एक समय की बात है, यरूशलेम के गलियारों में भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह परमेश्वर का वचन सुनकर विचारमग्न बैठे थे। उनके हृदय में यहोवा की ओर से एक गहरी पीड़ा थी, क्योंकि उन्हें यहूदा के लोगों के पापों और उनके हृदय की कठोरता का भारी बोझ महसूस हो रहा था।
यिर्मयाह ने अपनी आँखें बंद करके परमेश्वर के वचन को ध्यान से सुना। वह एक ऐसे वृक्ष के दर्शन में थे जो पानी की धाराओं के किनारे लगाया गया था। उस वृक्ष की जड़ें नदी के ताजे जल में फैली हुई थीं, उसकी पत्तियाँ हरी-भरी थीं और वह गर्मी के दिनों में भी हरा-भरा खड़ा था। उस पर बैठे पक्षी मधुर स्वर में गा रहे थे और उसकी छाया में थके हुए यात्री विश्राम पा रहे थे।
किंतु तभी दृश्य बदल गया। यिर्मयाह ने एक और दृश्य देखा – एक ऐसा पौधा जो निर्जन मरुस्थल में उग आया था। वह धूप और तपिश में जल रहा था, उसकी जड़ें सूखी मिट्टी में फंसी हुई थीं। उसके आसपास न तो कोई हरियाली थी और न ही कोई जल स्रोत। वह पौधा मुरझा गया था और उसकी पत्तियाँ झड़ चुकी थीं। जंगली गधे उसे चरने आते थे और रेत के झोंके उसे ढकते जा रहे थे।
यिर्मयाह की आँखें खुलीं और वह गहरी सांस लेकर उठे। उन्होंने अपनी लेखनी उठाई और भविष्यद्वाणी के शब्द लिखने लगे: “धन्य है वह मनुष्य जो यहोवा पर भरोसा रखता है, और जिसका भरोसा यहोवा ही पर है। वह उस वृक्ष के समान होगा जो नदी के किनारे लगाया गया है…”
वह लिखते गए, उनके शब्दों में एक दिव्य शक्ति थी। वह बताने लगे कि जो लोग परमेश्वर से दूर होकर मनुष्य पर भरोसा रखते हैं, वे उस मरुस्थल के पौधे के समान हैं जो कभी हरा-भरा नहीं रह सकता।
यिर्मयाह मंदिर की ओर चल पड़े। रास्ते में उन्होंने देखा कि लोग मूर्तियों के सामने झुक रहे हैं, उनके हाथों में बनाई हुई मूर्तियाँ हैं। कुछ लोग पहाड़ियों पर जाकर अशेरा के उपासना स्थलों पर बलि चढ़ा रहे थे। यिर्मयाह का हृदय टूट गया।
वह मंदिर के प्रांगण में पहुँचे और अपना संदेश सुनाने लगे: “हे यहूदा के लोगो, तुम्हारा पाप लोहे की कलम से लिखा गया है, हीरे की धार से तराशा गया है। वह तुम्हारे हृदय की पट्टी पर और तुम्हारे वेदियों के कोनों पर अंकित है!”
लोग इकट्ठा होने लगे। कुछ उनके शब्दों को गंभीरता से सुन रहे थे, तो कुछ उन पर हँस रहे थे। यिर्मयाह ने चेतावनी दी: “तुम्हारी संपत्ति और तुम्हारे धन का नाश होगा। तुम अपनी सारी भूमि खो दोगे, क्योंकि तुमने मुझे संकट के समय छोड़ दिया है।”
तभी एक बूढ़ा व्यक्ति आगे आया, उसकी आँखों में आँसू थे। उसने पूछा, “हे भविष्यद्वक्ता, क्या अब भी हमारे लिए आशा है?”
यिर्मयाह ने उत्तर दिया, “हे यहोवा, मनुष्य के मार्ग उसके वश में नहीं हैं। मार्ग चलना मनुष्य का काम नहीं है। हमारे कदमों को स्थिर करना तो यहोवा परमेश्वर का काम है।”
उन्होंने लोगों को समझाया कि मनुष्य का हृदय सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला है, और वह अति निराशाजनक है। कोई भी उसे नहीं समझ सकता। “परन्तु यहोवा हृदय को जाँचता है,” यिर्मयाह ने घोषणा की, “वह मन के भावों और विचारों को परखता है।”
उन्होंने लोगों से कहा कि जो लोग अधर्म से धन इकट्ठा करते हैं, वे अपने जीवन के बीच में ही उसे छोड़ जाएँगे। “कौओं के घोंसले की तरह तुम्हारा अंत होगा,” यिर्मयाह ने चेतावनी दी।
किंतु उनके शब्दों में निराशा नहीं थी। उन्होंने लोगों को बताया कि यहोवा इस्राएल की आशा है, और जो उसे छोड़कर दूसरों की शरण में जाते हैं, वे लज्जित होंगे। “हे यहोवा, मेरा चंगा करने वाला, मेरी शरण,” यिर्मयाह ने प्रार्थना की, “मेरी आशा तू ही है।”
उस दिन के बाद, यिर्मयाह ने लोगों को समझाया कि सब्त के दिन का पालन करना कितना महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि यहोवा और उसकी आज्ञाओं का सम्मान करने से ही वे उस आशीष के वृक्ष के समान फलते-फूलते रह सकते हैं, न कि उस मरुस्थलीय झाड़ी के समान जो सूखकर नष्ट हो जाती है।
यिर्मयाह की ये बातें आज भी हमें यह सीख देती हैं कि सच्ची आशा और शक्ति केवल परमेश्वर में ही है, मनुष्यों में नहीं। जो उस पर भरोसा रखते हैं, वे कभी निराश नहीं होंगे, ठीक उस वृक्ष के समान जो जलधाराओं के किनारे लगा है और हर मौसम में हरा-भरा रहता है।




