पौलुस और सीलास थिस्सलुनीके की मण्डली के लिए बहुत चिन्तित थे। उन्हें डर था कि कहीं उन पर आए हुए क्लेशों ने उनके विश्वास को डगमगा न दिया हो। अथेन्स में अकेले बैठे-बैठे पौलुस का मन बेचैन हो उठा। एक दिन वह सीलास से बोला, “भाई, मैं अब और सहन नहीं कर सकता। हमें थिस्सलुनीके के विश्वासियों के बारे में जानना ही होगा।”
सीलास ने सिर हिलाया, “परन्तु हम वहाँ जा नहीं सकते। वे हमें पहचानते हैं और हमारे शत्रु हमारी राह देख रहे हैं।”
तब पौलुस ने तीमुथियुस को बुलाया, जो उनका सबसे विश्वसनीय सहकर्मी था। “हे पुत्र,” पौलुस ने उससे कहा, “तू थिस्सलुनीके जा और हमारे भाइयों का हाल लेकर लौट। देख कि उनका विश्वास अभी भी मजबूत है या नहीं।”
तीमुथियुस ने तुरंत तैयारी की। उसने एक साधारण यात्री का वस्त्र धारण किया और रातों-रात थिस्सलुनीके के लिए प्रस्थान किया। रास्ते में उसने कई बार खतरों का सामना किया – डाकुओं के झुण्ड, खड़ी चट्टानें, और भयंकर आँधी। परन्तु प्रभु यीशु का नाम लेकर वह सुरक्षित आगे बढ़ता रहा।
जब तीमुथियुस थिस्सलुनीके पहुँचा, तो उसने देखा कि मण्डली के लोग गुप्त स्थान पर एकत्रित होकर प्रार्थना कर रहे थे। उनके चेहरों पर क्लेश के निशान थे, परन्तु आँखों में एक अद्भुत चमक थी। जैसे ही तीमुथियुस ने प्रवेश किया, सब उठ खड़े हुए।
“भाइयो,” तीमुथियुस ने कहा, “पौलुस और सीलास आप सबको याद करते हैं और आपके विश्वास के लिए चिन्तित हैं।”
एक बूढ़ा विश्वासी आगे आया, उसकी आँखों में आँसू थे। “हमारे भाई पौलुस को बताना कि हमारा विश्वास और प्रेम दृढ़ है। हम पर बहुत क्लेश आए, परन्तु प्रभु यीशु की कृपा से हम डटे रहे।”
तीमुथियुस ने देखा कि वे लोग न केवल विश्वास में दृढ़ थे, बल्कि एक-दूसरे के प्रति प्रेम में और बढ़ गए थे। वे गरीबों की सहायता करते, बीमारों की सेवा करते, और सताए जाने पर भी परमेश्वर की स्तुति करते।
कई दिनों तक तीमुथियुस उनके साथ रहा। उसने उनकी प्रार्थना सभाओं में भाग लिया, उनके संघर्षों की कहानियाँ सुनीं, और उनकी दृढ़ता को निहारा। एक युवा विश्वासी ने उसे बताया, “जब हमें सताया जाता है, तो हम प्रभु यीशु को और अधिक याद करते हैं। उनका वचन हमारे लिए जीवन की रोटी बन गया है।”
अन्त में तीमुथियुस वापस लौटा। उसने अथेन्स में पौलुस और सीलास को सारी बातें विस्तार से बताईं। पौलुस की आँखों में आँसू आ गए, परन्तु ये आनन्द के आँसू थे।
“धन्य है परमेश्वर!” पौलुस ने आकाश की ओर देखकर कहा, “हमारे भाई विश्वास में स्थिर हैं। अब हम जीवित हैं, क्योंकि तुम हमारे साम्हने दृढ़ होकर खड़े हो।”
उसी रात पौलुस ने एक पत्र लिखना आरम्भ किया। उसने थिस्सलुनीके के विश्वासियों की प्रशंसा करते हुए लिखा: “हे भाइयो, तुम्हारे विश्वास की सुधि पाकर हम किस प्रकार परमेश्वर का धन्यवाद करें? रात-दिन हम तुम्हारे विचार से परमेश्वर के साम्हने अति हर्षित हैं।”
पत्र में उसने उन्हें और अधिक दृढ़ होने की प्रेरणा दी: “प्रभु तुम्हारे हृदयों को प्रेम में दृढ़ करे, और पवित्रता में स्थिर रखे, जब तक कि हमारे प्रभु यीशु मसीह अपने सब पवित्र लोगों के साथ आएँ।”
यह समाचार पाकर पौलुस का हृदय इतना भर गया कि वह घण्टों परमेश्वर की स्तुति करता रहा। उसने महसूस किया कि उसका श्रम व्यर्थ नहीं गया, और थिस्सलुनीके की मण्डली सचमुच प्रभु की महिमा के लिए जी रही है।




