वह दिन ठंडी हवा के झोंकों के साथ शुरू हुआ था। राजा दाऊद की राजधानी में सुबह की रोशनी पहाड़ियों पर सोने जैसी चमक बिखेर रही थी। महल के अहाते में एक दूत सांस उखाड़ता हुआ दौड़ा आया। उसकी आँखों में एक अजीब सी घबराहट थी।
“महाराज!” उसने हाथ जोड़कर कहा, “अम्मोनियों के राजा नाहाश का देहांत हो गया है।”
दाऊद ने अपनी कुर्सी के हत्थे को मजबूती से पकड़ा। नाहाश… वह बूढ़ा राजा जिसने एक बार दाऊद पर दया दिखाई थी जब वह शाऊल से भाग रहा था। उन दिनों की यादें ताजा हो आईं – रात के अंधेरे में छिपते हुए, भूखे पेट भटकते हुए, और फिर नाहाश का वह संदेश जिसमें शरण देने का वादा था।
“हानून उसका उत्तराधिकारी है,” दूत ने कहा।
दाऊद ने सोचा, “मैं उसके पिता के प्रति अपनी कृतज्ञता दिखाऊंगा।” उसने अपने विश्वासपात्र दूतों को बुलवाया – योआब के चचेरे भाई अमासा और उसके भाई अबीशय को।
“जाओ,” दाऊद ने कहा, “हानून के पास जाओ और उसके पिता की मृत्यु पर शोक प्रकट करो। उसे बताओ कि मैं उसके साथ हूँ।”
दूतों का काफिला रब्बा की ओर चल पड़ा। रास्ते में जैतून के पेड़ हवा में सरसरा रहे थे। अम्मोन की भूमि पर बादल छाए हुए थे, मानो कुछ अनहोनी की सूचना दे रहे हों।
जब वे महल में पहुँचे, तो हानून अपने सरदारों के बीच बैठा था। उसकी आँखों में संदेह की एक गहरी रेखा थी।
“महाराज,” एक सरदार ने कान में कहा, “क्या आप सोचते हैं कि दाऊद वास्तव में सहानुभूति देने आया है? ये लोग जासूस हैं। हमारे शहर का पता लगाने, हमारी कमजोरियाँ जानने आए हैं।”
हानून की आँखें संकरी हो गईं। उसने दाऊद के दूतों को पकड़ लेने का आदेश दिया।
अगले पल क्या हुआ, वह इतना भयानक था कि शब्दों में बयान करना मुश्किल है। सैनिकों ने दूतों के कपड़े फाड़ दिए, उनकी दाढ़ियाँ मुँडवा दीं, और उन्हें अपमानित करते हुए शहर के बाहर फेंक दिया।
दूत लज्जा और पीड़ा से भरे हुए यरूशलेम लौटे। उनके चेहरे पर उगी हुई दाढ़ी के निशान थे, उनके कपड़े फटे हुए थे। वे एप्रोन पहने हुए थे ताकि लोग उनकी नग्नता न देख सकें।
दाऊद को जब यह खबर मिली, तो उसका चेहरा क्रोध से लाल हो गया। “जाओ,” उसने उनसे कहा, “यरीहो में रुको जब तक कि तुम्हारी दाढ़ियाँ न बढ़ जाएँ। फिर लौट आना।”
उधर अम्मोनियों को एहसास हुआ कि उन्होंने बहुत बड़ी गलती कर दी है। हानून ने सीरिया के शहरों – जोबा, माका और तोब – में सहायता के लिए संदेश भेजे। उन्होंने बत्तीस हज़ार रथ और माका के राजा के साथ उसकी सेना किराये पर ली। सैनिकों की संख्या इतनी थी कि मेदबा का मैदान उनसे भर गया लगता था।
जब दाऊद को यह खबर मिली, तो उसने योआब को अपनी सबसे बड़ी सेना लेकर जाने का आदेश दिया।
योआब और उसके भाई अबीशय ने सेना को दो भागों में बाँटा। योआब ने अम्मोनियों का सामना करने का फैसला किया, जबकि अबीशय सीरियाई सेना के विरुद्ध लड़ने गया।
“अगर सीरियाई तुमपर भारी पड़ जाएँ,” योआब ने कहा, “तो मैं तुम्हारी सहायता करूँगा। और अगर अम्मोनियाले मेरे लिए बहुत शक्तिशाली हो जाएँ, तो तुम मेरी सहायता करना। मजबूत बनो, और हम अपने लोगों और अपने परमेश्वर के नगरों के लिए मजबूती से खड़े हों।”
लड़ाई शुरू हुई। तलवारों की खनखनाहट, घोड़ों की हिनहिनाहट और सैनिकों के चीखने की आवाज़ें हवा में गूँज रही थीं। योआब की सेना ने अम्मोनियों को पीछे धकेलना शुरू कर दिया, जबकि अबीशय के सैनिक सीरियाई सेना का सामना कर रहे थे।
सीरियाई लोग इतनी जोरदार हार खाकर भागे कि अम्मोनियों ने भी, अपने सहयोगियों को भागते देख, शहर के फाटक बंद कर लिए।
सीरियाई सेनापति हददेजेर ने फिर से एक बड़ी सेना इकट्ठी की। इस बार उसने फरात नदी के पार से सैनिक लाए थे। शोबक उनका सेनापति था।
दाऊद ने स्वयं सेना लेकर उनका सामना किया। लड़ाई इतनी भीषण थी कि मैदान में खून की नदियाँ बह निकलीं। सीरियाई सेना के चालीस हज़ार पैदल सैनिक और सात सौ रथी मारे गए। शोबक, उनका सेनापति, भी युद्ध में मारा गया।
जब सीरिया के सभी राजाओं ने देखा कि वे इस्राएल से हार गए हैं, तो उन्होंने दाऊद के साथ संधि कर ली और उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। अम्मोनियों ने देखा कि उनके सहयोगी टूट चुके हैं, तो वे भी डर गए और अगले वसंत तक युद्ध नहीं किया।
यरूशलेम लौटते हुए दाऊद ने सोचा कि कैसे एक छोटा सा अपमान इतनी बड़ी लड़ाई का कारण बन सकता है। उसने परमेश्वर को धन्यवाद दिया कि उसने उन्हें विजय दिलाई, पर साथ ही उसके मन में एक गहरा दुख भी था – दुख उन लोगों के लिए जो व्यर्थ ही मारे गए थे।
रात होते-होते आकाश में तारे जगमगा उठे, मानो परमेश्वर की वाचा की याद दिला रहे हों कि वह अपने लोगों के साथ है, चाहे कितनी भी बड़ी विपत्ति क्यों न आए।




