उस साल जेठ की धूप बड़ी निर्मम थी। आकाश फीका, तपता हुआ एक तामचीनी का बरतन सा लगता। खेतों में धरती की चादरें सिकुड़कर उँगलियाँ फैलाए पड़ी थीं, जैसे प्यास के मारे अंतिम प्रार्थना कर रही हों। किसान अमर सिंह अपनी देहलीज पर बैठा, ढलती शाम को ताक रहा था। उसकी आँखों के सामने वह सारा सावन बिखरा पड़ा था, जो कभी उसकी उम्मीदों में हरा भरा लहराता था। ओले पड़ गए थे। सारी मेहनत, सारी बचत, धरती के उस कोलाहल भरे कोलाहल में समा गई थी।
भीतर घर में चूल्हे की आग ठंडी पड़ चुकी थी। पत्नी गीता मौन थी, बच्चे असहज नींद में करवटें बदल रहे थे। अमर के मन में एक धुन्क सी चल रही थी – “अब क्या? अब आगे?” कर्ज का बोझ, बच्चों की पढ़ाई की चिंता, बुढ़ापे में माँ-बाप की जिम्मेदारी… ये सब विचार उसके सिर में एक भयानक मधुमक्खी के छत्ते की तरह गूंज रहे थे। नींद नाम की चीज तो जैसे गायब ही हो गई थी।
एक रात, जब चाँदनी भी धूल भरी और उदास लग रही थी, अमर बाहर आया। वह उस पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गया, जहाँ उसके पिता भी बैठा करते थे। न जाने क्यों, उसके हाथ अपने आप प्रार्थना में जुड़ गए। शब्द नहीं थे, सिर्फ एक सिसकी थी, एक भारी साँस थी। तभी, उसकी याददाश्त के किसी कोने से एक पुरानी बात कौंधी। उसे याद आया कि कैसे उसकी दादी, जिनके हाथ झुर्रियों से भरे पर आशा से लबरेज रहते थे, अक्सर कहा करती थीं – “परमेश्वर की शांति, जो समझ से परे है, तुम्हारे मन और तुम्हारे विचारों की रक्षा करेगी।”
यह बात उस रात उसके लिए कोई जादू की छड़ी नहीं थी। उसकी फसल लौटकर नहीं आई, कर्ज गायब नहीं हुआ। पर उस रात से, अमर ने एक छोटी सी रीत शुरू की। हर सुबह, चाहे आँखों में नींद हो या न हो, वह उसी पीपल के पेड़ के नीचे कुछ पल बैठता। वह सारी चिंताओं को, सारे डर को, बस एक साधारण सी बात कहकर परमेश्वर के सामने रख देता – “मैं यह सब तुझे सौंपता हूँ।” फिर वह दिन भर के काम में लग जाता।
कुछ दिन बाद, गाँव के स्कूल में एक नया अध्यापक आया। उसने अमर के बड़े बेटे की पढ़ाई में दिलचस्पी ली। फिर अमर की बहन, जो शहर में रहती थी, अचानक मिलने आई और कुछ पुराने कर्ज चुकाने में मदद कर गई। कोई बड़ा चमत्कार नहीं हुआ, पर जीवन की गाड़ी के पहिए धीरे-धीरे घूमने लगे, जैसे किसी ने उनमें तेल डाल दिया हो।
एक दिन, अमर शहर गया था कुछ जरूरी सामान लेने। लौटते समय एक पुराने मित्र से मुलाकात हो गई, जिसने उसे एक छोटे से ठेके का काम दिलवा दिया। यह काम उसकी आय का मुख्य स्रोत तो नहीं था, पर घर का खर्चा चलाने लायक जरूर था। अमर ने देखा कि जब उसने अपनी मुट्ठी खोलकर चिंता को जाने दिया, तो परमेश्वर की व्यवस्था ने काम करना शुरू कर दिया – टुकड़े-टुकड़े में, धीरे-धीरे, अप्रत्याशित रास्तों से।
सबसे बड़ा बदलाव उसके भीतर हुआ। पहले वह हर चीज को अपनी ताकत से सम्हालने की कोशिश करता। अब उसने सीख लिया था कि सच्ची शक्ति उस आंतरिक शांति में है, जो हर परिस्थिति में संतुष्ट रहना सिखाती है। वह अब भी मेहनत करता, कल की योजना बनाता, पर उसकी नींद वापस लौट आई थी। उसकी आँखों के सामने फिर से सपने हरे-भरे होने लगे, चाहे खेत अभी भी सूखे पड़े थे।
एक संध्या, जब आसमान में बादल छाए हुए थे और हवा में नमी की सुगंध थी, अमर ने अपने परिवार को इकट्ठा किया। उसने कोई लम्बा उपदेश नहीं दिया। बस इतना कहा – “जीवन में कंगाली भी आएगी, भरपूरी भी। पर हमारा आनंद इन चीजों में बंधा नहीं है। हमारी शक्ति वहीं से आती है, जो हमें हर हाल में सामर्थ्य देता है।” उसकी आवाज़ में वही विश्वास था, जो उसकी दादी की आवाज़ में हुआ करता था।
बारिश की पहली बूँदें गिरने लगीं, धरती से मिट्टी की सोंधी खुशबू उठने लगी। अमर सिंह ने अपनी देहलीज पर खड़े होकर उन बूँदों को अपने चेहरे पर गिरने दिया। उसके मन में कोई तूफान नहीं था, कोई उधेड़बुन नहीं। बस एक गहरी, अवर्णनीय शांति थी – वह शांति जो सब कुछ समझ लेती है, और फिर भी आशा से भरी रहती है। आने वाला कल अब भी अनिश्चित था, पर उसका दिल निश्चित था। और यही निश्चितता, उसके लिए, सबसे बड़ी फसल थी।




