वह दिन ठंडी हवा के झोंकों के साथ शुरू हुआ। मोशे की आवाज़ चट्टानी पहाड़ियों से टकराकर गूँज रही थी, मानो स्वयं पर्वत उसकी बातों को दोहरा रहे हों। भीड़ में खड़ा यहोशू अपने पिता नून की पीठ थपथपा रहा था, “सुनो, पिताजी, मोशे कह रहे हैं कि हमें उन स्थानों को नष्ट करना होगा जहाँ अन्य जातियों के देवताओं की पूजा होती है।”
नून की आँखों में एक गहरी चिंता थी। वह years से उन उचे स्थानों पर जाता रहा था, जहाँ उसके पूर्वजों ने मूर्तियों के सामने धूप जलाई थी। “पर यहोशू,” उसने कहा, “क्या यहोवा हर जगह हमारी प्रार्थना नहीं सुन सकता? क्या हमें अपने पूर्वजों के स्थानों को तोड़ना ही होगा?”
मोशे की आवाज़ फिर गूँजी, “तुम उनके वेदियों को ढा देना, और उनके खम्भों को तोड़ डालना, और उनके काठ के पूतों को आग में जला देना, और उनके देवताओं की मूरतों को काट डालना, और उन स्थानों का नाम उस जगह से मिटा देना।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया। एक बूढ़ी औरत ने अपनी बाँहों में छोटी लकड़ी की मूरत को और ज़ोर से भींच लिया। वह years से उस मूरत को अपने झोंपड़े में रखती आई थी, उसे अपने बच्चों के स्वास्थ्य का रक्षक मानती थी।
अगले कुछ दिनों में, इस्राएल के लोगों में एक अजीब सी बेचैनी फैल गई। कुछ लोग तो तुरंत ही पहाड़ियों पर चढ़ गए, अपने हाथों में हथौड़े और फावड़े लिए। पर कई परिवारों में रातोंरात झगड़े शुरू हो गए।
नून का परिवार भी उनमें से एक था। उसकी पत्नी रिवका रोते हुए कह रही थी, “पर हमने तो हमेशा यहीं पर यहोवा को बलिदान चढ़ाया है! इसी जैतून के पेड़ के नीचे, जहाँ मेरे दादा-परदादा ने प्रार्थना की थी!”
यहोशू ने कोमलता से समझाया, “माँ, मोशे ने कहा है कि यहोवा एक विशेष स्थान चुनेंगे। वहाँ हम सब एकत्रित होंगे – हमारे परिवार, हमारे नौकर, हमारे मेहमान। वहाँ हम बलिदान चढ़ाएँगे और आनन्द मनाएँगे।”
धीरे-धीरे, बदलाव आने लगा। एक सुबह, नून ने अपने खेत के किनारे वाली छोटी वेदी को तोड़ दिया। पत्थरों के टुकड़े इधर-उधर बिखर गए। उसके हाथ काँप रहे थे, मानो वह अपने ही अतीत को नष्ट कर रहा हो।
कुछ हफ्तों बाद, जब यरदन नदी के पार की यात्रा शुरू हुई, तो लोगों ने देखा कि कनान देश के उचे स्थान वास्तव में विदेशी देवताओं से भरे हुए थे। बाल की मूरतें, अशेरा के खम्भे – सब उनकी आँखों के सामने थे।
एक शाम, यहोशू ने अपने पिता से कहा, “अब समझ आता है कि यहोवा ने ऐसा क्यों कहा। ये स्थान लोगों को गलत रास्ते पर ले जाते हैं।”
नून ने धीरे से सिर हिलाया, “हाँ, बेटा। अब मैं देख पा रहा हूँ कि यहोवा हमें एकता में रहना सिखा रहा है। अलग-अलग स्थानों पर पूजा करने से हमारा ध्यान बँट जाता था।”
जब वे शीलो पहुँचे, जहाँ मिलाप का तम्बू लगाया गया, तो नून की आँखों में आँसू आ गए। सैकड़ों परिवार एक साथ इकट्ठा हुए थे। बच्चे हँस रहे थे, औरतें गाना गा रही थीं, और पुरुष एक साथ प्रार्थना कर रहे थे। हवा में बलिदान की सुगंध फैली हुई थी।
रिवका ने अपने पति का हाथ थामा, “तुम सही थे, नून। यहाँ की आत्मीयता, यह एकता… इससे पहले कभी ऐसा नहीं देखा।”
यहोशू ने आनन्द के बलिदान की लपटों को देखा। उसे अब समझ आया कि यहोवा का मार्गदर्शन क्यों necessary था। एक स्थान, एक समुदाय, एक परमेश्वर – यही था वह सुरक्षित मार्ग जो उन्हें भटकने से बचाएगा।
सूरज डूब रहा था, और तम्बू के ऊपर बादल का खम्भा चमक रहा था। नून ने अपने परिवार को देखा – उसकी पत्नी, उसका बेटा, उसके पोते-पोतियाँ – सब एक साथ बैठे हुए थे। उसे लगा जैसे years के बाद उसकी आत्मा को सच्चा विश्राम मिला हो। यहोवा का वादा सच था – उसने उनके लिए एक ऐसा स्थान चुना था जहाँ वे सच्चे अर्थों में उसके लोग बन सकें।




