वह सुबह धुंधली थी। पुरानी लकड़ी की चौखट पर बैठे प्रकाश की आँखों में नमी थी। बरसों पहले बनी इस झोंपड़ी की दीवारों पर समय की धूल जम चुकी थी, पर आज सुबह-सुबह ही उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। बाहर आम के पेड़ से पत्ते गिरने की आवाज़ आ रही थी, मानो कोई अनकही बात कह रहा हो।
उसने अपनी झुर्रियों भरी हथेलियों को देखा। ये वही हाथ थे जो कभी जवानी में मजबूत थे, खेतों में हल चलाते थे, फसल काटते थे। अब ये काँपते थे। चाय की प्याली उठाने में भी दिक्कत होती थी। पर आज कुछ अलग था। उसकी आत्मा में एक गहरा संगीत उठ रहा था, जैसे दूर कहीं कोई भजन गूँज रहा हो।
“हे मेरे प्राण, यहोवा को धन्य कह।”
वाक्य अचानक ही उसके होठों पर आ गया। वह चौंका। यह तो वह भजन था जो उसकी माँ गुनगुनाया करती थी, जब वह बच्चा था और बुखार से तपता रहता था। रातों रात जागकर माँ उसके सिर पर हाथ फेरती, और धीमे स्वर में गाती – “हे मेरे प्राण, उसके सब भले कामों को भूलना नहीं।”
प्रकाश ने अपनी लाठी उठाई और धीरे-धीरे झोंपड़ी से बाहर निकला। सामने खेतों में सरसों के पीले फूल लहलहा रहे थे। हवा में एक मिठास थी। उसने देखा – दूर पहाड़ियों पर बादल छाए हुए थे, जैसे स्वर्ग की चादर बिछी हो। पक्षी डालियों पर बैठे अपने गीत गा रहे थे।
“वह तेरे सब अधर्म को क्षमा करता है।”
यह सुनकर प्रकाश की आँखों में आँसू आ गए। उसे याद आया वह दिन जब उसने अपने भाई से झूठ बोला था। वह सालों पुरानी बात थी, पर आज भी उसके मन में कचोटती थी। परमेश्वर ने उसे माफ कर दिया था। उसने महसूस किया जैसे कोई भारी बोछ उसके सीने से उतर गया हो।
वह आगे चला। रास्ते में एक बूढ़ा पीपल का पेड़ था, जिसकी छाँव में गाँव के बच्चे खेलते थे। आज वहाँ कोई नहीं था। प्रकाश ने पेड़ के नीचे बैठकर अपनी आँखें बंद कीं। उसे लगा जैसे परमेश्वर की उपस्थिति उसके चारों ओर है, जैसे हवा का हलका सा स्पर्श।
“वह तेरे सब रोगों को अच्छा करता है।”
उसे याद आया पिछले साल की बरसात, जब उसे ज्वर आया था और वह तीन दिन तक बिस्तर पर पड़ा रहा था। डॉक्टर ने कह दिया था कि अब कोई उम्मीद नहीं। पर फिर एक दिन अचानक बुखार उतर गया। प्रकाश समझ गया था कि यह कोई इलाज नहीं, बल्कि ऊपर वाले की कृपा थी।
दोपहर होने को आई। सूरज अपने चरम पर था। प्रकाश ने देखा – एक चिड़िया अपने बच्चों को दाना खिला रही थी। उसने सोचा, परमेश्वर भी हमें उसी तरह संभालता है। हमें पता भी नहीं चलता, और वह हमारी ज़रूरतें पूरी कर देता है।
“वह तेरी जवानी को गिद्ध के समान नया करता है।”
प्रकाश मुस्कुराया। उसे लगा जैसे उसके भीतर की थकान धुल गई हो। हाँ, शरीर बूढ़ा हो गया था, पर आत्मा आज भी उतनी ही ताज़ा थी जितनी जवानी में थी। उसे लगा जैसे वह फिर से युवा हो गया हो, नई उमंगों के साथ।
शाम होते-होते वह घर लौटा। रास्ते में उसने देखा – एक बच्चा अपनी माँ का हाथ पकड़कर चल रहा था। माँ बच्चे को समझा रही थी, “डर मत, मैं तेरे साथ हूँ।”
प्रकाश ने सोचा – क्या परमेश्वर हमसे ऐसा ही प्यार नहीं करता? वह हमें हमारी गलतियों के लिए दंड तो देता है, पर हमेशा माफ़ भी करता है। उसकी दया अनंत है, जैसे आकाश का कोई छोर नहीं।
घर लौटकर उसने दीया जलाया। लौ ने पूरे कमरे को रोशनी से भर दिया। प्रकाश ने अपनी पुरानी बाइबल खोली। वह भजन संहिता 103 को पढ़ने लगा। हर शब्द उसे नया जीवन दे रहा था।
“जैसे पूरब पश्चिम से दूर है, वैसे ही उसने हमारे अपराध हम से दूर किए हैं।”
यह पढ़कर उसका हृदय भर आया। उसे एहसास हुआ कि परमेश्वर की माया अपरंपार है। हम मनुष्य तो छोटी-छोटी बातों पर नाराज़ हो जाते हैं, पर वह तो हमारे सब पापों को माफ कर देता है।
रात को जब वह सोने लगा, तो उसने खिड़की से बाहर देखा। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। उसे लगा जैसे वे परमेश्वर की महिमा गा रहे हों। उसने अपनी आँखें बंद कीं और मन ही मन प्रार्थना करने लगा।
“हे प्रभु, तूने मुझे बचपन से संभाला। तूने मेरे रोग दूर किए। तूने मेरे पाप क्षमा किए। तूने मुझे अपनी दया का मुकुट पहनाया। आज फिर से इस बूढ़े शरीर में नया जीवन भर दिया।”
उसकी आँखों से आँसू की दो बूँदें गिरीं। वह खुशी के आँसू थे। उसे एहसास हुआ कि परमेश्वर की भलाई उसके साथ हमेशा रही है, चाहे वह अच्छे दिनों में हो या बुरे। जैसे बरसात के बाद धूप निकल आती है, वैसे ही परमेश्वर की कृपा हर मुश्किल के बाद नई उम्मीद लेकर आती है।
सुबह होने तक प्रकाश गहरी नींद में सो चुका था। उसके चेहरे पर एक अलौकिक शांति थी। बाहर पक्षी फिर से गा रहे थे, और हवा में वही मधुर संगीत गूँज रहा था – “हे मेरे प्राण, यहोवा को धन्य कह, और जो कुछ मेरे भीतर है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे।”




