पवित्र बाइबल

शनिवार और पर्वत का उपदेश

एक सुबह, ठंडी हवा में धुंध लिपटी हुई थी, गलील की झील का पानी शांत और चमकदार। येशू किनारे पर टहल रहे थे, उनकी नज़र दूर मछुआरों की नावों पर टिकी हुई, जो रात भर के परिश्रम के बाद अपने जाल सँवार रहे थे। तभी पतरस और अन्द्रियास ने आवाज़ लगाई – “रब्बी, आज शनिवार है। कफरनहूम जाना है?” येशू ने हल्के से सिर हिलाया, और वे छोटे से दल के साथ चल पड़े।

रास्ता खेतों से गुज़रता था। जून का महीना था, और गेहूँ के खेत सुनहरे सूरज की रोशनी में नहा रहे थे। चलते-चलते कुछ शिष्य भूख से बेचैन हो उठे। उन्होंने खेत के किनारे उगे हुए जौ के पौधों से कुछ बालें तोड़कर, हथेलियों में रगड़कर दाने निकाले और चबाने लगे। अचानक कुछ फरीसी वहाँ आ निकले, जैसे वे पहले से ही उस रास्ते पर छिपे बैठे हों। उनमें से एक, जिसकी दाढ़ी बहुत सघन थी और चेहरे पर एक अजीब सी कठोरता, उसने आवाज़ उठाई – “देखो! ये लोग शनिवार के दिन क्या कर रहे हैं? यह तो कटाई का काम है, और यह वर्जित है।”

हवा में एक तनाव छा गया। शिष्य अवाक् रह गए, उनके हाथों के दाने अधूरे चबाए रह गए। येशू धीरे से मुड़े, उनकी आँखों में न कोप था, न ही व्यग्रता, बल्कि एक गहरा दुख था, जैसे कोई बच्चा किसी बुनियादी बात को न समझ पाने पर दुखी होता है। उन्होंने कहा, “क्या तुमने दाऊद और उसके साथियों का वह प्रसंग नहीं पढ़ा, जब उन्हें भूख लगी थी? उसने परमेश्वर के घर में प्रवेश किया, और वह केवल याजकों के लिए अनुमत प्रसाद की रोटियाँ ले गया, और अपने साथियों के साथ खाई।” येशू ने एक क्षण रुककर उन फरीसियों के चेहरों पर नज़र दौड़ाई, जहाँ अभी भी अविश्वास और आत्म-धार्मिकता की रेखाएँ उभरी थीं। फिर उनकी आवाज़ में एक दृढ़ता आई, “मनुष्य का पुत्र शनिवार का भी स्वामी है।”

वह घटना तो बीत गई, पर उस दिन के बाद येशू के मन में एक बेचैनी सी रही। अगले कुछ दिनों तक वह अक्सर एकान्त में प्रार्थना करते रहे। एक रात तो वे पहाड़ पर ही रुक गए, और पूरी रात परमेश्वर से बातें करते रहे। जब सुबह हुई, तो उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया, और उनमें से बारह को चुनकर ‘प्रेरित’ का नाम दिया – पतरस, अन्द्रियास, याकूब, यूहन्ना, फिलिप्पुस, बरथुलमै, मत्ती, थोमा, हल्के याकूब, शमौन, याकूब का पुत्र यहूदा, और यहूदा इस्करियोती।

फिर वे नीचे एक समतल मैदान में आए, जहाँ उनके नए प्रेरित और बड़ी भीड़ – यहूदिया, यरूशलेम, और सोर और सीदून के तटीय क्षेत्रों से आए लोग – इकट्ठा थे। लोगों में चर्चा थी – कोई रोग से मुक्ति चाहता था, कोई उपदेश सुनने आया था, कोई सिर्फ इस अद्भुत व्यक्ति को नज़दीक से देखना चाहता था।

येशू एक ऊँचे स्थान पर खड़े हो गए। उनकी आँखें भीड़ को सहजता से छू रही थीं – एक युवा मछुआरे की आँखों में उत्सुकता, एक बूढ़ी औरत के चेहरे पर पीड़ा की रेखाएँ, एक धनवान व्यापारी के भव्य वस्त्रों के पीछे छिपी खालीपट की झलक। हवा शांत थी, केवल दूर पहाड़ियों से पक्षियों के चहकने की आवाज़ आ रही थी।

उन्होंने बोलना शुरू किया, और उनकी आवाज़ में एक ऐसी शक्ति थी जो सीधे हृदय में उतर जाती थी। “धन्य हैं वे, जो आत्मा में दरिद्र हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। धन्य हैं वे, जो अब शोक करते हैं, क्योंकि वे शान्ति पाएँगे।”

भीड़ में एक सन्नाटा छा गया। ये शब्द उनके लिए अजीब थे। दरिद्रता और शोक को धन्य कैसे कहा जा सकता है? पर येशू बोलते रहे – “धन्य हैं वे, जो कोमल हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे। धन्य हैं वे, जो धर्म के भूखे-प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किए जाएँगे।”

एक युवक, जिसका नाम एलियासर था और जो पिछले शनिवार खेतों में मौजूद था, सामने बैठा ये शब्द सोच-सोचकर पचा रहा था। उसके मन में फरीसियों के कठोर नियमों और इन शब्दों के बीच एक खाई नज़र आ रही थी।

येशू की आवाज़ में एक नया स्वर उभरा – “परन्तु मैं तुम से कहता हूँ, जो सुनते हैं: अपने शत्रुओं से प्रेम रखो। जो तुम से बैर रखते हैं, उनका भला करो। जो तुम्हारा अपमान करते हैं, उनके लिए आशीष की प्रार्थना करो।”

भीड़ में कुछ लोग असमंजस में थे। एक दाढ़ीवाला व्यक्ति फुसफुसाया, “यह तो मूसा की व्यवस्था के विपरीत है – आँख के बदले आँख…” पर येशू स्पष्ट थे – “जो कोई तुम्हें एक गाल पर मारे, दूसरा भी उसके आगे कर दो। जो कोई तुम्हारा कुरता ले ले, उसे चोगा भी दे दो।”

फिर वे दिए और लिए की बात पर आए। उनकी आवाज़ में एक गहरा संगीत भरा था, “दो, और तुम्हें दिया जाएगा। लोग तुम्हारी गोद में, अच्छा माप दबाकर, और झटककर, और भर-भरकर डालेंगे। क्योंकि जिस माप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा।”

एलियासर ने अपनी मुट्ठी खोल दी। उसे याद आया कि कैसे उसने पिछले हफ्ते एक गरीब भिखारी को देखकर भी अपनी थैली बंद कर ली थी। उसका मन एक अजीब-सी ग्लानि से भर गया।

येशू अब चेतावनी दे रहे थे – “मेरे पास आकर केवल ‘प्रभु, प्रभु’ कहने वाले ही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं पाएँगे, बल्कि वही जो स्वर्ग में मेरे पिता की इच्छा पर चलते हैं।” उन्होंने एक दृष्टान्त सुनाया – एक बुद्धिमान मनुष्य ने चट्टान पर अपना घर बनाया, और बाढ़ आई, पर घर टिका रहा। और एक मूर्ख ने बिना नींव की रेत पर घर बनाया, और वह जड़ से गिर गया।

जब येशू ने बोलना समाप्त किया, तो सब लोग मौन थे। कोई तालियाँ नहीं, कोई जय-जयकार नहीं। एक गहरी, कंपकंपी देने वाली शांति थी, जैसे उनके शब्द अभी भी हवा में तैर रहे हों। लोग धीरे-धीरे उठने लगे, कुछ चेहरे आशान्वित थे, कुछ पर सोच की गहरी रेखाएँ थीं।

एलियासर उठा और अपने रास्ते चल पड़ा। रास्ते में उसने एक अंधे भिखारी को देखा, जो अपना बर्तन आगे किए बैठा था। एलियासर ने रुककर, अपनी थैली में हाथ डाला, और न सिर्फ एक, बल्कि दो सिक्के उसके बर्तन में डाल दिए। भिखारी के चेहरे पर आश्चर्य और कृतज्ञता की एक झलक देखकर, उसे वे शब्द याद आ गए – “दो, और तुम्हें दिया जाएगा।” उसे समझ में आया, यह दिया जाना सिक्कों का नहीं, बल्कि उस शांति का था जो अभी उसके भीतर धीरे-धीरे फैल रही थी।

शाम ढल रही थी, और सुनहरी रोशनी पहाड़ियों पर बिछी हुई थी। येशू अब भी नीचे मैदान में थे, कुछ लोगों से बात कर रहे थे। एलियासर ने पीछे मुड़कर देखा, और उसे लगा जैसे उसने आज केवल उपदेश नहीं सुना, बल्कि एक नई दुनिया के निर्माण की नींव देखी है – एक ऐसी दुनिया जहाँ देना, सहना और प्रेम करना ही सबसे बड़ा बल है। और यह नींव, उसने महसूस किया, उस चट्टान पर टिकी थी, जिसे कोई बाढ़ नहीं हिला सकती थी।

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