तीसरे महीने के ठीक उस दिन, जब इस्राएल की संतानें मिस्र से निकलकर सीनै के रेगिस्तान में पहुँची थीं, वह सुबह एक अजीब सी गर्म हवा के झोंके के साथ शुरू हुई। मूसा अपनी झोपड़ी से बाहर निकले तो देखा कि पहाड़ की चोटी पर एक अजीब सी धुँधली रोशनी छिटकी हुई है, जैसे सुबह की किरणें बादलों से छनकर आ रही हों। पर बादल तो थे ही नहीं। वह रोशनी और तेज होती गई, और फिर आवाज आई—एक ऐसी आवाज जो हवा में नहीं, बल्कि सीधे दिल में उतर रही थी।
मूसा ने लोगों को इकट्ठा किया। वे सब, जो अभी तक मिस्र की गुलामी की यादों से जूझ रहे थे, अब इस नए अज्ञात भय के सामने खड़े थे। मूसा ने कहा, “परमेश्वर ने कहा है—’तुमने देखा कि मैंने मिस्रवालों के साथ क्या किया, और कैसे मैंने तुम्हें उकाब के पंखों पर उठाकर यहाँ लाया। अब अगर तुम मेरी आवाज सुनोगे और मेरी वाचा को मानोगे, तो तुम सारी पृथ्वी पर मेरी मणि बनोगे।'”
लोग स्तब्ध थे। उनकी आँखों में एक सवाल था—क्या वे सचमुच इस भारी बुलाहट के लायक हैं? मूसा ने उनकी चुप्पी को समझा। वे लौटकर परमेश्वर के पास गए, और उन्होंने लोगों के जवाब सुनाए—”जो कुछ यहोवा ने कहा है, हम वह सब करेंगे।”
फिर वह दिन आया जब पहाड़ पर बादल छा गए, और बिजली की कड़क के साथ आग की लपटें निकलने लगीं। पहाड़ का हर पत्थर काँप उठा, जैसे कोई जीवित प्राणी डर के मारे थरथरा रहा हो। लोग दूर खड़े देख रहे थे, उनके मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी। हवा में गंधक की गंध फैल गई थी। मूसा ने लोगों को चेतावनी दी—”सावधान रहना, पहाड़ के पास मत जाना, नहीं तो मर जाओगे।”
फिर मूसा अकेले उस धुएँ और आग के बीच चले गए। उनके कदमों की आवाज बिजली की गड़गड़ाहट में डूब गई। वे ऊपर चढ़ते गए, और जैसे-जैसे ऊपर बढ़ते, हवा और भारी होती गई। वहाँ कोई पक्षी नहीं चहचहा रहा था, कोई जानवर नहीं दिख रहा था—सब कुछ स्तब्ध था, जैसे सारी सृष्टि रुककर देख रही हो।
और तभी आवाज फिर आई—इस बार और स्पष्ट, और करीब। मूसा ने सुना—”मैं तेरे साथ हूँ। जा, लोगों के पास लौटकर कह दे कि वे पवित्र रहें। कल मैं उनके सामने प्रकट होऊँगा।”
मूसा लौटे तो देखा कि लोग अब भी डरे हुए हैं। उनकी आँखों में वही सवाल है—क्या हम सचमुच तैयार हैं? मूसा ने उन्हें समझाया—”अपने कपड़े धो लो, अपने आप को शुद्ध कर लो। कल का दिन बहुत बड़ा है।”
रात भर कोई सो नहीं पाया। हर कोई उस आवाज को याद कर रहा था जो हवा में नहीं, दिलों में गूँज रही थी। सुबह होते ही पहाड़ की चोटी पर काले बादल और घने हो गए, और फिर वह आवाज गरजने लगी—इतनी तेज कि सारा रेगिस्तान काँप उठा। लोगों ने देखा कि मूसा फिर पहाड़ पर चढ़ रहे हैं, और उनके साथ हारून भी है। वे दोनों उस आग और धुएँ में लुप्त हो गए, और लोग नीचे प्रार्थना करते रहे।
वह दृश्य अब भी उनकी यादों में जिंदा है—एक ऐसा पल जब आकाश और धरती के बीच का फासला मिट गया था, और मनुष्य ने परमेश्वर की आवाज सुनी थी। शायद यही वह पल था जब इस्राएल सचमुच एक जन बना—न सिर्फ एक कौम, बल्कि परमेश्वर की वाचा का हिस्सा।




