वह दिन ढलने को था। तम्बू के भीतर हवा में जैसे एक गहरी, पुरानी गंध थी – जड़ी-बूटियों की, सूखे ऊन की, और समय की। याकूब बिस्तर पर पड़ा था, पर उसकी आँखें बुझी नहीं थीं। शरीर टूट रहा था, किन्तु मन के भीतर एक स्मृति-सा चलचित्र चल रहा था: बेतेल का वह सपना, राहेल का वह चेहरा, और मिस्र की यह विचित्र धरती जो अब उसकी शरणस्थली बन गई थी।
खबर मिली कि यूसुफ आ रहा है, अपने दोनों पुत्रों के साथ। याकूब ने अपने आप को थोड़ा सँभाला। पुरानी हड्डियों में एक अजीब-सी शक्ति का संचार हुआ, जैसे कोई दीपक बुझने से पहले एक बार तेज चमक उठता है। जब यूसुफ अंदर आया, तो उसके साथ दो किशोर थे – एप्रैम और मनश्शे। वे मिस्रियों के वस्त्र पहने थे, पर उनके चेहरे पर यूसुफ की-सी ही एक झलक थी, वही गंभीर, गहरी निगाहें।
याकूब ने उन्हें देखा, और अचानक उसकी आँखों के सामने से वर्षों की धुंध हट गई। “इन्हें मेरे पास लाओ,” उसकी आवाज़ में एक दबी हुई गरज थी। उसने उन्हें गले लगाया, चूमा। यूसुफ की ओर देखकर बोला, “मैं नहीं सोचता था कि तेरा मुख फिर देखूंगा, और देख, परमेश्वर ने मुझे तेरे वंश को भी दिखा दिया।”
फिर उसने एक अजीब मुद्रा बनाई। वह बिस्तर पर बैठ गया, हालाँकि पीठ सीधी करने में उसे पसीना आ गया। उसने यूसुफ से कहा, “इन दोनों को मेरी गोद में लिटा दे।” जब लड़के निकट आए, तो याकूब ने अपने बाएं हाथ को एप्रैम के सिर पर रखा, जो उसकी दाईं ओर था, और अपना दायां हाथ मनश्शे के सिर पर, जो बाईं ओर था। हाथ काँप रहे थे, वजनहीन और झुर्रियों से भरे, पर उनमें एक इरादा था, एक पूर्वनियति जो उसकी अंतरात्मा में उतरी हुई थी।
यूसुफ ने देखा कि पिता ने दायाँ हाथ छोटे पुत्र के सिर पर रख दिया है। वह असहज हुआ। धीरे से उसने याकूब का दायाँ हाथ पकड़कर, एप्रैम के सिर से हटाकर मनश्शे के सिर पर रखना चाहा। “पिताजी, ऐसा नहीं,” उसने कहा, “यह बड़ा है, इस पर दायाँ हाथ रखिए।”
किन्तु याकूब ने मना कर दिया। उसकी आवाज़ में अब कोई कम्पन नहीं था, बस एक शांत, अटल निश्चय। “मैं जानता हूँ बेटा, मैं जानता हूँ। यह भी एक जन का समूह बनेगा और महान होगा। परन्तु इसका छोटा भाई इससे भी बड़ा होगा, और इसकी सन्तान अनेक जातियों में फैलेगी।”
और फिर उसने आशीर्वाद दिया। पर वह साधारण आशीर्वाद नहीं था। याकूब उन दोनों लड़कों के नाम लेकर, उन्हें इस्त्राएल के नाम से, अपने पिता इब्राहीम और इसहाक के परमेश्वर के नाम से आशीष देने लगा। उसकी बातें सीधी नहीं थीं, टेढ़ी-मेढ़ी थीं, जैसे कोई नदी पुराने रास्ते से बह रही हो। वह बीते समय की बात करने लगा, उस लुस नगर की, जहाँ उसने राहेल को पाया और खोया। वह उस दुःख को, और उसके बाद के अनुग्रह को, सब कुछ इन दो अजनबी नातियों के भविष्य में बाँध रहा था। “मेरे साथ जिस प्रकार परमेश्वर चला,” उसने कहा, उसकी आँखें अब बंद थीं, मानों वह अतीत को स्पष्ट देख रहा हो, “और जिसने मुझे सारी बुराई से बचाया, वही इन बालकों का रक्षक होगा।”
आशीर्वाद पूरा हुआ। याकूब गिरता हुआ सा तकिए पर लौट आया। शक्ति चली गई थी। उसने यूसुफ से कहा, “देख, मैं मरने वाला हूँ, परन्तु परमेश्वर तुम्हारे संग रहेगा और तुम्हें फिर तुम्हारे पितरों के देश में ले जाएगा। और मैं तुझे शकेम दिए जाता हूँ, जो मैंने अपनी तलवार और धनुष से अमोरीयों के हाथ से लिया था।”
यूसुफ ने अपने पुत्रों को सम्हाला। वे चुप थे, शायद इस घने, गुरुत्वपूर्ण क्षण का पूरा भार समझ नहीं पा रहे थे। तम्बू के बाहर, मिस्र का सूरज अस्त हो रहा था, और छायाएँ लम्बी हो रही थीं। भीतर, एक बूढ़े आदमी की साँसें धीमी पड़ रही थीं, पर उसके शब्द, वे आशीर्वाद के शब्द, हवा में तैर रहे थे – केवल दो लड़कों के लिए नहीं, बल्कि उन जनजातियों के लिए जो अभी जन्मी भी नहीं थीं, एक ऐसे भविष्य के लिए जिसकी जड़ें इसी क्षण में जम रही थीं। और सब कुछ साधारण सा लग रहा था – एक दादा, अपने पोतों को आशीष दे रहा है। पर उस साधारण में ही असाधारण का बीज पड़ चुका था।




