वह सुबह धुंधली थी, जैसे उसके मन का आईना। एलियाब की आँखों में नींद नहीं, एक गहरी थकान थी, वह थकान जो हड्डियों तक में बस जाती है। उसकी झोंपड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए, जैतून के पेड़ों के झुरमुट में सूरज की किरणें फिसलने की कोशिश कर रही थीं। उसके हाथ में एक पुराना, घिसा-पिटा चमड़े का खत था – हिब्रू भाइयों के नाम पत्र का एक अंश, जो एफेसस से आया था। शब्द उसकी आत्मा में गूंज रहे थे: “आओ, हम बालकपन की शिक्षाओं को छोड़कर परिपक्वता की ओर बढ़ते चलें।”
परिपक्वता। यह शब्द उसे चुभता था। कितने साल हो गए थे उसे प्रभु का अनुसरण किए? पाँच? सात? वह निश्चित नहीं था। शुरुआती दिनों का वह उत्साह, जो नए सोते के पानी की तरह ताज़ा और ठंडा लगता था, अब कहीं धुँधला पड़ गया था। पहले वह प्रार्थना में घंटों बिता देता, भजन गुनगुनाता, भाइयों के साथ रोटी तोड़ता। अब प्रार्थना के शब्द ज़बान पर अटकते थे, जैसे बिना तेल की चक्की का पाट। विश्वास की वह पहली फसल, जो इतनी हरी-भरी लगती थी, अब सूखी ज़मीन पर झुलसी हुई लग रही थी। क्या वह फिर से नवजात शिशु की तरह दूध पीने लगेगा? वह समझ नहीं पा रहा था।
उसने खत को रख दिया और झोंपड़ी से बाहर निकला। हवा में ठंडक थी, और दूर पहाड़ियों पर बादल छाए हुए थे। उसका रास्ता उस छोटी पहाड़ी की तरफ था, जहाँ वह अक्सर बैठा करता था। रास्ते में एक खेत पड़ता था, जिसकी मेड़ पर किसान का खून-पसीना लगा हुआ था। आज, खेत की दशा देखकर उसका दिल दहल गया। एक तरफ़ तो भूमि अच्छी तरह जोती हुई थी, उसमें से नन्हे-नन्हे अंकुर फूट रहे थे, और दूसरी तरफ़ काँटों और झाड़ियों ने एक हिस्से को जकड़ लिया था। लेकिन तीसरा हिस्सा सबसे दुखद था – पथरीली ज़मीन, जहाँ कुछ पौधे उग तो आए थे, पर जल्दी ही मुरझा कर सूख गए थे, क्योंकि उनकी जड़ें गहरी नहीं जा पाई थीं।
एलियाब खड़ा रह गया। उसकी साँस रुक सी गई। यह तो वही बात थी जो पत्र में लिखी थी – एक बार जो प्रकाश को चख चुके, स्वर्गीय वरदान का भागी हुए, पवित्र आत्मा का स्वाद ले चुके, और परमेश्वर के अच्छे वचन और आनेवाले युग की सामर्थ्य को अनुभव कर चुके, यदि वे पतित हो जाएँ तो उन्हें फिर से नया बनाना असंभव है… क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र को फिर से अपने लिए क्रूस पर चढ़वाते हैं और उसका तिरस्कार करते हैं। उसका मन एकाएक भय से भर गया। क्या वह भी उस पथरीली ज़मीन जैसा था? जहाँ शुरुआती वर्षा के पानी ने अंकुर तो फूट दिए, पर गर्मी आते ही सब मुरझा गए क्योंकि जड़ें गहराई तक नहीं पहुँच पाईं?
वह पहाड़ी पर चढ़कर बैठ गया। नीचे गाँव के घर धुँधले से दिख रहे थे। उसे याद आया, कैसे तीन साल पहले एक संकट के दिनों में उसने परमेश्वर से मदद की गुहार लगाई थी, और एक अजीब सी शांति ने उसके चित्त को थाम लिया था। वह स्वर्गीय वरदान था। उसे याद आया, कैसे एक बार एक भाई के उपदेश ने उसकी आँखें खोल दी थीं, और वह पवित्र आत्मा की उपस्थिति को महसूस कर पाया था – एक गर्म, स्पंदनशील आश्वासन जो शब्दों से परे था। पर अब? अब वह सब कुछ स्मृति के धुंधलके में डूबा हुआ लगता था, जैसे पुराने चित्र के रंग फीके पड़ गए हों।
तभी, दूर से एक आवाज़ आई। वह गाँव का बूढ़ा नथनएल था, जो अपनी भेड़ें चरा रहा था। नथनएल का चेहरा झुर्रियों से भरा था, पर आँखों में एक अद्भुत चमक थी। एलियाब ने उसे बुलाया। बूढ़ा धीरे-धीरे चलता हुआ उसके पास आया और पत्थर पर बैठ गया।
“तुम्हारे चेहरे पर बादल मंडरा रहे हैं, बेटा,” नथनएल ने कहा, उसकी आवाज़ में खराश थी पर स्नेह भी।
एलियाब ने अपना दिल खोल दिया – उसकी थकान, उसके विश्वास का सूखापन, उस भयानक संभावना का भय कि कहीं वह उनमें से न हो जाए जो परमेश्वर के पुत्र को फिर से क्रूस पर चढ़ाते हैं, उसका तिरस्कार करते हैं।
नथनएल कुछ देर चुप रहा, अपनी लाठी से ज़मीन पर कुछ रेखाएँ खींचता रहा। फिर उसने धीरे से कहा, “तुम उस पत्र के उस हिस्से में अटक गए हो जो चेतावनी देता है। पर क्या तुमने आगे पढ़ा? लिखा है – पर हे प्रियों, हम तुम्हारे विषय में इन बातों से भी बढ़कर, उद्धार की बातें कहते हैं, यद्यपि हम इस प्रकार बोलते हैं।”
उसने एलियाब की ओर देखा, उसकी आँखों में करुणा थी। “देखो, बेटा। परमेश्वर अन्यायी नहीं है। वह तुम्हारे काम को भूला नहीं है, और न उस प्रेम को जो तुमने उसके नाम के लिए प्रकट किया है, जब तुमने पवित्र लोगों की सेवा की थी और अब भी कर रहे हो। लेकिन वह हमें बालक नहीं बनाए रखना चाहता। वह चाहता है कि हम उस खेत की तरह बनें जो अच्छी फसल देता है – जो जोतनेवाले के परिश्रम का फल देता है। वह चेतावनी उनके लिए है जो जान-बूझकर, अहंकार से भरकर पीछे हट जाते हैं। तुम्हारा संघर्ष तो इस बात का प्रमाण है कि तुम अभी भी उस खेत में हो। सूखे का एहसास होना, यह भी तो एक कृति है। वह तुम्हें गहराई में जाने के लिए बुला रहा है।”
एलियाब की आँखों में पानी आ गया। उसे लगा जैसे कोई भारी बोझ उसके सीने से हट गया हो। बूढ़े ने फिर कहा, “वह प्रतिज्ञा याद है? परमेश्वर ने अब्राहम से प्रतिज्ञा की थी। और चूँकि उससे बड़ा कोई नहीं था जिसकी शपथ खाए, इसलिए उसने अपने आप ही शपथ खाकर कहा – मैं अवश्य तुम पर अनुग्रह करूँगा। हमारी आशा यही है – वह प्रतिज्ञा और वह शपथ। वह दो अनहोनी चीजें हैं जिनमें परमेश्वर झूठ नहीं बोल सकता। यह आशा हमारे प्राण के लिए लंगर है, जो पर्दे के भीतर जाकर डोरी डाले रहता है, जहाँ यीशु हमारे अग्रणी बनकर प्रवेश कर चुका है।”
शाम ढल रही थी। आकाश में सुनहरे और बैंगनी रंग फैल रहे थे। एलियाब ने गहरी साँस ली। उसकी थकान दूर नहीं हुई थी, पर अब वह एक नई समझ के साथ थी। वह बालकपन की शिक्षाओं से आगे बढ़ने का रास्ता सीधा नहीं था; वह एक संघर्ष था, एक जुताई थी, ताकि जड़ें गहरी जा सकें। चेतावनी भय के लिए नहीं, बल्कि सचेत रहने के लिए थी। और आशा… वह लंगर था, जो तूफान में भी नाव को स्थ




