यह कहानी उस समय की है जब याकूब कनान देश में रहता था। याकूब के बारह पुत्र थे, और उनमें से यूसुफ सबसे छोटा था। यूसुफ को उसके पिता याकूब से विशेष प्रेम था, क्योंकि वह उनके बुढ़ापे में पैदा हुआ था। याकूब ने यूसुफ के लिए एक रंग-बिरंगा लबादा बनवाया था, जो उसकी विशेषता बन गया। यह लबादा न केवल सुंदर था, बल्कि यह यूसुफ के पिता के प्रेम का प्रतीक भी था।
यूसुफ के भाई इस बात से ईर्ष्या करने लगे क्योंकि उन्हें लगता था कि उनके पिता यूसुफ को उनसे अधिक प्यार करते हैं। यह ईर्ष्या धीरे-धीरे उनके दिलों में जलन का कारण बन गई। एक दिन, यूसुफ ने एक सपना देखा और उसे अपने भाइयों को सुनाया। उसने कहा, “मैंने सपना देखा कि हम सब खेत में बंधन बांध रहे हैं, और अचानक मेरा बंधन खड़ा हो गया और तुम्हारे बंधन मेरे बंधन के चारों ओर झुक गए।” यह सुनकर उसके भाई और भी अधिक क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा, “क्या तू हम पर राज करने आया है? क्या तू हम पर शासन करेगा?” और उनका क्रोध यूसुफ के प्रति और भी बढ़ गया।
कुछ समय बाद, यूसुफ ने फिर एक सपना देखा और उसे अपने भाइयों और पिता को सुनाया। उसने कहा, “मैंने सपना देखा कि सूरज, चाँद और ग्यारह तारे मेरे सामने झुक रहे हैं।” यह सुनकर उसके पिता याकूब ने उसे डांटा और कहा, “यह कैसा सपना है जो तूने देखा है? क्या मैं और तेरी माँ और तेरे भाई तेरे सामने झुकेंगे?” यूसुफ के भाइयों ने इस सपने को सुनकर उससे और भी अधिक घृणा करने लगे, लेकिन याकूब ने इस बात को मन में रख लिया।
एक दिन, यूसुफ के भाई शेकेम के पास अपने पिता के झुंड को चराने गए। याकूब ने यूसुफ से कहा, “क्या तुम्हारे भाई शेकेम में हैं? जाओ और देखो कि वे कुशल से हैं और झुंड कुशल से है, और मुझे समाचार लेकर आओ।” यूसुफ ने अपने पिता की आज्ञा मानी और शेकेम की ओर चल पड़ा। जब वह मार्ग में भटक गया, तो एक व्यक्ति ने उसे देखा और पूछा, “तू किसे ढूंढ रहा है?” यूसुफ ने कहा, “मैं अपने भाइयों को ढूंढ रहा हूँ। कृपया मुझे बताएं कि वे कहाँ हैं?” उस व्यक्ति ने कहा, “वे यहाँ से दोथान चले गए हैं।” यूसुफ ने उसका धन्यवाद किया और दोथान की ओर चल पड़ा।
जब यूसुफ के भाइयों ने उसे दूर से आते देखा, तो वे उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगे। उन्होंने कहा, “देखो, वह सपने देखने वाला आ रहा है। आओ, हम उसे मार डालें और किसी गड्ढे में फेंक दें। फिर हम कहेंगे कि किसी जंगली जानवर ने उसे खा लिया है। तब हम देखेंगे कि उसके सपने क्या होते हैं।” लेकिन रूबेन, जो यूसुफ का बड़ा भाई था, ने उन्हें रोकने की कोशिश की। उसने कहा, “हम उसका प्राण न लें। उसके खून का दोष हम पर न हो। उसे इस गड्ढे में डाल दो, लेकिन उसे हाथ न लगाओ।” रूबेन का इरादा था कि बाद में वह यूसुफ को बचा लेगा और उसे उसके पिता के पास वापस ले जाएगा।
जब यूसुफ वहाँ पहुँचा, तो उसके भाइयों ने उसका रंग-बिरंगा लबादा उतार लिया और उसे एक सूखे गड्ढे में फेंक दिया। वह गड्ढा खाली था, उसमें पानी नहीं था। यूसुफ ने अपने भाइयों से गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की, लेकिन उन्होंने उसकी एक न सुनी। वे वहाँ बैठकर भोजन करने लगे।
तभी उन्होंने देखा कि एक व्यापारियों का कारवां गिलाद से आ रहा है। उनके ऊँटों पर गोंद, बलसान और लोहबान लदा हुआ था, और वे मिस्र की ओर जा रहे थे। यहूदा ने अपने भाइयों से कहा, “हमें अपने भाई को मारकर उसके खून को छिपाने से क्या लाभ? आओ, हम उसे इन व्यापारियों को बेच दें। इस तरह हम उसके खून के दोषी नहीं होंगे, क्योंकि वह हमारा भाई है, हमारा अपना मांस और खून है।” उसकी बात सभी भाइयों ने मान ली।
व्यापारियों के पास जाने से पहले, उन्होंने यूसुफ को गड्ढे से निकाला और उसे बीस चाँदी के सिक्कों के बदले में बेच दिया। व्यापारियों ने यूसुफ को ले लिया और मिस्र की ओर चल पड़े। रूबेन जब वापस आया, तो उसने देखा कि यूसुफ गड्ढे में नहीं है। वह दुखी होकर अपने वस्त्र फाड़ने लगा और अपने भाइयों से कहा, “लड़का तो यहाँ नहीं है! मैं कहाँ जाऊंगा?”
तब उन्होंने एक बकरी का बच्चा लेकर उसका खून यूसुफ के रंग-बिरंगे लबादे पर छिड़क दिया। फिर उन्होंने लबादा अपने पिता के पास भेज दिया और कहा, “हमें यह मिला है। देखो, क्या यह तेरे बेटे का लबादा है?” याकूब ने उसे पहचान लिया और कहा, “यह मेरे बेटे का लबादा है! किसी जंगली जानवर ने उसे खा लिया है! यूसुफ निश्चय ही फाड़ा गया है!” याकूब ने अपने वस्त्र फाड़े और टाट ओढ़कर अपने बेटे के लिए बहुत दिनों तक शोक मनाया। उसके सभी पुत्र और पुत्रियाँ उसे सांत्वना देने आए, लेकिन वह सांत्वना नहीं चाहता था। उसने कहा, “मैं शोक करते हुए अपने बेटे के पास अधोलोक में जाऊंगा।” और याकूब यूसुफ के लिए रोता रहा।
इस तरह, यूसुफ के भाइयों ने उसे बेच दिया, और वह मिस्र में एक दास के रूप में पहुँच गया। लेकिन परमेश्वर का हाथ यूसुफ के साथ था, और वह उसे एक महान उद्देश्य के लिए तैयार कर रहा था। यह कहानी हमें सिखाती है कि परमेश्वर की योजनाएँ मनुष्य की समझ से ऊपर हैं, और वह हर परिस्थिति में अपने लोगों की रक्षा करता है।