पवित्र बाइबल

परमेश्वर का अय्यूब से संवाद

फिर परमेश्वर ने आकाश के बादलों के बीच से अपनी वाणी सुनाई, और उसकी आवाज़ गर्जन के समान गूंज उठी। उसने अय्यूब से कहा, “हे अय्यूब, अब तू मुझे उत्तर दे! क्या तू उस सर्वशक्तिमान की योजनाओं को समझने का दावा करता है? यदि तुझमें सचमुच बल है, तो मेरे इन प्रश्नों का उत्तर दे।”

तब परमेश्वर ने पृथ्वी के आधारों का वर्णन करना आरंभ किया। “उस दिन तू कहाँ था जब मैंने पृथ्वी की नींव रखी? बतला, यदि तुझे बुद्धि हो! किसने उसकी माप नापी? किसने उस पर डोरी डाली? उसके कोने के पत्थर किसने बैठाए, जब सब सुबह के तारे मिलकर जयजयकार करते थे, और परमेश्वर के सब पुत्र ऊंचे स्वर से आनन्दित होते थे?”

वायु मंद पड़ गई, और सारा प्रकृति जैसे स्तब्ध होकर सुनने लगा। परमेश्वर की वाणी समुद्र के गर्जन के समान निरंतर गूंजती रही।

“किसने समुद्र के लिए द्वार रोके, जब वह गर्भ से निकलकर बाहर आया? जब मैंने उसे बादल का वस्त्र और गहन अन्धकार का लपेटा दिया, और उसके लिए ड़गर बाँधकर कहा, ‘इतने दूर तक आना है, पर आगे नहीं बढ़ना; यहाँ तेरे गर्व की लहरें मुड़ जाएँगी’?”

सूर्य की किरणें बादलों के बीच से झांकने लगीं, मानो स्वयं प्रकाश भी परमेश्वर के वचनों को सुन रहा हो। परमेश्वर ने प्रकाश और अंधकार के रहस्यों को प्रकट किया।

“क्या तू ने उस समय को जानता है जब बकरियाँ बच्चा देती हैं? क्या तू हिरणियों के प्रसव-काल को देखता है? किसने जंगली गधे को स्वतंत्रता दी, और उसके बंधन किसने खोले? मैंने ही उसे अरण्य को घर बनाया, और नमकीन भूमि को उसका निवास स्थान ठहराया।”

तब परमेश्वर ने आकाश के अद्भुत कार्यों का वर्णन किया। “क्या तू आकाश के बन्धन खोल सकता है? क्या तू महासागर की गर्जना को रोक सकता है? क्या तू सूर्योदय का आदेश दे सकता है कि वह पृथ्वी के किनारों को पकड़ ले? क्या तू गहरे सागर के स्रोतों तक पहुँच सकता है, या मृत्यु के छाया के देश का भ्रमण कर सकता है?”

परमेश्वर की वाणी में कोमलता और प्रभुत्व का अद्भुत मेल था। “क्या तू हिम का भण्डार खोल सकता है? क्या तू ओलों के भण्डार का मार्ग जानता है? किसने वर्षा के लिए मार्ग बनाया, और बिजली की चमक के लिए रास्ता तैयार किया?”

वन के पशु और आकाश के पक्षी सब मौन होकर सुन रहे थे। परमेश्वर ने सिंह और कौए के बारे में पूछा। “कौन सिंह के लिए शिकार तैयार करता है, जब उसके बच्चे परमेश्वर की दोहाई देते हैं? कौन कौए के लिए आहार जुटाता है, जब उसके बच्चे परमेश्वर की ओर पुकारते हैं?”

अय्यूब ने अपना सिर झुका लिया। उसकी आँखों में आंसू थे, पर अब वे घमंड के नहीं, बल्कि विस्मय और श्रद्धा के आंसू थे। परमेश्वर के वचनों ने उसे उसकी सीमाओं का बोध करा दिया था।

परमेश्वर बोला, “क्या वह जो झगड़ता है, सर्वशक्तिमान से वाद-विवाद कर सकता है? क्या परमेश्वर को सिखाने वाला उसे उत्तर दे सकता है?”

तब अय्यूब ने उत्तर दिया, “देखो, मैं तुच्छ हूँ; मैं तुझे क्या उत्तर दूं? मैं अपना हाथ अपने मुंह पर रखता हूँ।”

परमेश्वर की महिमा और ज्ञान ने अय्यूब के हृदय को छू लिया था। उसे समझ आ गया कि मनुष्य की बुद्धि परमेश्वर की सृष्टि के रहस्यों के सामने कुछ भी नहीं है। प्रकृति का कण-कण परमेश्वर की सामर्थ्य और ज्ञान की गवाही दे रहा था, और अय्यूब ने विनम्र भाव से इस सत्य को स्वीकार कर लिया।

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