अय्यूब की आंखों से आखिरी आंसू की एक बूंद गिरकर धूल में समा गई। उसकी सफेद दाढ़ी हवा में हल्के से हिल रही थी, जैसे कोई पुराना झंडा जो अब लड़ाई नहीं, शांति का प्रतीक हो। उम्र के भार से झुके उसके कंधे अचानक हल्के लग रहे थे। वह अभी भी अपने मलबे पर बैठा था – टूटे हुए घर के चूल्हे की एक ईंट, जिस पर राख की परत जमी थी। पर आज वह राख उसे जलाती नहीं लगी। हवा में एक अलग सी सरसराहट थी, जैसे पूरब से आने वाली हवा ने रुख बदल लिया हो।
भगवान के उन शब्दों की गूंज अभी भी उसके कानों में थी – विशालकाय दरियाइयों और आकाश के पक्षियों के बारे में, तारों के बंधन और बादलों के भण्डार के बारे में। पर इन सबसे ज्यादा, जो बात उसके भीतर उतर गई थी, वह थी वह खामोशी। वह खामोशी जो सवालों के ठोस पत्थरों को, धूल की तरह उड़ा ले गई। अय्यूब ने अपने हाथों को देखा – ये वही हाथ थे जिन्होंने अपने बच्चों के शव सँभाले थे, ये वही हाथ थे जो फोड़ों से तार-तार हो गए थे। आज उन्हें देखते हुए उसे लगा, जैसे ये हाथ किसी और के हैं। या शायद, पहली बार, वास्तव में उसके अपने।
उसने सिर उठाकर आकाश की ओर देखा, नीले प्रकोप के स्थान पर एक कोमल नीला फैला था। और उसके होंठों से शब्द फूटे, भारी, गहरे, जैसे किसी कुएं के तल से निकल रहे हों:
“मैं जानता हूं कि तू सब कुछ कर सकता है। कोई भी विचार तुझसे छिपा नहीं है। ‘यह है कौन जो अज्ञानता से परामर्श को ढकता है?’ सचमुच, मैंने ऐसी बातें कही थीं जिन्हें मैं नहीं समझता था। मैंने ऐसी चीजों के बारे में बात की थी जो मेरी समझ से बहुत परे, अति अद्भुत थीं।”
वह रुका। एक पत्थर पर बैठी एक चिड़िया ने मधुर स्वर लगाया। “सुन,” उसने अपने आप से कहा, “अब सुन। पहले मेरी सुनता था, अब मैं तेरी सुनता हूं। मेरी आंखों ने तुझे देखा है। इसलिए मैं अपने शब्दों से घृणा करता हूं, और धूल और राख पर पश्चाताप करता हूं।”
यह ‘देखना’ कोई दृष्टि नहीं थी। यह एक आंतरिक ज्ञान था, एक ऐसी उपस्थिति का साक्षात्कार जो समुद्र की गहराई से भी गहरी, और आकाश के विस्तार से भी विशाल थी। उसका अहं, उसका ‘मैं’ जो दुख में भी बचा हुआ था, वह अंततः विसर्जित हो गया था। वह खाली था, पर इस बार यह खालीपन किसी कुएं का नहीं, बल्कि एक विस्तृत मैदान जैसा था, जहां हवा स्वतंत्रता से बह सकती थी।
फिर यहोवा का वचन उसके मित्रों के लिए आया। अय्यूब ने एलीफज तैमनी की ओर देखा, जिसके चेहरे पर अब उसका बुद्धिमान, सिद्धांतकार का भाव नहीं, बल्कि एक शर्मिंदा, भटका हुआ भाव था। बिलदद और सोफर भी सिर झुकाए खड़े थे। पर अय्यूब के मन में किसी के प्रति कटुता नहीं थी। दुख ने उसे एक अजीब सी करुणा सिखा दी थी। उसने उनके लिए प्रार्थना की। उसकी प्रार्थना में कोई शिकायत नहीं थी, कोई याचना नहीं थी। एक सरल, स्पष्ट निवेदन था, जैसे कोई बच्चा किसी बड़े से कुछ मांग रहा हो।
और जैसे ही अय्यूब ने अपने मित्रों के लिए प्रार्थना की, कुछ ढीला पड़ा। समय की जकड़न, दुख की जड़ता। उसके मित्रों को तो माफी मिली, पर अय्यूब को कुछ और मिला – वह पुनःस्थापना, जो सिर्फ संपत्ति की वापसी नहीं थी।
यह धीरे-धीरे हुआ। जैसे बसंत की पहली फुहार सूखी धरती को भिगोती है, वैसे ही जीवन लौटा। पहले तो लोग आए, दूर-दूर के रिश्तेदार, पुराने परिचित, और कुछ ऐसे भी जो उसके दुख के दिनों में दूर हो गए थे। वे हैरान थे। उन्होंने जो देखा वह एक टूटा हुआ, कड़वा बूढ़ा नहीं था। उन्होंने एक ऐसा चेहरा देखा जिस पर शांति थी, आंखों में एक ऐसी गहराई जो दुख से पार हो गई थी। उन्होंने उससे सहानुभूति जताई, और हर एक ने उसे एक कहार और एक चांदी का सिक्का दिया। यह कोई ऋण नहीं था, बल्कि प्रेम का एक प्रतीक था, समुदाय में उसकी वापसी का।
और फिर, धन लौटा। पहले दोगुना, बल्कि उससे भी अधिक। भेड़-बकरियों के झुंड फिर से हरे-भरे मैदानों को भरने लगे। ऊंटों की कतारें दूर से धूल उड़ाती हुई आतीं। गायों के बैलों की संख्या फिर से बढ़ी। यह सब एक साथ नहीं हुआ। कभी कोई यात्री कुछ लौटाता, कभी कोई दूर का सौदा बढ़िया निकल जाता। जीवन की धारा फिर से बहने लगी, और अय्यूब इस धारा के बीच में नहीं, बल्कि उसके किनारे बैठा, शांत भाव से देखता रहता।
पर सबसे बड़ा उपहार, वह जो उसके हृदय के सबसे गहरे, सुनसान कोने में रोशनी ले आया, वह था नया परिवार। एक दिन, उसकी पत्नी, जिसका चेहरा भी अब पहले जैसा कठोर नहीं रहा था, उसके पास आई और उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। समय बीता। और फिर, एक सुबह, पहली बेटी का जन्म हुआ। उसने उसका नाम यमीमा रखा – कजरली, एक कोमल पक्षी की तरह। फिर केसिया आई, जिसकी खुशबू दालचीनी सी थी। फिर कर्नहपूख, एक सुंदर श्रृंगार-पात्र के समान। और अंत में, सबसे छोटी, बालाओं के साथ खेलने वाली, जिसका नाम उसने रखा दीज्रा – सुंदरता।
और उसके सात बेटे… वे उसकी आंखों का तारा बने। पर अय्यूब अब पहले जैसा नहीं था। वह उन्हें कभी भी अपनी संपत्ति नहीं समझता था। वह जानता था कि ये उपहार हैं, जिन्हें कभी भी लौटाया जा सकता है। इसलिए उसका प्रेम और भी गहरा, और भी कोमल था। वह उन्हें देखता, और कभी-कभी पुरानी यादें, पुराने चेहरे उसकी आंखों के सामने तैर जाते। पर अब दर्द नहीं होता था, बस एक हल्की सी करुणा, जैसे कोई पुराना घाव जो अब केवल एक धुंधली सी रेखा रह गया हो।
अय्यूब लंबे जीवन का आशीर्वाद पाकर भी, हर सुबह नए आश्चर्य के साथ उठता। वह अपनी बेटियों को, जो पूरे देश में सुंदरता के लिए प्रसिद्ध थीं, अपने भाइयों के साथ खाते-पीते देखता। और उसने उन्हें भी पैतृक संपत्ति में हिस्सा दिया – एक असामान्य बात, जो उसके हृदय की विशालता को दिखाती थी।
वह अक्सर अपने घर के द्वार पर बैठता, उसी ईंट पर नहीं जहां वह दुख सहता था, बल्कि एक नए बने आंगन में। और जब कोई उससे पूछता कि उसके दुख के दिनों के बारे में, वह गहरी सांस लेता, और बस इतना कहता: “मैंने सुना था। फिर मैंने देखा। और देखने के बाद, सब कुछ बदल गया।” उसकी बातों में कोरी उपदेशिका नहीं होती थी, बल्कि एक गहन, शांत अनुभव की गूंज होती थी।
अय्यूब की मृत्यु बूढ़े और जीवन से परिपूर्ण होकर हुई। पर कहानी का अंत वहाँ नहीं होता। वह आज भी जीवित है, हर उस हृदय में जो पूर्ण समर्पण में, अपने सभी प्रश्नों को धूल और राख में मिला देता है, और फिर भी, आश्चर्यजनक रूप से, एक नई सुबह का सूरज देखता है – जो पहले से भी अधिक कोमल, और पहले से भी अधिक वास्तविक लगता है।




