पवित्र बाइबल

होरेब की गूँजती वाचा

(भूमिका: यह कथा व्यवस्थाविवरण के पांचवें अध्याय पर आधारित है, जिसमें मूसा एक नई पीढ़ी को होरेब पर्वत पर हुई वाचा की घटना सुना रहे हैं। कथा एक वृद्ध इस्त्राएली की ज़ुबानी है, जो उस दिन को याद करता है।)

वह सुबह ऐसी थी मानो रेत ने भी साँस लेना सीख लिया हो। हवा में नमी का नामोनिशान नहीं, बस एक तपिश थी जो हमारे चेहरों से टकराकर शिकायत करती लगती। हम लोग, यानी यह नई पीढ़ी, जो मिस्र की गुलामी का स्वाद नहीं जानती थी, मूसा के चारों ओर घेरा डाले बैठे थे। उनकी दाढ़ी के बाल सफ़ेद हो चले थे, पर आँखों में वही आग थी, वही धुन जो उन्हें राजमहल से निकालकर इस जंगल तक ले आई।

मूसा ने आँखें बंद कीं। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। ऐसा लगा जैसे वह कोई भारी बोझ उठा रहे हों, कोई ऐसी स्मृति जो शब्दों में ढलने से पहले दर्द देती हो। फिर उन्होंने कहा, “सुनो, मेरे बच्चों, वह दिन… वह दिन मैं कभी नहीं भूल सकता।”

उनकी आवाज़ में एक कंपकंपी थी, न डर की, न कमज़ोरी की, बल्कि उस भयानक पवित्रता की, जिसका अनुभव उन्होंने पर्वत पर किया था। “तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारे बुजुर्ग, वे सब उस जगह खड़े थे। होरेब का पर्वत… उसकी चोटी बादलों और धुएं में इस तरह लिपटी थी मानो स्वयं परमेश्वर ने उसे एक घूंघट से ढक दिया हो। जमीन काँप रही थी। हवा में गंधक की गंध तैर रही थी। और फिर… एक आवाज़। कोई दिखाई नहीं दे रहा था, पर वह आवाज़ हमारे मन के भीतर तक, हड्डियों के भीतर तक उतर रही थी।”

मूसा ने अपनी लाठी को रेत में गड़ाया। “और उसने कहा – ‘मैं वही यहोवा तेरा परमेश्वर हूं, जो तुझे मिस्र देश, दासत्व के घर से निकाल लाया।’ यह वाक्य हवा में नहीं, हमारे अस्तित्व में गूँजा। यह कोई आदेश नहीं था, यह एक सत्य था। एक ऐसी नींव जिस पर हमारा सब कुछ टिका था। उसने हमें पहचाना था, हमारा दर्द देखा था, और हमें बाहर निकाला था।”

“फिर वह आवाज़ फिर गूँजी,” मूसा ने अपनी आवाज़ को धीमा कर दिया, मानो उस क्षण को फिर से जी रहे हों। “‘तेरे सामने मेरे लिए कोई दूसरे देवता न बनाना।’ यह कोई नियम नहीं था। यह एक रिश्ते की शुरुआत थी। जैसे एक पति और पत्नी के बीच निष्ठा। वह हमारा छुड़ाने वाला था, और हम उसके। बस। कोई मूर्ति, कोई बुत, कोई चाँद-सितारे… वे सब इस रिश्ते के बीच में खड़ी एक दीवार होते। उसने हमें मिस्र की देवियों के जुए से आज़ाद किया था, तो फिर हम क्यों किसी और की ओर देखते?”

उन्होंने एक लंबी साँस ली। सूरज अब सिर के ऊपर आ चुका था, और छाया सिमटकर हमारे पैरों तक रह गई थी। “फिर उसने कहा – ‘तू अपने परमेश्वर यहोवा का नाम व्यर्थ न लेना।’ हममें से कई लोगों ने तब सिर खुजलाया होगा। नाम व्यर्थ लेना? मतलब? पर मूसा ने समझाया – ‘व्यर्थ का मतलब है खोखला, निरर्थक, बिना सम्मान के। उसका नाम एक प्रतिज्ञा है, एक चरित्र है। उसे हल्के में लेना, झूठी शपथ खाना, उसके नाम का उपयोग अपने छोटे-मोटे झगड़ों को सुलझाने के लिए करना… यह सब उस पवित्र नाम को धूल में मिलाना है। वह तुम्हारा मित्र नहीं है जिसके नाम का इस्तेमाल तुम हर बात में करो। वह पवित्र है।'”

“विश्रामदिन का वचन,” मूसा ने आगे कहा, “तुम सब जानते हो। पर उस दिन उसने जो कहा, उसमें एक नया स्वर था। ‘तू उसको पवित्र मानने के लिए स्मरण रखना।’ स्मरण रखना। क्यों? क्योंकि हम भूल जाते हैं। हम गुलाम थे। मिस्र में कोई विश्राम नहीं था, बस काम, काम और काम। हम मशीन बन गए थे। परमेश्वर हमें इंसान बना रहा था। एक दिन आराम करना, सृष्टि को देखना, अपने परिवार के साथ बैठना, यह याद दिलाना था कि हम मनुष्य हैं, उपकरण नहीं। और सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं, तुम्हारे दासों, तुम्हारे पशुओं, यहाँ तक कि तुम्हारे द्वारा आए परदेशी के लिए भी। यह दया का दिन था।”

मूसा की आँखें अब हम में से हर एक के चेहरे पर टिक गईं, जैसे हर एक को जाँच रहे हों। “माता-पिता का आदर। यह वचन… इसे सुनकर कई बुजुर्गों की आँखें भर आई थीं। मिस्र में बूढ़ों की कोई इज्ज़त नहीं थी। जब वे काम करने लायक नहीं रहते, तो उन्हें ताक पर रख दिया जाता। पर यहाँ… यहाँ उनका स्थान ठीक परमेश्वर के निकट था। परिवार की नींव। उनका आदर करना, यह दीर्घायु का रहस्य नहीं, बल्कि एक सभ्यता को बचाए रखने की शर्त थी।”

“और फिर आया – ‘हत्या न करना। व्यभिचार न करना। चोरी न करना।’ इन शब्दों में कोई गड़बड़ नहीं थी। वे सीधे, कठोर, पत्थर पर खुदे हुए अक्षरों की तरह थे। पर उस आवाज़ में न्याय के साथ-साथ एक चेतावनी भी थी। ये आदेश हमें बस नियम नहीं दे रहे थे। ये हमें बता रहे थे कि एक समाज, एक समुदाय कैसे जीवित रह सकता है। अगर एक-दूसरे की हत्या करोगे, पड़ोसी की पत्नी पर बुरी नज़र रखोगे, एक-दूसरे की संपत्ति छीनोगे, तो यह जन समुदाय कभी नहीं बस पाएगा। हम मिस्र से आज़ाद हुए थे, पर अगर हमारे अंदर मिस्र का स्वार्थ और हिंसा बनी रही, तो हम जंगल में ही मर जाएँगे।”

मूसा ने अपना हाथ उठाया। “झूठी गवाही। इस वचन ने सबको सिहरन दी। क्योंकि न्याय की व्यवस्था टिकी है सच्चाई पर। एक झूठा सबूत… वह पूरी व्यवस्था को, पूरे समुदाय को खोखला कर सकता है। और अंतिम वचन… ‘लालच न करना।’ यह वचन सबसे भीतर तक जाता था। हत्या, व्यभिचार, चोरी – ये सब बाहरी कर्म हैं। पर लालच… वह तो मन में पैदा होती है। तेरे पड़ोसी का घर, उसकी पत्नी, उसका गदहा, उसका कुछ भी… उसकी ओर ललचाई नज़र से देखना। यह वचन हमारे दिल की गहराइयों तक पहुँचता था। यह कह रहा था कि नैतिकता की शुरुआत विचारों से होती है।”

मूसा चुप हो गए। उनके चेहरे पर एक थकान और विस्मय का मिश्रण था। “जब वह आवाज़ बंद हुई,” उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा, “तो पहाड़ अब भी धुआँ उगल रहा था। और लोग… वे काँप रहे थे। उन्होंने मुझसे कहा – ‘मूसा, तुम हमसे बात करो। हम और नहीं सुन सकते। यह महान आवाज़ हमें मार डालेगी।’ उन्हें डर लगा था। असली, कंपकंपी देने वाला डर।”

“और परमेश्वर ने उनकी बात मान ली,” मूसा ने कहा, उनकी आवाज़ में एक करुणा थी। “उसने कहा – ‘उन्होंने जो कहा है, वह ठीक है। काश वे ऐसा मन रखते कि सदा मेरा भय मानते और मेरी सब आज्ञाओं को मानते, जिससे उनका और उनकी सन्तान का सदा भला होता।’ देखो, वह तुमसे डरवाना नहीं चाहता था। वह चाहता था कि तुम समझो। ये आज्ञाएँ तुम्हारे भले के लिए हैं। ये तुम्हें जीवन का रास्ता दिखाती हैं।”

मूसा उठ खड़े हुए। उनकी शरीर की छाया लंबी हो चली थी। “आज, मैं तुमसे फिर वही कहता हूँ। तुम जंगल में खड़े हो। तुम्हारे सामने वादा किया हुआ देश है। ये वचन… ये तुम्हारे पैरों की चिरागी हैं। इन्हें सुनो। इन्हें अपने दिल में रखो। इन पर चलो। यही तुम्हारी बुद्धि है, यही तुम्हारा जीवन है।”

हम चुपचाप बैठे रहे। पर्वत की वह गर्जन, वह धुआँ, वह काँपती हुई धरती… वह सब हमारी कल्पना में सजीव हो उठा था। और उन दस वचनों का भार… वह अब केवल पत्थर की दो तख्तियों पर नहीं, बल्कि हमारे अपने दिलों पर लिखा जाने को तैयार था। हवा ने फिर साँस ली, और इस बार उसमें केवल रेत की गर्मी नहीं, बल्कि एक प्राचीन, पवित्र प्रतिज्ञा की ठंडक महसूस हुई।

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