पवित्र बाइबल

प्रेम का सच्चा स्वरूप

अनुज ने अपनी आँखें बंद कीं। सामने के मंच पर भाई यशवंत जोर से बोल रहे थे—उनकी आवाज़ में एक अजीब सी झंकार थी, जैसे पीतल के बर्तनों की टकराहट। वह प्रार्थना की भाषा में बात कर रहे थे, पर अनुज को वह खोखला लगा। पिछले रविवार की बात याद आई, जब उसी भाई यशवंत ने समाज सेवा के लिए दान देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि उस गरीब विधवा का “चरित्र” संदिग्ध था। अनुज की पत्नी श्वेता ने उस रात कहा था, “इन सब उपदेशों से तो वह छोटा सा बच्चा बेहतर है, जो बिना कुछ बोले अपनी रोटी बाँट देता है।”

उस शाम, अनुज अपने पुराने नोटबुक में कुछ लिखने बैठा। पर शब्द नहीं आ रहे थे। बाहर बारिश हो रही थी, और टप-टप की आवाज़ के बीच उसे अपने दादा जी की याद आई—एक साधारण किसान, जो पढ़े-लिखे नहीं थे, पर जिनके चेहरे पर हमेशा एक गहरी शांति रहती थी। एक बार, जब अनुज परीक्षा में फेल हो गया था और सब डाँट रहे थे, दादा जी ने उसके सिर पर हाथ रखा था और बस इतना कहा था, “अगली बार ठीक हो जाएगा।” उस साधारण वाक्य में जो सहनशीलता थी, वह आज तक अनुज के दिल में बसी हुई थी।

अगले दिन दफ्तर में, अनुज का सहकर्मी राहुल गलती से एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट फाइल डिलीट कर बैठा। सबकी नजरें अनुज पर टिकी थीं, क्योंकि फाइल उसकी थी। राहुल का चेहरा सफेद पड़ गया था। अनुज के मन में क्रोध की एक लहर उठी, पर तभी उसे दादा जी का वह हाथ याद आया। उसने गहरी सांस ली और मैनेजर से कहा, “कोई बात नहीं, रात भर काम करके दोबारा बना देंगे।” राहुल की आँखों में आश्चर्य और राहत का भाव देखकर अनुज को एक अद्भुत शांति महसूस हुई। यह प्रेम का पहला स्पर्श था—धैर्य।

कुछ महीने बाद, अनुज की माँ बीमार पड़ीं। श्वेता ने बिना किसी शिकायत के, दिन-रात उनकी सेवा की। एक रात अनुज ने देखा कि श्वेता, थक कर कुर्सी पर सो गई है और उसकी उँगलियाँ अभी भी माँ के पैर दबा रही हैं। यह कोई भव्य त्याग नहीं था, न ही दिखावे की सेवा। यह तो बस एक सहज करुणा थी, जो खुद को भूल जाती है। अनुज को समझ आया कि प्रेम दिखावटी भाषण नहीं, बल्कि चुपचाप दिया जाने वाला वह हाथ है, जो थकान में भी नहीं थकता।

समय बीतता गया। अनुज के जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहे। एक बार व्यापार में बहुत नुकसान हुआ। रिश्तेदार दूर होने लगे, मित्रों के फोन कम आने लगे। पर श्वेता हमेशा उसके साथ खड़ी रही। एक शाम, जब वह बैंक के लोन के लिए तनाव में था, श्वेता ने अपने गहने निकालकर मेज पर रख दिए और मुस्कुराते हुए कहा, “यह सब अस्थायी है। तुम्हारा साथ ही मेरी असली पूँजी है।” उस क्षण अनुज ने महसूस किया कि प्रेम कभी असफल नहीं होता। यह हर परिस्थिति में आशा की एक किरण बनकर खड़ा रहता है।

आज, अनुज अपने बेटे आर्यन को पार्क में झूले पर झुला रहा है। आर्यन की हँसती आँखों में वह सारी मासूमियत है, जो दुनिया के सारे ज्ञान से बड़ी है। अनुज सोचता है—वह न तो भविष्यवक्ता है, न कोई महान विद्वान। उसके पास वह ज्ञान भी नहीं, जो सभी रहस्यों को खोल दे। पर इतना जरूर जानता है कि जब तक वह अपने बच्चे के लिए इस तरह प्रेम नहीं रख पा रहा, तब तक उसकी सारी उपलब्धियाँ, सारा ज्ञान बेकार है।

शाम ढलने लगी है। अनुज आर्यन को गोद में उठाता है। दूर कहीं चर्च की घंटी बज रही है। पर अनुज के कानों में वह आवाज़ नहीं, बल्कि उसके दादा जी का वह साधारण वाक्य गूंज रहा है—”अगली बार ठीक हो जाएगा।” यही तो प्रेम का सार है—एक सहज विश्वास, एक स्थिर आशा, एक चिरंतन धैर्य। और तीनों में सबसे बड़ा यही धैर्य है, जो समय के साथ खुद को निखारता रहता है, जबकि बाकी सब कुछ धूमिल हो जाता है।

वह घर की ओर चल पड़ता है। उसकी समझ में अब आ गया है कि प्रेम कोई भावना नहीं, कोई दिखावा नहीं। यह तो वह निश्छल कर्म है, जो बिना शर्त देता है, बिना अपेक्षा के सहता है, और हर समय आगे बढ़ने की ताकत देता है। और यही एकमात्र चीज़ है, जो हमेशा बची रहेगी—जब विश्वास टूट जाएगा, जब आशा धूमिल हो जाएगी, तब भी यही प्रेम शेष रह जाएगा, क्योंकि यह परमात्मा का स्वभाव है, और उसकी छवि में बने हमारे हृदय की अंतिम पुकार भी।

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