वह सुबह ठंडी थी, पर सूरज की किरणें खिड़की के शीशे से टकराकर कमरे में बिखर रही थीं। दाऊद अपनी कुर्सी पर बैठा खिड़की के बाहर देख रहा था। बाग़ में सेब के पेड़ लदे हुए थे, पक्षी डालियों पर कलरव कर रहे थे, पर उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी। वह जानता था कि उसके भीतर एक तूफान उठ रहा है, ऐसा तूफान जिसे शब्द देना मुश्किल था।
उसने अपने होठ दबाए। “मैं चुप रहूँगा,” उसने अपने आप से कहा, “बिल्कुल चुप। दुनिया की हलचल से दूर।” पर जितना वह चुप रहने की कोशिश करता, उसके भीतर का दर्द उतना ही उभरता। यह दर्द उसकी आत्मा की गहराई से आ रहा था, जैसे कोई ज्वालामुखी फटने को बेताब हो।
आखिरकार वह उठा और अपने कमरे के एक कोने में जा बैठा। उसने अपने हाथ जोड़े और परमेश्वर से बोला, “हे प्रभु, मुझे बताओ कि मेरा अंत कब होगा। मेरे दिन कितने थोड़े हैं। इस जीवन की नश्वरता मुझे दिखा।”
उसकी आँखों के सामने एक दृश्य उभरा – एक खेत में काम करते किसान, उनकी मेहनत, संघर्ष, और फिर अचानक सब खत्म। जीवन की भागदौड़ उसे अब एक छल लग रही थी। वह सोचने लगा, “इन्सान तो बस एक छाया की तरह है। व्यर्थ ही वह धन इकट्ठा करता है, पर नहीं जानता कि किसके लिए जमा कर रहा है।”
दाऊद ने अपने चेहरे पर हाथ फेरा। उसकी दाढ़ी के बाल उंगलियों में महसूस हो रहे थे, पर वह खुद को एक सूखे पत्ते की तरह महसूस कर रहा था जो किसी भी पल हवा में उड़ सकता है। “हे प्रभु,” उसने फिर प्रार्थना की, “मेरी आशा तो केवल तुझमें है। मेरे सभी पापों को क्षमा कर। मुझे मूर्खों की तरह न बनने दे।”
अचानक उसे अपनी बीती जवानी याद आई – वह दिन जब वह भेड़ें चराता था, उन हरी-भरी पहाड़ियों पर, जहाँ वह बिना किसी चिंता के गीत गाया करता था। अब वह राजा था, महल में रहता था, पर उसकी आत्मा उन साधारण दिनों को तरस रही थी।
शाम ढलने लगी थी। कमरे में अँधेरा घिर आया था। दाऊद ने एक दीया जलाया। उसकी लौ ने दीवार पर उसकी परछाई बनाई, जो हिल-डुल रही थी, अस्थिर। उसे लगा जैसे वह परछाई खुद उसका जीवन है – अनिश्चित, डगमगाती हुई।
“मैं तेरे सामने एक मेहमान हूँ,” वह फुसफुसाया, “बस एक राहगीर, जैसे मेरे सभी पूर्वज थे।” उसकी आवाज़ में एक गहरी विनम्रता थी। वह जानता था कि परमेश्वर की डांट से ही उसका अहंकार टूट सकता है।
रात हो चली थी जब दाऊद ने अपनी लेखन की मेज पर बैठकर एक कागज उठाया। उसने लिखना शुरू किया: “मैंने कहा, मैं अपने चालचलन पर ध्यान रखूंगा, कि जीभ से पाप न करूं…” शब्द धीरे-धीरे उतर रहे थे, हर शब्द उसके हृदय के गहरे अनुभव से निकल रहा था।
अंत में, जब उसने कलम रखी, तो उसके चेहरे पर एक अजीब शांति थी। वह जानता था कि उसकी प्रार्थना सुन ली गई है। बाहर, तारे चमक रहे थे, और चाँद की रोशनी में सेब के पेड़ शांत खड़े थे। दाऊद ने खिड़की से बाहर देखा और मुस्कुराया। उसे अब समझ आ गया था कि सच्ची शांति केवल परमेश्वर के आगे समर्पण में ही मिल सकती है।
सुबह होते ही वह उठा, और उसने अपने सेवकों से कहा, “आज हम परमेश्वर के भवन में जाएंगे।” उसकी आवाज़ में वही पुराना विश्वास लौट आया था, जो एक बार खो सा गया था।




