सीज़रिया के बंदरगाह पर हवा में नमक और दूर आते-जाते जहाज़ों की गंध थी। फेस्तुस नया राज्यपाल बनकर अभी तीन दिन पहले ही आया था, और उसके कानों में यहूदियों के फुसफुसाए गए शिकायतों के शब्द पहले से ही गूंज रहे थे। “वह व्यक्ति… वह पौलुस… उसने हमारे धर्म के विरुद्ध, मन्दिर के विरुद्ध, और स्वयं कैसर के विरुद्ध भी बातें की हैं।” ये आरोप उसके सामने सीधे-सीधे रखे गए, जब यरूशलेम के मुख्य याजक और कुछ प्रमुख यहूदी उससे मिलने आए थे।
फेस्तुस को पता था कि राजनीति और धर्म यहाँ एक दूसरे में इतने उलझे हुए हैं कि एक तिनका भी आग का कारण बन सकता है। उसने दयालुता दिखाते हुए कहा, “वह व्यक्ति तो सीज़रिया में ही है। मैं स्वयं शीघ्र ही वहाँ जा रहा हूँ। तुम भी चले आना, और जो कुछ भी उसके विरुद्ध कहना हो, वहाँ कहना।”
कुछ ही दिनों में, फेस्तुस ने न्याय की कुर्सी पर बैठकर पौलुस को बुलवाया। जब पौलुस आया, तो उसके चारों ओर यहूदी खड़े थे, जिन्होंने दूर से ही यात्रा करके आरोप लगाने के लिए स्वयं को थका दिया था। उनके चेहरे कठोर थे, आँखों में आग थी। पर पौलुस शांत था। उसके चेहरे पर वही दृढ़ता थी, जो उसने कई कोड़े खाने और कई बंदीगृहों में रहने के बाद अर्जित की थी।
आरोप लगे – बड़े-बड़े, भयानक आरोप। पर दिलचस्प बात यह थी कि वे कोई ठोस सबूत नहीं ला पाए। सब कुछ शब्दों का जाल था, अफवाहों का पुलिंदा। पौलुस ने अपना बचाव करते हुए स्पष्ट किया, “मैंने न तो यहूदी धर्म के विरुद्ध, न मन्दिर के विरुद्ध, और न ही कैसर के विरुद्ध कोई अपराध किया है।”
फेस्तुस एक धर्मसंकट में था। यहूदियों को खुश करना चाहता था, पर न्याय का ढोंग भी तो रखना था। उसने पौलुस से पूछा, “क्या तू यरूशलेम जाना चाहता है, कि वहाँ इन बातों का न्याय मेरे सामने किया जाए?” यह एक चालाक सवाल था। शायद वह पौलुस को यहूदियों के हाथों में सौंपने का रास्ता ढूँढ रहा था।
पर पौलुस ने, जो रोमी नागरिक था और जिसे कानून की समझ थी, तुरंत उत्तर दिया। उसकी आवाज़ में कोई कम्पन नहीं था, बस एक साफ़, ठोस निश्चय था। “मैं कैसर के न्याय सिंहासन के सामने खड़ा हूँ, और यहीं मेरा न्याय होना चाहिए। यहूदियों के साथ मैंने कोई अन्याय नहीं किया, जैसा कि तू भी अच्छी तरह जानता है। यदि मैंने कोई अन्याय किया हो, या मृत्यु के योग्य कोई काम किया हो, तो मैं मरने से नहीं डरता। पर यदि इनके आरोपों में कोई सत्य नहीं है, तो कोई भी मुझे इनके हाथों में सौंपकर मेरे साथ दया नहीं कर सकता। मैं कैसर की अपील करता हूँ!”
यह शब्द – ‘कैसर की अपील’ – हवा में लटक गए। फेस्तुस चुप रहा। वह जानता था कि यह एक ऐसा दावा है जिसे ठुकराया नहीं जा सकता। एक रोमी नागरिक का अधिकार। उसने मंत्रियों से थोड़ी देर विमर्श किया, फिर घूमकर पौलुस की ओर देखा। “तूने कैसर की अपील की है? तो कैसर के पास ही जाएगा।”
कुछ दिन बाद, राजा अग्रिप्पा और बेरनीके सीज़रिया में फेस्तुस से मिलने आए, जो उनका अभिनंदन कर रहा था। बातचीत के दौरान फेस्तुस ने पौलुस के मामले का ज़िक्र उठाया। “एक बंदी है, जिसे फेलिक्स ने छोड़ दिया। यरूशलेम के यहूदी उसके विषय में चिल्ला रहे हैं, कह रहे हैं कि वह मरने के योग्य है। पर मुझे तो लगता है कि उसने कोई बड़ा अपराध नहीं किया। उसने स्वयं कैसर से न्याय की याचना की है, इसलिए मैंने उसे भेज देने का निश्चय किया है… पर सम्राट के पास भेजते हुए, मुझे लिखना होगा कि उस पर क्या आरोप हैं। इस मामले में तुम्हारी सलाह काम आ सकती है।”
अगले दिन, जब राजा अग्रिप्पा और बेरनीके बड़े ठाठ-बाट के साथ सभा में आए, तो पौलुस को भी लाया गया। फेस्तुस ने स्थिति समझाई, “सभी यहूदी एक स्वर से कहते हैं कि यह जीवित रहने योग्य नहीं। पर मैंने उसमें मृत्यु के योग्य कोई अपराध नहीं पाया। चूँकि इसने सम्राट से न्याय की याचना की है, मैंने इसे भेज देने का निश्चय किया है। मुझे कुछ लिखकर देने को नहीं सूझता। इसलिए मैंने इसे तुम्हारे सामने लाने की आज्ञा दी, विशेषकर तुम्हारे सामने, हे राजा अग्रिप्पा, कि जाँच के बाद मुझे लिखने को कुछ मिल सके।”
पौलुस ने हाथ उठाकर अपना बचाव शुरू किया। उसने अपनी ज़िंदगी की कहानी सुनाई – कैसे वह एक कट्टर फरीसी रहा था, कैसे उसने मसीह के विश्वासियों को सताया था, और कैसे दमिश्क की सड़क पर एक चमक और एक आवाज़ ने उसकी ज़िंदगी बदल दी थी। वह बोला, “मैं स्वर्गीय दर्शन की बात नहीं कर रहा, राजा अग्रिप्पा, बस उन बातों को कह रहा हूँ जो भविष्यद्वक्ताओं और मूसा ने कही थीं – कि मसीह दुख उठाएगा, और मरे हुओं में से जी उठने का पहला होकर, प्रकाश का संदेश देगा।”
फेस्तुस ने अपनी आवाज़ में अविश्वास भरकर चिल्लाते हुए कहा, “पौलुस, तू पागल हो गया है! बहुत पढ़ाई ने तेरे दिमाग को खराब कर दिया है।”
पौलुस ने शांति से उत्तर दिया, “मैं पागल नहीं हूँ, श्रीमान फेस्तुस। मैं सत्य और समझदारी की बातें कह रहा हूँ। राजा इन बातों को जानता है, और मैं उससे निर्भय होकर बोल रहा हूँ। क्या आप भविष्यद्वक्ताओं पर विश्वास करते हैं, हे राजा? मैं जानता हूँ कि आप करते हैं।”
अग्रिप्पा ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, “तू मुझे थोड़े ही समय में मनुष्यों को मसीही बनाने के लिए राजी करने लगा है।”
पौलुस ने कहा, “चाहे थोड़े समय में, चाहे बहुत समय में, मेरी प्रार्थना परमेश्वर से यही है कि न केवल आप, बल्कि आज यहाँ उपस्थित सभी लोग, मेरे जैसे बन जाएँ – केवल इन बेड़ियों को छोड़कर।”
सभा उठ गई। बाहर निकलकर राजा अग्रिप्पा, बेरनीके और फेस्तुस आपस में बात करने लगे। “यह व्यक्ति,” अग्रिप्पा ने कहा, “कोई ऐसा काम नहीं किया है जिससे मृत्यु या बंदी होने के योग्य हो। यदि इसने कैसर से न्याय न माँगा होता, तो इसे छोड़ा जा सकता था।”
पर अब निर्णय हो चुका था। पौलुस रोम जाएगा। समुद्र की हवा अब भी नमक की गंध लिए हुए थी, पर अब उसमें एक नई यात्रा की आहट थी – अनिश्चित, दूर, पर उस आवाज़ के वश में जिसने उसे दमिश्क की सड़क पर पुकारा था। और पौलुस जानता था कि यह समुद्र पार करने का समय है।




