पवित्र बाइबल

अय्यूब का अटूट विश्वास

आज सूरज डूबते ही मेरी साँसें भी मानो थम सी गईं। हवा में लटकता धुँधलका मेरे कमरे के कोनों में समा गया है, पर मेरी आँखों के सामने तो अँधेरा बस पिछले कई महीनों से ही पसरा हुआ है। मेरे दोस्त… हाँ, वो जो कभी मेरे साथ बैठकर परमेश्वर की महिमा गाते थे, आज वो मेरे सामने बैठकर मेरी हालत पर तरस खा रहे हैं। उनकी निगाहों में वही सवाल है — “अय्यूब, तूने क्या पाप किया था?”

मेरी आत्मा तो इन सबसे थक चुकी है। मेरे दिन बीत चुके हैं, मेरी आशाएँ टूट चुकी हैं। रात में जब मैं अपने बिस्तर पर लेटता हूँ, तो लगता है मानो वह मेरी कब्र हो। मेरी आँखें धुँधला सी गई हैं, शरीर की हड्डियाँ चमड़े से चिपक गई हैं। पर इन सबसे ज्यादा दर्द तो तब होता है जब लोग मुझे देखकर कहते हैं — “परमेश्वर ने तुझे दण्ड दिया है।”

क्या सच में? क्या मैंने ऐसा कोई पाप किया था? मेरा दिल गवाही देता है कि मैंने तो हमेशा उसके मार्ग पर चलने की कोशिश की। पर आज… आज तो मेरे हाथों में कोई ताकत नहीं बची। मेरी साँसें मेरे भीतर ही दब सी गई हैं। मेरे आसपास बैठे लोगों की बातें सुनकर लगता है, जैसे कोई भेड़िया मेरे शव के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहा हो।

परमेश्वर ने मुझे उनके हाथों में दे दिया है। मेरे अपने ही दोस्त मेरे विरुद्ध खड़े हो गए हैं। मेरी आँखों के सामने से रोशनी गायब हो गई है, मेरे शरीर की छाया मुझसे अलग हो गई है। मेरे घर के दरवाजे पर मौत खड़ी है, उसकी साँसें मेरे कमरे में घुल रही हैं।

फिर भी… फिर भी मेरा विश्वास… वो तो अब भी जीवित है। मेरी आत्मा चाहे कितनी भी थक जाए, मेरा हृदय चाहे कितना भी टूट जाए, पर मैं जानता हूँ कि वह जीवित है। मेरे रक्षक के सामने मैं निर्दोष ठहरूँगा। ये शरीर भले ही मिट्टी में मिल जाए, पर मैं अपनी आँखों से उसे देखूँगा — अपनी ही आँखों से, मेरे लिए ही।

मेरे मित्रों ने मुझे अंधकार में धकेल दिया है, पर मैं अंधकार से भी गहरे उसके प्रकाश की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। वो दिन आएगा जब मेरी आवाज फिर से गूँजेगी, मेरे होंठ फिर से उसकी स्तुति करेंगे। आज मेरी आँखों में आँसू हैं, पर कल वो उन्हें पोंछ देगा।

मेरे बिस्तर की चादरें मेरे आँसुओं से भीगी हैं, मेरी साँसें थकी हुई हैं। पर मेरी आत्मा की गहराई में एक दीया अब भी जल रहा है — छोटा सा, पर बुझने वाला नहीं। वो दीया मेरे और परमेश्वर के बीच का वाचा है। मेरे विश्वास की अंतिम लौ।

रात के अंधकार में मैं अपनी बाँहें फैलाता हूँ। मेरी आवाज कमजोर है, पर शब्द स्पष्ट हैं — “मैं जानता हूँ कि मेरा छुड़ाने वाला जीवित है।” बाहर तूफान चल रहा है, पर भीतर एक शांति उतर रही है। मेरी आँखें मुदते हुई सूरज की आखिरी किरण को देखती हैं, और मैं जानता हूँ — वह सुबह लेकर आएगा। मेरी सुबह। उसकी सुबह।

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