में रोटी का टुकड़ा तरस गया। फिर भी तुम नहीं लौटे।” एलियाकीम को पिछली गर्मियों की वह भयानक भूख याद आई, जब उसने अपने छोटे बेटे की रोटी का आखिरी टुकड़ा भी बेच डाला था।
“मैंने वर्षा रोक दी,” आमोस की आवाज बरसात की फुहार की तरह बरस रही थी, “एक नगर में वर्षा होती, दूसरे में नहीं। एक खेत में पानी पड़ता, दूसरा सूखा मर जाता। दो-तीन नगर प्यासे मरते हुए एक ही नगर की ओर लड़खड़ाते फिरते, पर पानी नहीं मिलता। फिर भी तुम नहीं लौटे।”
कितना सच था। एलियाकीम के गांव के कुएं सूख चुके थे, जबकि बताया जाता था कि शोमरोन के राजमहल के बागों में झरने बहते थे, दूर दमिश्क से मंगवाए गए पानी से।
भविष्यद्वक्ता ने अपनी आवाज और तेज की। “मैंने तुम्हें झुलसा देने वाली गर्मी और धूप दी। तुम्हारे बाग सूख गए, अंगूर की बारियां झुलस गईं। टिड्डी ने तुम्हारी अंजीर और जैतून के पेड़ चाट लिए। फिर भी तुम नहीं लौटे।”
एलियाकीम की आंखें भर आईं। उसकी जैतून की छोटी सी पेड़ी, जिसे उसके पिता ने लगाया था, सूखकर काली पड़ गई थी, टिड्डियों के झुंड ने उसे ऐसे नंगा कर दिया था जैसे कोई हड्डी को मांस से अलग कर दे।
“मैंने तुम्हारे बीच महामारी भेजी, मिस्र की तरह।” आमोस की आवाज अब एक कर्कश फुसफुसाहट में बदल गई थी। “तुम्हारे जवान युद्ध में तलवार के मुंह में गिरे। तुम्हारे घोड़ों के बांध लिए गए। तुम्हारी छावनियों में मृतकों की बदबू आने लगी। फिर भी… फिर भी तुम नहीं लौटे।”
यह सब कुछ इतना स्पष्ट था, इतना निर्मम। परमेश्वर ने चेतावनी दी थी, एक नहीं, अनेक बार। हर आपदा एक संदेश था, एक हाथ था जो उन्हें झकझोरकर जगाना चाहता था। पर उन्होंने हर बार उसी तरह प्रतिक्रिया दी – और भी ज्यादा भोग-विलास में डूबकर, और भी ज्यादा अन्याय करके, और भी ज्यादा खोखली पूजा में लिप्त होकर।
आमोस ने अंतिम वाक्य कहा, और वह इतना भयानक था कि सारा बाजार सन्नाटे में डूब गया। “इसलिए, हे इस्राएल, अब जो कुछ मैं तेरे साथ करूंगा, उसके लिए तैयार हो जा। अपने परमेश्वर से भेंट करने को तैयार हो जा।”
‘भेंट करने को तैयार हो जा’। यह उस पुराने नियम की भाषा में सबसे डरावना निमंत्रण था। यह बलिदान की भेंट नहीं थी। यह वह भेंट थी जो स्वयं अपराधी को बनना थी – परमेश्वर के न्याय के सामने पेश होने के लिए।
एलियाकीम ने अपना चेहना हाथों में छिपा लिया। उसे अब समझ आया। ये सब आपदाएं, ये सब दुख, कोई यादृच्छिक घटनाएं नहीं थीं। वे एक सजग, दुखी परमेश्वर की पुकार थीं, जो अपने ही बच्चों को विनाश के कगार से वापस बुला रहा था। पर उनके कान बहरे हो चुके थे। उनकी आत्माएं मोटी हो चुकी थीं। उन्होंने अनुग्रह को ठुकरा दिया था, इसलिए अब केवल भेंट ही बची थी – न्याय की भेंट।
शाम ढलने लगी। बाजार खाली हो गया। आमोस चला गया। पर उसकी बातें, उसकी गिनती, हवा में लटकी रह गईं, हर सूखी दरार में, हर खाली अन्न के भंडार में गूंजती रहीं। एलियाकीम अपनी कुटिया की ओर लौटा। आकाश लाल हो रहा था, जैसे कोई विशाल बलिदान की वेदी सुलग रही हो। और वह जानता था कि भविष्यद्वक्ता की बात सच होगी। जब अनुग्रह की पुकार न सुनी जाए, तो केवल न्याय का दिन ही बचता है। उसने आंखें बंद कीं, और पहली बार बहुत लंबे समय के बाद, एक सच्ची, टूटी हुई प्रार्थना फूट पड़ी। शायद अभी भी देर नहीं हुई थी। शायद।




