(लेखक का नोट: यह कहानी गिनती की पुस्तक के अध्याय 9 की घटनाओं पर एक कल्पनात्मक विस्तार है, जो बाइबिल के पाठ और उसके ऐतिहासिक-धार्मिक संदर्भ के प्रति वफादार रहने का प्रयास करती है।)
सिनाई का वह विशाल, धूल भरा मैदान, जो अब तक आदत सा लगने लगा था, आज एक अलग ही सन्नाटे में लिपटा हुआ था। हवा में नमक और सूखी झाड़ियों की गंध के साथ-साथ एक प्रतीक्षा का भाव तैर रहा था। पहाड़ की छाया लंबी हो रही थी, और इस्राएल के शिविर में, हर तंबू के सामने, लोगों के चेहरे पर एक ही सवाल था। कल पहला महीना था, और फसह का पर्व।
मूसा के तंबू के पास लोगों का एक झुंड जमा था। उनमें से कुछ के चेहरे गंभीर थे, कुछ पर उलझन थी। एलीएजर, हारून का पुत्र, धीरे से मूसा के कान में कुछ कह रहा था। फिर मूसा ने उन लोगों की ओर देखा, जो आगे खड़े थे। उनमें से एक, नाम था शेलुमीएल, उसकी आँखों में एक विशिष्ट पीड़ा थी। उसने हाथ जोड़कर कहा, “हे हमारे नेता, हम एक धर्म-संकट में हैं।”
शेलुमीएल के पीछे खड़े आदमियों में से एक, जिसका चेहरा धूल और थकान से भरा था, बोला, “हमारे बीच कुछ ऐसे हैं जो किसी मनुष्य की लाश छूने के कारण अशुद्ध हो गए हैं। उन्होंने जानबूझकर नहीं किया। रेगिस्तान कठोर है, मौत अचानक आती है। क्या ऐसी अवस्था में वे फसह का मेम्ना नहीं चढ़ा सकते? क्या वे यहोवा की इस महान स्मृति से वंचित रह जाएँ?”
उसकी आवाज़ में निराशा नहीं, बल्कि एक ईमानदार जिज्ञासा थी। मूसा चुप रहा। उसकी दाढ़ी पर रेगिस्तान की धूल जमी थी। उसने कहा, “तुम लोग यहीं रुको। मैं यहोवा से पूछता हूँ।”
लोग देर तक वहीं खड़े रहे। सूरज ढल रहा था, और सिनाई की चोटियाँ सुनहरी हो उठी थीं। तंबुओं से चूल्हों की आग की सुगंध आने लगी। बच्चे दौड़ रहे थे, बकरियाँ मिमियाती थीं। साधारण जीवन चल रहा था, पर उन कुछ लोगों के लिए, यह प्रश्न साधारण नहीं था। यह उनकी आराधना, उनकी पहचान का सवाल था।
काफी देर बाद मूसा बाहर आया। उसके चेहरे के भाव से कुछ पढ़ पाना मुश्किल था। उसने सभा को एकत्र किया और उसकी आवाज़, जो आमतौर पर गरजने वाली होती थी, आज शांत और स्पष्ट थी।
“यहोवा का वचन सुनो,” उसने कहा। “जो कोई अशुद्ध हो, या सुदूर यात्रा पर हो, तो भी वह यहोवा का फसह मनाए। वे पहले महीने की चौदहवीं तारीख को नहीं, बल्कि दूसरे महीने की चौदहवीं तारीख को, सांझ के समय, फसह मनाएँ। बिना खमीर की रोटी और कड़वे साग के साथ। उन्हें एक भी हड्डी न तोड़नी चाहिए। सारे विधान के अनुसार ही उसे मनाना चाहिए।”
शेलुमीएल की आँखों में राहत की एक चमक दौड़ गई। पर मूसा की आवाज़ गम्भीर बनी रही। “लेकिन,” उसने जोर दिया, “जो व्यक्ति शुद्ध है और यात्रा पर नहीं है, और फिर भी फसह नहीं मनाता, उसका प्राण अपने लोगों में से काट दिया जाएगा। क्योंकि उसने यहोवा का भेंट समय पर नहीं चढ़ाया। वह अपने पाप का भार उठाएगा।”
एक सन्नाटा छा गया। यह दया और न्याय का एक साथ घोषणा थी। परमेश्वर का नियम लौह के समान दृढ़ था, पर उसमें मनुष्य की विवशता के लिए एक छूट भी थी। वह एक दरवाजा था, उनके लिए जो बाहर खड़े लग रहे थे।
“और,” मूसा ने कहा, “यदि कोई परदेशी तुम्हारे बीच रहता है और यहोवा का फसह मनाना चाहे, तो वह भी मनाए। उस पर भी एक ही नियम लागू होगा।”
यह बात और भी अद्भुत थी। शिविर के किनारे पर रहने वाले, वे लोग जो इस्राएली नहीं थे, पर इस जनसमूह के साथ चले आ रहे थे, उनके लिए भी यहोवा की विधि खुली थी। यह केवल जन्म का नहीं, बल्कि हृदय से आज्ञापालन का विधान था।
और फिर, उसी रात, कुछ ऐसा हुआ जो हर रोज होता था, पर आज विशेष अर्थ लेकर आया। शिविर के ऊपर, जो बादल का स्तंभ दिनभर खड़ा रहता, वह धीरे-धीरे हटने लगा। यह कोई साधारण बादल नहीं था; उसके भीतर एक दिव्य तेज झलकता था, और रात के समय वह आग के स्तंभ का रूप ले लेता, जो पूरे शिविर को एक असाधारण, कोमल रोशनी से भर देता।
आज, जब वह बादल ऊपर उठा, तो पूरा इस्राएल, हर गोत्र, हर परिवार, जानता था कि चलना है। तंबू गिराए गए, कुएं ढक दिए गए, सामान बांधे गए। कोलाहल था, पर कोई अव्यवस्था नहीं। यह एक लयबद्ध, अभ्यस्त गति थी। और जब बादल रुक जाता, वे डेरा डाल देते। कितने दिन? कितने महीने? कोई नहीं जानता था। यहोवा की इच्छा पर सब निर्भर था।
एक बूढ़ा, जिसका नाम ओबेद था, अपने पोते को गोद में लिए आग के स्तंभ की ओर देख रहा था। बच्चे की आँखों में आग की लपटें झिलमिला रही थीं। ओबेद ने धीरे से कहा, “देख, बेटा। हमारा मार्गदर्शक। न तो हमारी सुविधा से चलता है, न हमारी थकान से रुकता है। वह चलता है, तो हम चलते हैं। वह ठहरता है, तो हम ठहरते हैं। दिन हो या रात, हमें छोड़ता नहीं।”
यही था उनका जीवन। एक निश्चित कार्यक्रम नहीं, एक स्थिर घर नहीं। केवल विश्वास, और उस बादल व आग के स्तंभ पर नज़र। फसह की छूट ने उन्हें यह याद दिला दिया था कि नियम जीवन के लिए हैं, जीवन नियमों के लिए नहीं। और यह चलते रहना, यह ठहराव, यह अनिश्चितता – यह सब उसी विश्वास का हिस्सा था।
जब वे चले, तो रेगिस्तान की हवा ने उनके चेहरों पर धूल जमा दी। पर उनकी आँखें, उस स्तंभ पर टिकी हुई थीं, जो उन्हें एक अदृश्य मार्ग पर लिए चला जा रहा था – वादे की भूमि की ओर, एक ऐसी मंज़िल की ओर, जिसका उन्हें केवल विश्वास था।




